Monday, June 4, 2018

ज़रूरी है समरसत!

लिखती रही हूँ , पर लिखना होगा सतत क्योंकि मानना है कि गर इस तरह भी कुछ लोग प्रभावित हो पाए तो , कुछ हाथ सजग हो पाए तो मेरी , हमारी वसु के संरक्षण के लिए यह एक छोटी सी पर सार्थक पहल तो होगी।

प्रकृति दुर्जेय है पर मनुष्य यह बात भूला बैठा है। दोहन अतिशय दोहन (शोषण के चरम तक) और सुरसुरा रूपी हमारी अनियंत्रित इच्छाएँ , अंतहीन आवश्यकताएँ हमारी प्रकृति का सौन्दर्य लील चुकी हैं। वर्तमान में कई राज्य पानी की क़िल्लत से जूझ रहे हैं, पर उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। हरियाली नदारद है और पृथ्वी का तापमान निरन्तर बढ़ता जा रहा है, पर उससे भी क्या???

हम एक दिन स्टेटस लगा लेंगे, तापमान बढ़ने पर दूसरों को गरिया कर एसी को कुछ और कम कर लेंगे या ज़्यादा ही हुआ तो एक पौधा लगा कर फ़ोटो सेशन कर लेंगे।
दरअसल जब तक यह चिंता व्यवहार में क्रियान्वित नहीं होती, नई पीढ़ी इसे एक मिशन की तरह नहीं लेती , सार्थक परिणाम प्राप्ति मुश्किल है।

स्नातक स्तर तक वनस्पति विज्ञान मेरा प्रिय विषय रहा है। नाना भाँति के फ्लोरा को देखना , जानना भाता था कि हमारी वसुंधरा कितनी समृद्ध है , उतना ही अच्छा लगता था जैव विविधता , जैव पारिस्थितिकी को पढ़ना भी पर अब विविधता तो लुप्त प्राय: की श्रेणी में बदल चुकी है।

क्या किया जाए और कितना ज़ल्द किया जाए ये निर्णय और परिकल्पना तो व्यक्तिगत प्रयास ही निर्धारित करेंगे। पर फिलवक्त यह तय है कि हमने हमारी संतति के लिए विकट परिस्थितियों के बीज बो दिए हैं।

छुटपन से माँ की डाँट खाती रही हूँ कि प्याज़ और सब सब्ज़ी एक साथ , एक थैली में क्यों लाती है। तू ही बचा लेगी प्लास्टिक से और मैं कह देती ना हम -आप दोनों । उनका सर पकड़ना और ग़ुस्सा सिर्फ़ इसलिए कि वे सात्त्विक आहार लेती हैं पर वे समझ गईं हैं कि फिर धरा कि सात्त्विकता का क्या होगा। उसके बाद से  दो थैले साथ होने लगे।

आचरण की शुद्धता , व्यवहार में शुद्धता से ही संभव। प्रयास करें कि समरसता बनी रहे, जड और चेतन में , पुरुष और प्रकृति में ..सर्वत्र!

~विमलेश शर्मा

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