Friday, January 2, 2015

                                 एक ज़रूरी बात........  
आज के परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो अनेक समस्याएँ विकास की राह में रोड़ा बन कर बैठी हैं। इनमें आतंकवाद और स्त्री अस्मिया पर हो रहे हमले सर्वाधिक चिंता का विषय है। लगातार घट रही इम घटनाओँ पर गौर करें तो मन खिन्न हो जाता हैं। बात गत वर्ष की ही की जाए तो पेशावर का खौफनाक मंजर दिल को दहला देता है। वो कंधे जिन पर सुनहरे भविष्य को संजोए  जाने वाले बस्ते लदे हुए थे आज बंद पड़े हैं, उन्हें खोलने वाले नन्हें हाथ अब दुनिया से कूच कर गए है। मांओं की आँखे जिनके दस मिनट देर से लौटने पर ही बैचेन हो जाया करती थी वे उन खुले दरवाजों को बस ताकती ही रह गई हैं और वे बच्चे जन्नत चल गए। पेशावर के आर्मी स्कूल में हुए 138 बच्चों का बालसंहार हर हृदय को द्रवित कर देता है। आज सभी आतंकवाद के खिलाफ लामबंद होने की बात कह रहे हैं परन्तु आखिर कब तक हम ऐसे घिनौने कृत्यों के होने की बाट जोहते रहेगे जो मानवता को शर्मसार कर रहे हैं । आतंकवाद हमारे भविष्य पर हमला कर रहा है और हम हैं कि धर्म पर राजनीति कर रहे हैं। जिन आतंकवादियों के निशाने पर निरीह मासूम बच्चे थे, धर्म तो उनका भी था। कैसा था यह धर्म? क्या धर्म स्वार्थ सिखाता है, क्या धर्म कहर होता है या धर्म धार्मिक उन्माद सिखाता है? सीधी बात ऐसे दहशतगर्दियों या आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, क्योंकि धर्म तो मानवता का पाठ पढ़ाता हैं। वर्तमान समय जब संक्रमण का है और जब तमाम मानवीय आस्थाएँ बिखरी पड़ी है उस समय आतंकवाद जैसे दानव का फिर सर उठाना किसी भयानक तूफान के आने की पूर्व सूचना है। 26/11 अभी हम भूले भी नहीं थे कि पेशावर के नन्हें  फरिश्तों के शहीद होने की खबर रह-रहकर मन को कचोट रही है। गली-कूचे इतने वीरान और गमगीन है कि लग रहा जैसे हर कोई मर्सिया पढ़ रहा है। जरा सोचिए आखिर कैसी भीड़ का हिस्सा हैं हम । अपने बच्चे के लिए आखिर कैसी दुनिया बना रहें हैं हम।
जो बच्चे चले गए वे बिल्कुल आम बच्चों जैसे थे। उन बच्चों में से कुछ अब भी हैं जो हमलों में बच गए हैं जिन्होनें अपने दोस्तों को और अपनी टीचर को अपनी आँखों से छलनी होते देखा है। उनके गर्म खून को अपने हाथों से महसूस किया है। वे सभी उस समय एकता का पाठ पढ़ रहे थे। तालीम ली जा रही थी उतनी ही पाक तालीम दी भी जा रही थी। उनके यूनिफार्म पर बैजेज लगे थे जिन पर लिखा था ‘I shall rise and shine’ पर वो इस कदर चमकेंगे ये किसने सोचा था। 16 दिसम्बर जो भारत के इतिहास में पूर्व से ही काला दिन है पेशावर के इस बाल संहार ने इस दिन की कालिमा को ओर अधिक गहरा दिया। ये घटनाएँ हमें कहाँ ले जा रही हैं। मानवता आज स्वार्थी मानसिकता और दहशतगर्दों के पैरों में बंधक बनी हुई है। जब समय की बयार विपरीत बह रही है तब आज मैं बड़ी ही आशा से हमारे देश के युवाओं की ओर ताक रही हूँ। 2021 में हमारा देश विश्व में युवाओं की सर्वाधिक संख्या वाला देश होगा। ऐसे समय युवाओं पर मानवता की रक्षा  करना और उच्च मानवीय गुणों का निर्वहन करना दोहरी जिम्मेदारी है। अगर हम एकजुट होंगे और साम्प्रदायिक अलगाव, क्षेत्रीयता आदि प्रवृत्तियों से विलग रहेंगे तो आतंकवाद और अन्य सामाजिक बुराईयां नेस्तनाबूद हो जाएगी। छात्राओं आप समझदार हैं, लिंग आधारित जिस भेदभाव की बात आज की जाती है उस क्रम में मैं यह कहना चाहूँगी कि यह विभेदीकरण आपके कमजोर होने के कारण नहीं वरन् सबल होने के कारण है। हम स्त्रियाँ आधी नही वरन् पूरी आबादी है हम अधिक संवेदनशील हैं अतः समाज और संस्कृति को सहेजने का जिम्मा भी हम पर है।

      आज जब वैश्विक परिदृश्य पर आतंकवाद और राष्ट्रीय फलक पर स्त्रियों के प्रति अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं तब सर्वाधिक आवश्यकता है युवा वर्ग को चैतन्य होने की क्योंकि केवल तभी हम वैश्विक और राष्ट्रीय पटल पर एक बेहतर मानवीय समाज की स्थापना का स्वप्न देख सकते हैं। देश का युवा अगर संगठित है, और उसमें हृदय और बुद्धि का सामंजस्य है तो मानवता के विकास का यह रूपक जो आज आप और हम चाह रहे हैं। वह अधिक दूर नहीं। दरअसल समेकित प्रयासों से ही हम मानवीय संवेदनाओं को सहेज सकतें हैं। मानव के आधुनिक युग में निरन्तर विचारवान होने पर भी साल दर साल हिंसा के आंकड़े निरन्तर बढ़ रहें हैं कभी अभिव्यक्ति पर हमले हो रहें हैं तो कभी मासूमों को निशाना बनाया जा रहा है हिंसा का यह बढ़ता कुहासा मानवीय संवेदनाओं और ह्रदय की तरलता को जमाता जा रहा है।  धर्म की संकुचित मानसिकता अनेक विसंगतियों को  और एक धार्मिक उन्माद को पैदा कर रही है। हाल ही में घटित अविजित की नृशंस हत्या इसी धार्मिक उन्माद की चरम अवस्था है।  इससे पहले की तमाम विमर्श और मानवता हाशिए पर आ जाए और सभी संवेदनात्मक पहलू कोरे इतिहास में दर्ज हो जाए उससे पहले  वैचारिक एकता को सुदृढ करते हुए इन ताकतों को ऐसा माकूल ज़वाब देना होगा कि ये नेस्तनाबूद हो जाए।  हाँ बदलाव की प्रक्रिया में  वक्त लग सकता है पर एक शुरूआत तो की ही जानी चाहिए।