Sunday, October 9, 2022

मूर्त-अमूर्त, हाल-माज़ी के तटबंधों के बीच लहलहाता किस्सों का रेत समुद्र ‘रेत समाधि’

 


 

रेत समाधि, उपन्यास का शिल्प, कथानक, पात्र, संवाद और उनकी विविध भंगिमाएँ जाने कितनी सांस्कृतिकियों में बँधा है, इसका कथानक जाने कितनी धारणाओं और औपनिवेशिक मानसिकता में कसमसाता  तो कहीं  जाग्रत चेतना में रचा-बसा नज़र आता है है। कई-कई साँचों-खाँचों को यह किताब एक ज़िल्द में तोड़ती-बुहारती नज़र आती है। सघन गद्य और संवेदनात्मक स्तरों की अनेक तहों के बीच इस उपन्यास के क़िरदार अपने होने और न होने को तय करते हैं। यह उपन्यास भाषा के बियाबान में अपनी मनमर्जी से नई पगडंडियाँ बनाता है, चौड़े-सपाट रास्तों पर कलकल बहना इस उपन्यास की भाषा को मंज़ूर नहीं, ऐसा  संक्षेप में कहा जा सकता है। 

 

बहरहाल अकादमिक जगत् की आलोचना इस भाषा को नकारती है,और इसी के चलते वे गीतांजलि श्री को हिन्दी व्याकरण सीखने की सीख तक दे डालते हैं। गीतांजलि श्री सरीखे लेखकों को पढ़ने के लिए भाषिक और साहित्यिक खाँचों से बाहर आना पड़ता है। दिल और दिमाग़ को खुला छोड़ना पड़ता है तब जाकर आप लेखिका की उँगली पकड़ उसके साथ कथानक को देखने का सामर्थ्य हासिल कर पाते है। रेत समाधि दरअसल संवेदनात्मक लेखन की एक नई ज़मीन है जो मुझे कुछ-कुछ कमलेश्वर के कितने पाकिस्तान के क़रीब जान पड़ता है। यह उपन्यास कथा-साहित्य की नयी ज़मीन की गवाही देता है। उपन्यास का कथानक यदि किसी सादा प्रविधि में कहा गया होता तो यह उतना  प्रभावी नहीं होता जितना कि अपने वास्तविक कलेवर में है। उपन्यास कई ज़गह बेतुकेपन के गलियारों से गुज़रता है जो इस बात की मिसाल है कि जीवन में भी कहाँ सब कुछ सिलसिलेवार होता है। वस्तुतः रेत समाधि एक भाविक कृति है जो भावों के अनुरूप ही अपना व्याकरण तय करती है और जिसे गद्य के साँचें में ढालकर लेखिका ने रख दिया है । 

 

तो फिलहाल रेत समाधि के शिल्प और भावजगत् पर लौटते हैं । कहानी एक वृद्धा की है और उस वृद्धा की जो हमारे घरों  या कि अड़ोस-पड़ोस में एक दीवार की तरह मौज़ूद है, जिसकी चुप आँखें दीवार के पार देखने के प्रयास में थकी सी नज़र आती है । जो पल-पल अपने जीवन को समाधि में तब्दील होते देखती है और उसकी इस उलझन को घर का दरवाज़ा ठीक-ठीक जानता है। इस गाथा में कभी स्मृति तो कभी विस्मृति के गलियारों में भटकती यह वृद्धा आपको कब अपनी ओर खींच लेती है , पाठक वह क्षण पकड़ ही नहीं पाता । कहा गया है कि उपन्यास में सरहद का ज़िक्र है और उपन्यास अनेक सरहदों को तोड़ता भी है । लेखिका उपन्यास के प्रारम्भ में ही भावप्रवण वाक्य गठन से इस सरहदी गाथा का परिचय इस प्रकार कराती है। दिलचस्प कहानी है । उसमें सरहद हैं और औरतें, जो आती हैं, जाती हैं, आरम्पार ।” (पृ.9, रेत-समाधि) अगला वाक्य जीवन-दर्शन  है और एक यथार्थ सूक्त कथन भी कि,  औरत और सरहद का साथ हो तो ख़ुदबख़ुद कहानी बन जाती है ।” (पृ.9, रेत-समाधि) तो  यह कहानी और इसका ओर-छोर एक औरत के गिर्द है । औरतें जो आती है जाती है आरम्पार । औरत के लिए सरहदें कई हैं और जो वो उसमें से गुज़र जाए तो ज़िंदगी का असल हासिल कर लेती है। कहानी है सुगबुगी से भरी । फिर जो हवा चलती है उसमें कहानी उड़ती है। जो घास उगती है, हवा की दिशा में देह को उकसाती, उसमें भी, और डूबता सूरज भी कहानी के ढेरों कंदील जलाकर  बादलों पर टाँग देता है और ये सब गाथा में जुड़ते जाते हैं।” (पृ.9, रेत-समाधि) कहानी दो औरतों की है । एक बेटी बनती माँ और एक माँ बनती बेटी की । माँ जो जीवन की ओर लौटती है, कभी अपनी छड़ी से तितलियाँ आज़ाद करती तो कभी उससे बादल को हटा कर इन्द्रधनुष बनाती ।

 

 कहानी में दो मौतों का ज़िक्र है  । एक जो माँ के पति थे और बेटी के पिता थे की और दूसरी माँ की, जो आसमान की तरफ़ मुँह करके ज़मीन पर गिरना जानती थी । कहानी दाम्पत्य जीवन से अकेली छूटी माँ से शुरू होती हैं । उपन्यास में जिस कमरे और सर्दी-गर्मी के मौसम का चित्रण है वह हमारे अनगिनत घरों का दृश्य है, जिसमें खूँटी पर टँगी छड़ी है, ऊनी कनटोप है, गिलाफ़ वाली मोटी रज़ाई, नकली दाँत निकालने की प्याली बिस्तर के किनारे एक तिपाई पर रखी है । उपन्यास में अम्मा के दीवार होते जाने का ज़िक्र है। और प्रतीकात्मक रूप से यह ज़िक्र दीवार और दरवाज़ों के रूप में बार-बार आया है। बस सीधी सी, सादी भी, ईंट सीमेंट की, पिलियाहट लिए, सफ़ेद पुती मध्यवर्गीय दीवार थी । छत, फर्श, खिड़की, दरवाज़े को सँभाले, पानी के पाइप, बिजली के तार, केबल-शेबल का जाल भीतर बिछाए, पूरे घर को दीवारी लिफ़ाफ़े में तहा के सहेजने वाली ।  ऐसी दीवार, जिसकी तरफ़ अभी अस्सी के इस तरफ़ की माँ, सूत दर सूत बढ़ती जा रही थी। ... जो कभी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता वह ये कि दीवार का उसे अपनी तरफ़ ऐंचना ज़्यादा दम रखता था, या परिवार को पीठ दिखाने की उसकी चाह ?  बस माँ दीवार की ओर होती गयी और उसकी पीठ अंधी बहरी होती गयी और ख़ुद एक दीवार बन गयी और ख़ुद एक दीवार बन गयी, उन्हें अलगाती जो उस कमरे में आते उसे उकसाने फुसलाने कि उठो अम्मा ।” (पृ.12, रेत-समाधिअकेली माँ और उसका मन बहलाने के जतन करता परिवार, इन दृश्यों को गीतांजलि श्री बहुत ही काव्यात्मक और तरल गद्य में पाठक के सामने रखती है। तो लब्बोलुबाब यह है कि कविता की रूह से सजी-धजी  कथा की नायिका चंद्रप्रभा देवी उर्फ़ अम्मा पति के निधन के बाद एक चुप ओढ़ लेती है, पलंग पकड़ लेती है और दीवार की तरफ़ मुँह किए दीवार हो जाती है।  समूचा घर-भर , बेटा-बहू पोता अम्मा को उठाने का जतन करते हैं पर अम्मा  है कि किसी उकसाने-फुसलाने में नहीं आती और हर किसी से इस तरह कह देती  है कि, नहीं, मैं नहीं उठूँगी । गठरी लिहाफ में ढुकी बुदबुदा देती । नहीं अब तो मैं नहीं उठूँगी। ” (पृ.14, रेत-समाधियह ज़िद अम्मा के मन की ज़िद है जो किसी ओर की नहीं सोचता । इस तरह अम्मा के कहे के कुछ भाव थे, तो उन्हें सुनने वालों के अग भाव जो उन्हें कभी अम्मा के प्रति दुष्चिंता से भर देते तो कभी अतिरिक्त संवेदना और सहानुभूति से । इन्हीं अम्मा की मुख्यकथा और अनेक अवांतर कथाओं के साथ रेतसमाधि की गाथा बढ़ती है।  उपन्यास कथा के बँधे-बधाए तटबंधों को तोड़ता है और कई गलियारों से सरहद तक पहुँचता है, जैसे कोई उन्मादी नदी कथा की बुनावट  को तटबंधों तक पहुँचाने का उल्लासयुक्त प्रयास कर रही हो।  इस कथा में लेखिका बहुत से समसामयिक मुद्दों , सरोकारों  और बहसों पर भी बात करती चलती है। समय के साथ प्रकृति, इंसानी मानसिकता में आ रही गफ़लत और बदलावों सब पर लेखिका तुलनात्मक विमर्श करती है । एक वक़्त था, कहते हैं, जब सब निर्धारित था, और कोई हेर का फेर नहीं,  ऐसा कहा जाता है, माना जाए या नहीं, ये आप हम तय करें । कि कभी ऐसा था कि एक-एक इंसान अपनी भूमिका में रचा-बसा था और जानता था कि किसके संग क्या सलूक करें । मसलन जापानी जानता था या जानती  थी कि सलामी में कमर किस कोण तक झुकाएँ और फ़लाना मोड़ पे अदृश्य हो गया है तो भी कितने पल, जस का तस झुके रहें। बड़ा जानता था कि कहने के पहले बस आँख उठाने भर। पर छोटा तपाक उठेगा और आज्ञापालन कर देगा । पेड़ जानता था बूँद गिरी, अब फल पका के गिराओ । इत्यादि । ” (पृ.64, रेत-समाधिउपन्यास में इस तरह के वाक्यों जो कि अपने आप में एक कथा का बोध कराते हैं के माध्यम से लेखिका ने कहीं पहचान का संकट ज़ाहिर करने की कोशिश की है, तो कहीं परिस्थितियों की गुंजलकों के बीच मनुष्य की भूमिकाओं की आवाज़ाही और रिश्तों के उलटन -पलटन का उल्लेख किया  है। लेखिका कथा सूत्रों के महीन रेशों के बीच लोकतंत्र में लापता होते लोक को भी चिह्नित करती है।

 

उपन्यास की नायिका चंदा जो कि अस्सी साला चंद्रप्रभा  की है, जो वृद्ध वय में विस्मृति की पगडंडियों से एक भूली-बिसरी याद तक पहुँचती है । चंदा को बँटवारे से पहले अनवर से प्रेम होता है,दोनों का विवाह होता है और तदनन्नतर बँटवारे के पश्चात् दोनों अलग हो जाते हैं । इस बीच चंदा उर्फ चंद्रप्रभा की शादी होती है, बाल-बच्चे भी और फिर अनवर चंदा की ज़िंदगी से सदा-सदा के लिए अलग हो जाता है। अस्सी साल की उम्र में जब चंदा के पति का देहावसान कुछ साल पहले हो चुका होता है, चंदा की स्मृति में अनवर कौंधता है और वह उस प्रेम के लिए बग़ैर वीज़ा सरहद पार जाकर अनवर को ढूँढ निकालती है। आरम्पार । इससे पहले भी अम्मा अपनी छड़ी के साथ घर से ग़ायब हो जाती है, कई दिनों तक चंदा अनवर को खोजती रहती है, कोई उसे दीवानी कहता है तो कोई पागल और फिर अंततः उन्हें घर लौटना होता है । घर लौटने पर माँ को बेटी और रोजी का सहारा मिलता है और माँ बेटी के साथ अपनी याद का सफर तय करती है। कहानी का कथानक पितृसत्ता की जकड़बंदी को तोड़ता है, एक वृद्धा , विवाहित, भरा-पूरा घर वाली अम्मा अपने प्रेमी अनवर के लिए सरहद, सरकार,फौज़ और संस्कारों की तथाकथिक बेड़ियों को चूर-चूर करने के लिए आमादा हो जाती है। दिखने में यह कथानक सादा हो सकता है लेकिन जिन सरहदी पगडंडियों के सहारे यह कथाक्रम बुना गया है वह न केवल भाषिक बल्कि भाविक दृष्टि से भी अप्रतिम है। 

 

उपन्यास में स्त्री मन का राग तमाम बंदिशों में मौज़ूद है । स्त्री मन जो सामाजिक वर्जनाओं की ओट में दुबका रहता है, दीवार-सा ठिठका रहता है वह कभी ज़िद्दी अम्मा सा बिस्तर नहीं छोड़ने की ज़िद करता है, कभी अपने मन मुताबिक गाउन या कपड़े पहनने का चुनाव करता है बेटी ने माँ बनकर माँ को बेटी बनाया और उनको उनके ख़्वाब से मिलाने उनकी दिखती आभासी विक्षिप्तता के चलते उनके साथ हो जाती है। इस बीच रोजी या कि रज़ा का उल्लेख है, जो कि तृतीयलिंगी है और समाज की हदबंदियों के बीच कभी रजा बनता है तो कबी रोज़ी । बेटी रोजी को रज़ा बनते देखती है और अम्मा  और उनके बीच होती बेतकल्लुफी पर कुढ़ती भी है। 

 

 

उपन्यास सरहद पर व्यंजना में बात करता है साथ ही सरहद और विभाजन की समस्या पर लिखने वाले सभी साहित्यकारों पर भी फैंटेसी तैयार करता है। सीमा की व्याख्या करती लेखिका कहती हैं, सीमा पर रेत होती है । जैसे रेगिस्तान में । रेत इंतज़ार करती है । रुकी हुई है । रेत का इंतज़ार, रुके का रेगिस्तान । वही है सीमा । कुछ एक तरफ़, बाकी दूसरी तरफ़ । आर-पार कि जा-पार। उपन्यास में राहत अली हैं, मोहन राकेश हैं, कृष्णा सोबती हैं, मंटो हैं, भीष्म साहनी हैं, कृष्ण बलदेव वैद,मंज़ूर एहतेशाम, जोगिंदर पाल, बलवंत सिंह और साथ ही इन लेखकों द्वारा रचे गए चरित्र भी अपनी भूमिकाओं में मौज़ूद हैं  । बिशन सिंह या अन्य किरदार विभाजन की त्रासदी औऱ उससे उपजे नफ़रती माहौल  के कुत्सित रूप की ओऱ हमारा ध्यान खींचते हैं। ये पात्र औऱ साहित्यिकी का ज़िक्र कहानी और गल्प का मिलाजुला असर पैदा करती है । कहानी गल्प स्वप्न होती है जो चलते-चलते अपने मतलब बनाती है। बोर्हेस ऐसा याद दिलाते हैं। सब माया हैं, भी । जो, जैसे सब कुछ भारत में ईज़ाद हुआ है, यहाँ उनके पहले से कहा गया है। स्वप्न पेड़ की तरह है ।” (पृ. 267, रेत-समाधि)

 

बहरहाल और बातों को और अनेकानेक भंगिमाओं को छोड़कर बात लैंगिक सरहदों और वज़ूद पर करते हैं, जो इस समाज के लिए सदैव विमर्श और बहस का मुद्दा रहा है।  उपन्यास भी मुख्यतः रोज़ी, रज़ा , चंदा और अनवर की बात करता है । उपन्यास में एक अस्सी साला वृद्धा अपने प्रेमी से मिलने का अभूतपूर्व साहस दिखाती है । स्मृति की हवा में बहती हुई वो बेटे-बेटी -बहू और समाज की फ़िक्र किए बग़ैर अनवर की पेशानी पर कजरी गाती है। बेटी अपनी माँ को देख बौखलायी हुई है, कभी वो इस प्रेम पर न्यौछावर होती है तो कभी अपने प्रेम को उस प्रसंग से तोलने का प्रयास करती है। सवाल यह है कि उपन्यास में चंदा पहले यह हिम्मत क्यों नहीं ज़ज्ब कर पाई। क्यों समाज की संकीर्ण मानसिकता और सरहदें दो प्यार करने वालों को सदा-सदा के लिए दूर कर देती है। इस कथानक को बेहद अज़ीब मगर काव्यात्मक, घुमावदार लेकिन रोचक ढंग से औपन्यासिक साँचे में उतार कर रख दिया है। एक औरत जब उसे अपने बच्चों पर आश्रित हो जाना चाहिए तब वह अपने  रहन-सहन , अपने कपड़ों और अपने उबटन को लेकर सजग हो रही है, यह ज़माने के लिए बेढंगा है पर यह बेढंगा क्यों है, उपन्यास इसी पर अपनी बात करता है।  उपन्यास स्त्री के उस असल को खोजने की पडताल करता है जो सामाजिक वर्जनाओं में कहीं खो जाता है। “ इतनी सी बात, खरी की खरी, कि उलझाव इसी ललक से है, कि हमें जानना है कि पहला, मौलिक, असल रंग क्या और किस गुहा से फूट रहा है, मगर जानो तो कैसे कि किस गुहा से, जब हर समय उस रंग पर आसमान और ज़मीन, पर्वत और पवन, अपने सायों के गेंद फुदका रहे हैं ?  इस पल सफ़ेद, अब काला, हरा , काही, लाल, अभी ख़ुरदुरा, अभी चिकनी छाया, अभी गोलमोल, अब कांटेदार । क्या जानें क्या था वो पहले और अब हो चला है क्या ?  तो हर कथा गाथा गल्प गप्पा में है अबूझ। और बुझौवल का पुट पक्ष, और हर कहानी है ज़िन्दगानी का नंदन चाहे क्रंदन कक्ष । और जब उसकी भूलभुलैया में प्रियजन गुम जाते हैं तो दिल का सारा लुत्फ़ ग़म हो जाता है जिसमें हर रंग खेल जाता है पर मज़ा नहीं आता है । ....माँ जी कहाँ  हैं? अभी यहीं थीं। कोई नारीवादी मन कह सकता है कि पहले भी नहीं थीं, बरसों  से नहीं थी। बाल बच्चों घर की निगरानी में फिरती एक साया थीजिसका असर लापता था। पर कोई कलावादी उलझा सकता है कि असल कौन और साया कौन, किसे कभी पता चला? क्या हर रंग में अलग असल जीवन नहीं हो सकता?” (पृ. 92, रेत-समाधि उपन्यास के इस अंश में अम्मा के ग़ायब होने या कि अपनी इच्छा से ग़ायब होने का ज़िक्र है और साथ ही स्त्री के अबूज मन और उस पर बिखरे सामाजिक दबावों का ज़िक्र है । वे दबाव जिसमें वो अपनी असलियत अपनी ज़िंदगी के मानी भूल जाती है। इस कथा-गाथा में असल ज़िदग़ी और उसके रंग है, इन्हीं बिन्दुओं पर रेत-समाधि विलक्षण बन जाती है। 

 

रोज़ी और रज़ा एक ही हैं पर सामाजिक वर्जनाओं के चलते दुई का शिकार है । क्या गार्ड की आवाज़ में कुछ व्यंग्य है? क्या वो भी सोचता है ये रोज़ी चली आ रही है रज़ा के लिबास में ? या वाक़ई सोचते हैं, एक आती है माता जी की नर्सगीरी वास्ते, दूसरा आता है माँ के कपड़ो की तुरपाई सिलाई करने और सोसाइटी वालों के भी ऑर्डर लेने।  (पृ227 , रेत-समाधिरज़ा धार्मिक संकीर्णता और लैंगिक क्रूरता दोनों का दंश झेलता किरदार है जो पार्श्व में खड़ा होकर भी बहुत कुछ कह जाता है। रोज़ी की कहानी शुरू जाने कैसे और कब होती है लेकिन ख़त्म एक वाक्य में कि रोज़ी मर गई। यह मौत खौंफ़नाक है, विभाजन की त्रासदी की जितनी है खौफनाक जिसका ज़िक्र लेखिका ने बहुत ही नाज़ुक कलम से कियै है। 

 

बहरहाल रेत समाधि हड़बड़ी में पढ़ी जाने वाली रचना नहीं है।  यहँ छोटे-छोटे वाक्यों में जीवन के गहरे कूप है मसलन- सही घड़ी हो तो कोई कुछ बन जाता है। ...रात होती है अगर बाहर अँधेरा हो,  बाहर अँधेरा था क्योंकि रात की बात थी। ....सबकी भन-भन सुननी है तो मच्छर बन जाओ, नम हो जाना है तो बदरा, सींग मारने हैं तो देश का सरदार, नाचना है तो हवा, रोना है तो दुम, नदी होना है तो माँ, चक्कर काटता बंदी जानवर तो बेटी और क़िस्सा रोक देना है तो यहाँ हो जाओ, क्योंकि क़िस्सा ख़त्म तो होता नहीं, रुक जाता है।  उपन्यास में क़िस्से है, क़िस्सों के कई-कई क़िस्से हैं, और यह उपन्यास की दुरूहता नहीं उसे रोचक बनाने वाले अजस्र झरने हैं , बशर्ते कि पाठक को उसे पढने का सलीका आना चाहिए।

Friday, September 16, 2022

हिन्दी अंतस् की भाविक अभिव्यक्ति है!


  

साहित्य विधाओं के भीतर आकार लेता है और विधाएँ विभिन्न मनोभावों और जीवन-यथार्थ के ताने-बाने से आगे बढ़ती है। इन मनोभावों की अभिव्यक्ति में भाषा एक सेतु का कार्य करती है। वस्तुतः कोई भी भाषा संवाद की भाषा होती है और इसी तर्ज़ पर  हिन्दी भी अनुवाद की नहीं बल्कि संवाद की भाषा अधिक है  किसी भी अन्य  भाषा की तरह हिन्दी भी जन-मानस की और उसकी मौलिक सोच की भाषा है। यदि आम भारतीय से हिन्दी भाषा पर  बात करते हैं तो साधारण संवाद   में कबीर, सूर ,तुलसी,मीरा और जायसी एकाएक मुखर होकर उभर आते हैं और जब बात  उसके साहित्य पर करते हैं तो अतीत के वातायनों से सुखद स्मृतियाँ, प्रबोधित करते हुए नारे, पत्रिकाओं की उपस्थिति और समर्पित सम्पादकों के चेहरे दृश्य-बिम्बों की तरह उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। 

 

हिन्दी भाषा  का सफ़र किसी भी अन्य भाषा की ही तरह सतत विकासशील रहा है। निःसन्देह हिन्दी हमारे मिज़ाज की भाषा है , यह उसका अतरंगीपन और हमारा सांस्कृतिक-मानसिक जुड़ाव ही है कि वो किसी भी भाव को अभिव्यक्त करने में हमें सहूलियत प्रदान करती है। हिन्दी भाषा का विकास यों तो संस्कृत-पालि-प्राकृत-अपभ्रंश की विकास-सरणियों से होकर गुज़रता है, परन्तु साहित्यिक हिन्दी का प्रसार भारतेन्दु हरीश्चन्द के पदार्पण से प्रारम्भ होता है और हरीश्चन्द्र के साथ ही शुरू होता है दौर लघु पत्रिकाओं का । स्वयं भारतेन्दु कविवचनसुधा के साथ सम्पादकीय परम्परा को प्रारम्भ करते हैं। गद्य के साथ -साथ कालान्तर में हिन्दी पद्य की भी भाषा बनती है। भारतेन्दु व उनके मण्डल की बात करें तो बालकृष्ण भट्ट, हिन्दी प्रदीप (1877ई.) , प्रताप नारायण मिश्र ,ब्राह्मण (1880 ई.), अम्बिकादत्त व्यास (पीयूष प्रवाह), ठाकुर जगमोहन सिंह आदि अनेक पत्रिकाओं  का संपादन कर एक प्रतिबद्ध पत्रकारिता व सम्पादकीय परम्परा की नींव रख रहे थे। आज के दौर में लघु पत्रिकाएँ पाठक के भाषिक व सांस्कृतिक विकास का आग्रह लेकर सतत प्रकाशित हो रहीं हैं। यह सुखद है कि लघु पत्रिका दिवस सितम्बर को मनाया जाएगा, इसका निर्णय भी राजस्थान से जुड़ा है। आज के दौर में अनेक पत्रिकाएँ अपने दाय से साहित्यिक प्रतिबद्धता का निर्वहन कर रहीं हैं। 

भाषा और साहित्य की आयु मनुष्य की आयु से कई गुना अधिक होती है। और यही कारण है कि हिन्दी भाषा की साहित्यिक यात्रा भी विविध विधाओं , विमर्शों और समतावादी समाज की स्थापना के प्रयासों जैसे महनीय उद्देश्यों को लेकर निर्बाध रूप से आज भी चल रही है। हिन्दी की अनेक पत्र-पत्रिकाएँ वीणा, बनास जन, हंस, नया ज्ञानोदय , पहल, पक्षधर , वसुधा, पाखी, कथादेश, अनुसंधान, वाङमय, मधुमती आदि  पूरी प्रतिबद्धता के साथ अनेक महत्त्वपूर्ण व संग्रहणीय अंक निकाल रही हैं, जिससे हिन्दी की  विधाओं, समकालीन लेखन और विविध विमर्शों केन्द्रित रचनाओं का व्याप तो अनवरत बढ़ ही रहा है और साथ ही साथ पाठकों की सांस्कृतिक समझ भी विकसित हो रही है। ऐसे में हिन्दी के लिए लघुपत्रिकाओं का होना एक वरदान है परन्तु वे भी पाठकों की कमी का शिकार हैं। स्तरीय और महत्त्वपूर्ण शोध सामग्री होने के साथ ही वे एक सम्पूर्ण बौद्धिक खुराक देने का सामर्थ्य अपने में रखती है , इसके बावज़ूद पत्रिकाओं की पहुँच उतनी नहीं है, जितनी अपेक्षित है और यही कारण है कि कई पत्रिकाएँ आर्थिक संसाधनों के अभाव में शीघ्र ही काल-कवलित हो जाती हैं।

 

हिन्दी साहित्य में हिन्दी भाषा की स्थिति को देखें तो जहाँ पहले लेखकों का ध्यान इस ओर रहता था कि हिन्दी परिष्कृत और प्रांजल रूप से सामने आए अब साहित्यिक रचनाएँ दैनन्दिन भाषिक प्रयोग पर अधिक जोर दे रही हैं।  यह ख़ुशी की बात है कि वे इस बात के आग्रही रहे हैं कि शब्द चाहे संस्कृत से आए या फ़ारसी से या देशज रूप में वे परिष्कृत रूप में साहित्य में प्रयुक्त हों। हिन्दी भाषा के साथ-साथ उसका साहित्य वंचितों और उपेक्षितों को केन्द्र में लाने की परम्परा जो राजेन्द्र यादव ने प्रारम्भ की थी उसकी ओर भी लगातार ध्यान दे रहा है। इस कड़ी में असगर वज़ाहत, मंजूर एहतेशाम, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मैत्रेयी पुष्पा   , बजरंग तिवाड़ी, मृणाल पांडे, प्रियदर्शन , वंदना राग , सुजाता आदि रचनाकार  महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अवदान देकर साहित्य , आलोचना  और सरोकारों को अपनी आवाज़ दे रहे हैं।

 

वर्तमान दौर सोशल मीडिया का दौर है। यह सुखद है कि मौज़ूदा दौर  में 200 से अधिक हिन्दी की पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही है परन्तु इस से कई गुना अधिक वेब पत्रिकाएँ और ई-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ऐसे में भाषिक  सजगता के आग्रहों को लेकर कितनी पत्रिकाएँ संचालित हो रही हैं , कौन प्रतिबद्धता के साथ साहित्यिक सरोकारों पर बात कर रहा है यह विश्लेषण का  विषय  है। इस दौड़ में शब्दाकंन , समालोचन, कविताकोश , रेख्ता , हिन्दवी आदि ऐसे मंच है जो महत्त्वपूर्ण सामग्री पाठकों तक पहुँचा रहे हैं। शब्दांकन और समालोचन पर सम्पादकों की मेहनत भी स्पष्ट दिखाई देती है जिसे वे रचनाओं के प्रकाशन से लेकर छापने तक में महत्त्वपूर्ण योगदान और समर्पण देते हैं । हिन्दी साहित्य अपने सरोकारों और प्रतिबद्ध लेखन को लेकर निरन्तर प्रगति कर रहा है पर हिन्दी भाषा को लेकर सजगता को लेकर अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।

 

हिन्दी का लेखक वही हो सकता है जिसे हिन्दी की समझ हो, यदि  महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के इस सूत्र वाक्य को वर्तमान हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता अपना लेते हैं तो भाषिक दुराग्रहों और भाषाई अड़चनों से सहज ही बचा जा सकता है। भाषा को लेकर मौज़ूदा लेखक अतिउत्साही हैं, वे शब्द की प्रकृति को जाने बग़ैर ही उस पर आधिकारिक तौर पर लिखने और प्रकाशित होने की बात करते हैं जो हिन्दी के लिए चिंताजनक है। हिन्दी के व्याप और प्रचार-प्रसार के साथ ही यदि हिन्दी का प्रयोक्ता हिन्दी के शुद्ध प्रयोग का यदि   आग्रही हो जाता है तो बात कुछ बन सकती है। वर्तमान हिन्दी या आधुनिक हिन्दी  में तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज और संकर इन पाँच प्रकार के शब्दों का प्रचलन है। इन भिन्न- भिन्न स्वरूप वाले शब्दों की सम्यक् प्रकृति का याथातथ्य  ज्ञान ही हमें , हिन्दी के प्रयोग , उसकी शब्द-सम्पदा के माहात्म्य को सुरक्षित व संरक्षित करने में सहायता प्रदान कर सकता है। हिन्दी की पुस्तकों व प्रकाशित सामग्री में अशुद्धि होने का एक प्रधान कारण यह है कि हिन्दी भाषा का सामान्य प्रयोक्ता इस शब्द-विभाजन से अपरिचित है और कहीं का नियम कहीं पर लगा देता है। इसी कारण से हिन्दी भाषा में अशुद्ध शब्दों का प्रचलन निरन्तर बढ़ता जा रहा है।

 

हिन्दी आज संपर्क भाषा के रूप में संपूर्ण देश में एकता के सूत्र के रूप में जानी जाती है। हिंदी अनेक जन-आंदोलनों की भी भाषा रही है। हिंदी के महत्त्व को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने बड़े सुंदर रूप में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था, ‘भारतीय भाषाएँ नदियाँ हैं और हिंदी महानदी। हिन्दी में भोजपुरी, राजस्थानी, मराठी आदि बोलियों के शब्द आज लेखन में भी प्रयुक्त हो रहे हैं।  हिन्दी के इसी समरसताजन्य महत्त्व, सर्वव्यापी प्रयोग-प्रसार और लोकप्रयिता को देखते हुए आज कम्प्यूटर पर हिन्दी पठन-पाठन-लेखन के अनेक सॉफ्टवेयर ईजाद किए गए हैं। 

 

भाषा का व्यावहारिक पक्ष हो या सैद्धान्तिक पक्ष दोनों को लेकर  आज अंतर्जाल पर हिन्दी की अनेक दुर्लभ पुस्तकें उपलब्ध हैं। यू ट्यूब पर भी हिन्दी कविता चैनल, साहित्य जगत् में काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है जहाँ कविताएँ अत्यन्त ही प्रभावी अंदाज़ में मौज़ूद हैं। फेसबुक और ट्वीटर पर महत्त्वपूर्ण लेखकों के पेज उपलब्ध है। विविध भारती और आकाशवाणी पर अनेक कार्यक्रम औऱ परिचर्चाएँ हिन्दी भाषा और साहित्य को लेकर आयोजित की जाती हैं। आज लेखक इन सभी  मंचों के माध्यम से स्वयं ही प्रकाशित भी हो रहा है और विषय की समझ भी ले रहा है। स्पष्ट है हिन्दी की इस लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इस भाषा के प्रयोक्ता, चाहे वह लेखक हो या पाठक, ही तो हैं जिनमें सतत इजाफ़ा हो रहा है। गीतांजली श्री की रेत समाधि का पुरस्कृत होना हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाता है और साथ ही भाषा के प्रयोक्ताओं और साहित्यकारों के लिए एक ज़िम्मेदारी भी तय करता है। 

 

 

हिन्दी भाषा के सौन्दर्य को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए और साहित्य को कालजयी बनाने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग और रचनाकारों को चिंतन  करना होगा, साहित्य से पहले भाषा पर विचार करना होगा, उसकी व्याकरणिक कोटियों के प्रति सटीक जानकारी प्राथमिक शिक्षा से ही बच्चों को देनी होगी ताकि सटीक प्रार्थना-पत्र और अशुद्धियाँ नहीं लिख पाने का दोष हम युवपीढ़ी को न दे सकें। उसके भाविक और भाषिक प्रयोगों को समृद्ध बनाकर सावचेती से उसका प्रयोग कर ही हम  भाषा का सहेजन-संरक्षण और संवर्धन कर सकते हैं।

 

 

Monday, May 9, 2022

अबोध आदिवासी मन और हथियारबंद संगठनों के बीच एक रक्तरंजित शासकीय रेख

" दक्षिण बस्तर में दूर किसी गाँव से आती यह आवाज़ गोंडी गीत संगीत की पहचान थी। ढोल नगाड़ों के बजने की आवाज़ किसी आयोजन का संकेत। बस्तर के गाँवों में ऐसे आयोजन अक्सर सूरज ढलने के बाद शुरू होते और देर रात तक चलते जिसमें गोंड आदिवासी सब कुछ भूलकर गीत संगीत में खो जाते, लेकिन जून की तपती धूप में सुबह सवेरे होने वाला यह आयोजन कुछ अलग था। इसीलिए आदिवासियों की मौजमस्ती का वह रंग आज कुछ फीका लग रहा था। न वह उत्साह था, न वह लापरवाही और न वह मस्ती जो गोंडी गीत संगीत के ऐसे कार्यक्रमों में घुली होती है।" (उपन्यास अंश)


Joshi, Hridayesh. Laal Lakeer (Hindi Edition) (p. 7). HarperHindi. Kindle Edition. 


अबोध आदिवासी मन और हथियारबंद संगठनों के बीच एक रक्तरंजित शासकीय  रेख

(संदर्भ लाल लकीर – हृदयेश जोशी)

 

डॉ.विमलेश शर्मा

 लेख अंश

हृदयेश जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक से भी अधिक के समय में माओवाद प्रभावित बस्तर से लगातार रिपोर्टिंग करते रहे हैं। बस्तर के वॉर ज़ोन से उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिये उन्हें प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार भी मिल चुका है। लाल लकीर उनका पहला उपन्यास है।लाल लकीर एक समस्याप्रधान उपन्यास है जो आदिवासी संस्कृति के सहज सौन्दर्य, उसके संघर्ष, राजनीतिक संघर्ष से उपजे घाव, नक्सली हिंसा, हिंसा-प्रतिहिंसा की जद्दोजहद, और जबरन भूमि अधिग्रहण को एक साथ उद्घाटित करने का प्रयास करता है। भारत में जब आर्थिक परियोजनाओं का प्रारंभ आधुनिकीकरण की आड़ में प्रारम्भ हुआ तो इन परियोजनाओं के लिए ज़बरन ज़मीन हथियाने के कुचक्र भी प्रारम्भ हुए और उनके विरोध में कई हथियारबंद संगठन प्रतिक्रियास्वरूप लामबंद हुए। 

अगर भारत के राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो 2009 में केंद्र सरकार ने नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ प्रोजेक्ट   शुरू किया था। पश्चिम बंगालउड़ीसाछत्तीसगढ़ और बिहार समेत अन्य राज्यों में नक्सलियों के खिलाफ़ ये ऑपरेशन चलाए गए थे। ऑपरेशन ग्रीन हंट को अब ऑपरेशन प्रहार’ के नाम से जाना जाता है। तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने इसके साथ ही यह घोषणा की थी कि पांच सालों के भीतर नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाएगा। क्योंकि नक्सलवाद मानव संसाधनों के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका था।  वस्तुतः  नक्सलवाद विरोधी इस मुहिम के केंद्र में बस्तर था। इस ऑपरेशन के तहत तत्कालीन गृहमंत्री पी.  चिदंबरम का कहना था कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास के तहत  प्रत्येक जिले को पच्चीस करोड़ रुपया दिया जाएगा , इन जिलों में दंतेवाड़ा भी शामिल था ।  इसी समय गृहमंत्री ने पुलिस और सुरक्षाबलों को इस क्षेत्र में और मजबूत करने के लिए कई सौ करोड़ दे दिए ।जिसके तहत पांच हजार से ज्यादा सुरक्षाबल जवान छत्तीसगढ़ में तैनात किए गए। लेकिन सुरक्षाबलों की कार्रवाई से नक्सलवाद कम होना तो दूर उसका दायरा अन्य जिलों और राज्यों तक फैल गया । अख़बारों में यह ख़बरें  जो कि हक़ीकत थीं, प्रकाशित होने लगीं कि,  “ देश भर में चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के तहत पुलिस जबरन ग्रामीणों को तंग कर रही हैं। पुलिस उन्हें माओवादी बनाने में जुटी है। इससे ग्रामीण आदिवासियों का गुस्सा सरकार व पुलिस के प्रति बढ़ रहा है।” इन सबके चलते नक्सली हिंसा में अचानक तेजी आ गई और बस्तर ऐसे क्षेत्र में तब्दील हो गया जहाँ सिर्फ सुरक्षाबल ही निर्दोष’ रह गए और बाकी पूरी आबादी संदिग्ध हो गई। बस्तर का वो आदिवासी जो अपने संसाधन जल , जंगल , ज़मीन छीने जाने की प्रक्रिया में पहले ही हाशिए पर थाजो  अपनी आजीविका पर आए इस ख़तरे के बावज़ूद नक्सलवादियों के साथ होकर हिंसा के साथ होना नहीं चाहता थावो इस स्थिति का सबसे बड़ा शिकार बना । उपन्यास इन घटनाक्रमों और संघर्षों की पृष्ठभूमि की बात करता है।

 

 अनवरत  संघर्ष के चलते ‘बस्तर’ जैसे प्राकृतिक ठिये सुरक्षा बलों, नक्सलवादियों-माओवादियों के बीच एक ऐसे युद्ध क्षेत्र में बदल गए जिसके बीच एक लकीर है, जो निरंतर वहाँ  के सुकून को रक्तरंजित कर  लील रही है, यह लकीर ही लाल लकीर है। इस लाल लकीर के दोनों ओर के पक्ष एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं। और उपन्यास में बस्तर के माध्यम से इस लाल लकीर के दंशों को याथातथ्य चित्रण प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास में चित्रित बस्तर की बात करें तो वह  सुरक्षा बलों और नक्सलवादियों के बीच एक ऐसे युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो चुका है जिसके बीच एक लकीर, एक विभाजन  रेखा खिंची है, जिसके दोनों ओर अलग-अलग जीवन है। युद्ध और हिंसा से जोड़ते हुए यदि हम इसे लाल लकीर का नाम दें तो इसके आरपार के पक्ष एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। पर उन मासूम आदिवासियों का क्या जो किसी पक्ष से ताल्लुक नहीं रखते, जो अबोध हैंये लोग लाल लकीर के दोनों तरफ शिकार बन जाने के लिए अभिशप्त हैं और आज इन्हीं में से सैकड़ो आदिवासी जेलों में निरपराध बंद हैं।  पिछले एक दशक से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रिपोर्टिंग कर रहे हृदयेश जोशी का उपन्यास लाल लकीर’ इसी त्रासदी के महीन सूत्रों को पकड़नेसमझने और दिखाने की एक कोशिश है।

 कस्तूरबा की रहस्यमय डायरी (उपन्यास)

लेखिका: नीलिमा डालमिया आधार
अनुवादिका: शुचिता मीतल
प्रकाशक: वेस्टलैण्ड बुक्स

दिल्ली

कुछ किताबें महज़ अपने नाम से एक पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखती हैं. संभव है, इस प्रकार के नाम रखे ही इस कारण जाते हों ! जो भी हो, 550 पृष्ठ की इस किताब ने मेरा ध्यान भी अपनी ओर खींचा, लेकिन नाम के कारण उतना नहीं, जितना गाँधी के बारे में कुछ अतिरिक्त जानने कीसहज़ जिज्ञासा के कारण. 
इस किताब के विषय में मैं इसकी लेखिका श्रीमती नीलिमा डालमिया आधार से कलम कार्यक्रम में बात करने का मौक़ा मिला और पुस्तक के बारे में बहुत कुछ सुना-जाना।
मूलतः किताब अंग्रेजी भाषा में लिखी गई है, जिसका शुचिता मीतल जी ने सुन्दर अनुवाद किया है, जिसके लिए वे बधाई की पात्रा हैं.
यूँ तो इस किताब को कस्तूरबा की डायरी कहा गया है, लेकिन मूलतः इसे उपन्यास की शैली मे ही लिखा गया है. यह तो सर्वविदित है कि कस्तूरबा ने कभी कोई डायरी नहीं लिखी, अतः यह स्वीकार करना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यह किताब लेखिका की कल्पनिक उड़ान का ही प्रतिफल है. इसे इतिहास अथवा एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी नहीं लिया जा सकता. आगे की पंक्तियों में मैं इसे उपन्यास कहना ही पसंद करूँगा.
संभवतः यह पहला प्रयास है, जब कस्तूरबा कीदृष्टि से गाँधी को देखने, समझने का प्रयास किया गया है. एक पत्नी अपने पति की न केवल जीवन संगिनी होती है, वरन वह अपने पति के उन भेदों को भी बखूबी जानती है, जो अन्य लोगों की निगाहों में नहीं आ पाते. यही एकमात्र कारण है, जो इस किताब को विशिष्ट बनाता है. यूँ तो गाँधी ने तमाम उम्र अपना जीवन पारदर्शी बनाए रखा, यहाँ तक कि अपने निजी यौन व्यवहार को भी वे अन्त तक सार्वजनिक करने से नहीं चूके. यह उनका ही अदम्य नैतिक साहस था, जो उन्हें एक खुली किताब के रूप में   स्वयं को प्रस्तुत करने से रोक नहीं सका. विरले ही होते हैं वेे लोग, जो ऐसा कर पाने का ंअदभुत साहस रखते हैं. जिस विषय के बारे में सब लोग सब कुछ जानते हों, वह पाप कैसे हो सकता है ?
उपन्यास के मुख्य पृष्ठ पर कस्तूरबा का गरिमामय चित्र है, पतले किनार वाली सफेद साड़ी पहने हुए, जो उनकी सादगी का द्योतक भी है. यह सादगी उन्हें गाँधी के सानिध्य से प्राप्त हुई थी, जिसे उन्होंने अपने जीवन की अन्तिम साँस तक मजबूरन निभाया भी, जैसा कि यह उपन्यास हमें बताता है. 
वहीं दूसरी ओर किताब का अन्तिम पृष्ठ इस किताब के विषय में एक वक्तव्य जैसा है, काले बोल्ड अक्षरों में गाँधी के काले पक्ष को उजागर करते उनके स्वयं के लिखे, तुलनात्मक रूप से कम प्रचलित पत्र की एक पंक्ति है, ”मैं नहीं जानता कि मेरे भीतर कैसा राक्षस बसा है, मेरे अन्दर एक तरह की निर्ममता है जो मुझे खुश करने के लिए लोगों को असाध्य काम करने पर मजबूर करती है.“ यहीं लेखिका यह स्वीकार करती है कि यूँ तो गाँधी का दुनिया एक शांतिदूत की तरह सम्मान करती है, लेकिन वे उन्हें एक ”कामुक, आत्मतुष्ट और अहंकारी पति“ के रूप में ही देख पाई थीं. 
और यही इस उपन्यास का मूल स्वर भी है. एक पाठक सहज ही अनुमान लगा सकता है कि उसे इस किताब में गाँधी का यही नकारात्मक रूप सर्वाधिक देखने को मिलने वाला है. अपने अजमेर वाले कार्यक्रम में लेखिका ने यह स्वीकार भी किया था कि यह उपन्यास उनका अपना नजरिया है, यदि किसी को आपत्ति है तो वह अपनी तरह से दूसरी किताब लिख सकता है.
और वे अपनी जगह गलत भी नहीं है. प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है. इसमें बहुत बड़ा हाथ हमारी अपनी सोच का होता है, सोच ही हमें वैसा बनाती है, जैसे हम होते हैं. यदि नीलिमा जी ने कस्तूरबा को अपने इस उपन्यास कीविषय वस्तु चुना है, तो उन्होंने अवश्य ही कस्तूरबा के जीवन में कुछ ऐसा महत्वपूर्ण महसूस किया होगा, जिसने उनके मन को गहराई से स्पर्श किया होगा. और यह तो स्वीकार करना ही होगा कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपने मन की पर्तें खोल कर पाठकों के समक्ष रख दी हैं. एक स्त्री मन की व्यथा एक स्त्री संभवतः बेहतर तरीके से समझ सकती है. नीलिमा जी का स्वयं का जीवन अनेक विडम्बनाओं से भरा रहा है, जिसकी खरौंचें परोक्ष रूप में इस उपन्यास में भी जगह जगह स्पष्ट दिखाई देती हैं. 
यह उपन्यास प्रवाह की दृष्टि से अद्भुत है. नीलिमा जी का शिल्प, शैली और गद्यात्मकता पाठक को पूरी तरह बाँधे  रखती है. उपन्यास पढ़ना शुरू करने के बाद यह उपन्यास स्वतः ही पाठक को अपनी गिरफ़्त में ले लेता है और पाठक लगभग सम्मोहित सा इसे पूरा पढ़े बिना नहीं रह सकता. एक तरफ़ चरित्र ऐतिहासिक  और कालखण्ड की सीमाओं को तोड़ता हुआ वैश्विक आभामंडल  में रचता-बसता है तो दूसरी और कस्पातू उतनी ही सादा ।  यहाँ घटनाएँ, संदर्भ  , किरदार और प्रसंग इतने सच्चे हैं कि पाठक जब  इसे पढ़ नहीं रहा होता, तब भी यह उपन्यास उसका पीछा नहीं छोड़ता, उसे लगातार हाॅन्ट करता रहता है और पूरी तरह उसे अकेले नहीं होने देता. इसे मैं एक सफल उपन्यास की विशेषता मानती  हूँ कि वह अपने पाठक को गिरफ्त में लेने के बाद एक क्षण के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता, बल्कि पूरा हो जाने के उपरांत भी, अपने गहन प्रभाव के चलते, एक लम्बे समय तक पाठक के साथ बना रहता है.
इस प्रभाव का एक कारण उपन्यास में स्वयं गांधी  की उपस्थिति भी हो सकता है. गाँधी का व्यक्तित्व इतना बड़ा, इतना वृहद है कि मेरे जैसे सामान्य से पाठक के लिए उनके सम्मोहन में सहज ही आ जाना एक सरल सी प्रक्रिया है. मैं ही क्या, इतिहास गवाह है कि स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय इस देश के लाखों लोग उनका अनुसरण मात्र उनके कहे शब्दों पर विश्वास कर कर रहे थे. जिस व्यक्ति के शब्दों में इतनी ताकत थी, वह व्यक्ति सामान्य तो हो ही नहीं सकता !
जैसा कि मैंने कहा कि यद्यपि इस किताब को ”डायरी” की संज्ञा दी गई है, लेकिन यह मूलतः लिखा उपन्यास शैली में ही है. संवाद हालांकि कम हैं, लेकिन संवादों का कम होना उपन्यास की पठनीयता में बिल्कुल भी बाधा नहीं डालता. लेखिका ने कस्तूरबाकी पीड़ा और अकेलापन शब्द दर शब्द प्रभावी तरीके से उद्घाटित की है. जैसे जैसे पाठक आगे पढ़ता जाता है, वह कस्तूरबा की पीड़ा का भागीदार बनने लगता है, कस्तूरबा का अकेलापन पृष्ठ दर पृष्ठ अपनी सम्पूर्ण यन्त्रणा के साथ उसे महसूस होने लगता है. यह उपन्यास कस्तूरबा के अकेलेपन के संत्रास की व्यथा-कथा है. 
लेखिका ने इस उपन्यास को सत्तर अध्यायों में बांट कर पूरा किया है. अध्याय छोटे छोटे हैं, और अपने कन्टेन्ट्स को पूरी तरह जस्टीफाई भी करते हैं. नीलिमा जी गांधी  जी के उन अतिरिक्त विवरणों से बची हैं, जो कस्तूरबा से सीधे जुड़े हुए नहीं हैं. यह उनका उद्देश्य था भी, जिसमें वे सफल रही हैं.
उपन्यास का आरम्भ पुणे के आगा खां महल से होता है, जहाँ कस्तूरबा जेल भुगतते हुए गाँधी के साथ अपने जीवन की अन्तिम साँसें ले रही हैं. इसे भूमिका कहा गया है. शेष उपन्यास जैसे कस्तूरबा की स्मृतियाँ हैं, जो उन्हें उनके अन्तिम समय में एक एक कर याद आ रही हैं, एक चलचित्र की तरह, जिसकी कभी वे स्वयं भोक्ता रही थीं.
पहला खण्ड अद्भुत है, जब कस्तूरबा और गांधी  के जन्म से पूर्व अनुभवों को लेखिका ने सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया है. अपने शुरूआती पृष्ठों में ही वे अपनी लेखकीय प्रतिभा का परिचय दे देती हैं. परिचयात्मक रूप मे लिखा गया यह खण्ड इस डायरी को एक उपन्यास की तरह स्वीकार करने में महत भूमिका निभाता है.
धीरे-धीरे  कथा कस्तूरबा के चश्में से आगे बढ़ने लगती है और गाँधी से उनके विवाह के साथ गति प्राप्त करती है. गाँधी का बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए विदेश जाने और फिर वकालात के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जाने के साथ साथ गाँधी और कस्तूरबा के सम्बंधों पर लेखिका वृहद दृष्टि डालती चलती हैं. पर गाँधी का यौन व्यवहार और उनका अडियल रवैया मुख्य भाव में बना रहता है. इसके साथ ही वे गाँधी के नकारात्मक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करना नहीं भूलतीं. हालांकि उन्होंने यह कहीं नहीं लिखा कि गाँधी अपनी विदेश यात्राओं के दौरान कभी भी यौन उछंकरल हुए हों. 
जैसे जैसे अध्याय आगे बढ़ते जाते हैं, मुझे लगने लगता है कि गाँधी का अवमूल्यन करना इस उपन्यास का मूल उद्देश्य रहा है. बार बार गाँधी के उन अंधेरे पक्षों को गहनता से लिखा गया है, जिनसे उनकी छवि घूमिल होती है. हालांकि लेखिका ने सतर्कता से गाँधी के नैतिक जीवन मूल्यों, उनके आदर्शों और उनकीप्रतिबद्धतता के समर्थन में भी अपनी कलम चलाई है, लेकिन दृढ़ता से नहीं, बल्कि संभवतः मजबूरीवश. क्यों कि गाँधी जैसी शख्सियत का अवमूल्यन करना उतना आसान भी नहीं. जब भी अवसर मिला, गाँधी को एक अडियल पति और गैरजिम्मेदार पिता के रूप में प्रस्तुत किया गया है. इतना ही नहीं, उपन्यास में दो जगह ऐसे प्रकरण हैं, जब गाँधी को यह स्वीकार करते दर्शाया गया है कि यदि कस्तूरबा की मृत्यु भी हो जाती है, तब भी ठीक ही होगा !
उपन्यास के लगभग 350 पृष्ठ गांधी  के जन्म, बचपन, शिक्षा, विवाह सहित उन तेईस वर्षों के हैं, जो गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका मे रह कर आन्दोलन करते हुए बिताए थे. शेष 200 पृष्ठ उन तैंतीस वर्षों के, जब भारत लौट कर उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया. दक्षिण अफ्रीका में बिताए इन वर्षों के विषय में लोग तुलनात्मक रूप से कम ही जानते हैं. सत्ता की क्रूरता  के विरुद्ध विद्रोह की भावना, सत्य के प्रति उनकी अप्रमित निष्ठा, उनके मानवीय सरोकार और जनहित में अपना सर्वस्व न्योछावर  करने की उनकीअदम्य इच्छा कैसे उनके मन में आहिस्ता आहिस्ता बलवती होती जाती है, यह सब इन पृष्ठों को पढ़ कर थोड़ा बहुत जाना जा सकता है. डायरी के अनुसार कस्तूरबा को गाँधी का सनकी स्वभाव, उनकी जिदों, उनके आग्रहों और उनकी प्रतिबद्धतता की भारी कीमत चुकानी पड़ी. बिना कस्तूरबा से विमर्श किए ब्रह्मचर्य का व्रत लेना और एकाधिबार अलग अलग विषयों पर स्वयं निर्णय लेकर कस्तूरबा पर थोपना जैसी घटनाएँ गांधी  का एक अलग ही रूप प्रस्तुत करती हैं. 
कस्तूरबा की अपनी कथा के साथ साथ एक समानान्तर कथा भी और भी चलती रहती है, जिसे उपन्यास में एक प्रमुख स्थान प्राप्त है. वह कथा है, उनके सबसे बड़े पुत्र हरिलाल की.  किताब का एक बहुत बड़ा हिस्सा गांधी  के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल कीपीड़ा पर केन्द्रित है, जिसे लेखिका के अनुसार, उसे उसका जायज हक़ गांधी  ने कभी नहीं दिया. गांधी ने ऐसा क्यों किया, इस पर भी वे विस्तार और दृढ़ता से प्रकाश नहीं डालती,  केवल संकेत देकर आगे बढ़ जाती हैं. कस्तूरबा के चरित्र पर हरिलाल की पीड़ा समूचे उपन्यास में हावी रही है. एक पिता अपने पुत्र के प्रति यूँ ही वैमनस्यपूर्ण नहीं हो जाता, इसकी पड़ताल बहुत ही सामान्य तरीके से की गई है, जिसे एक सजग पाठक को पंक्तियों के बीच में पढ़ना पड़ता है. 
यह तो सर्वविदित है कि हरिलाल का अपने पिता के साथ कभी सामन्जस्य नहीं रहा. यह कथा बताती है कि यूँ तो गाँधी ने अपने पुत्रों को स्वयं शिक्षा देने का प्रयास किया, किन्तु नियमित रूप से स्कूल भेजने में उन्होंने कभी रुचि नहीं ली. हरिलाल, जो बैरिस्टर बनने इंगलैंड जाना चाहता था, अवसर भी था, पर गाँधी ने हरिलाल के स्थान पर एक अन्य लड़के को भेजने का निर्णय लिया, क्यों कि वे नहीं चाहते थे कि लोग यह समझें कि उन्होंने अपनी प्रसिद्धि और ताकत का इस्तमाल अपने परिवार के लाभ के लिए किया. संभवतः यही वह बड़ी घटना थी, जिसने हरिलाल के मन में अपने पिता के प्रति विद्वेश को जन्म दिया. उपन्यास के अनुसार दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटने के बाद भी पिता और पुत्र के बीच की खाई कम होने के बजाय गहरी होती चली गई. हरिलाल को हमेशा अपने पिता का उपेक्षित व्यवहार मिला, जिस कारण वह शराबी, व्यभिचारी और एक नकारा पुत्र के रूप में उभर कर सामने आया है. वह अपनी पत्नी और परिवार के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहा. 
कथा नायिका कस्तूरबा अपने पति के नैतिक मुल्यों को दृढ़ता से प्रस्तुत करने के स्थान पर अपनी सारी सहानुभूति हरिलाल पर उंडेल देती हैं. यहाँ तक कि गाँधी की हत्या के बाद भी कस्तूरबा का स्नेह अपने उपेक्षित पुत्र के प्रति अपने पति की हत्या के दुःख से भी बड़ा जान पड़ता है. लेखिका ने हरिलाल को एक पीड़ित पुत्र की तरह चित्रित किया है, जो जैसा बन गया था, उसका प्रमुख कारण गाँधी रहे थे.
यह उपन्यास दरअसल हरिलाल की पीड़ाओं का दस्तावेज बन कर रह गया है. गाँधी जैसे किसी सहनायक की तरह पृष्ठ में चले गए हैं. ऐसा महसूस होना स्वाभाविक भी है, क्यों कि लेखिका ने गाँधी के उच्चादर्शों का गहन अन्वेषण नहीं किया है. कस्तूरबा आख़िर  गांधी  की पत्नी थीं, उनसे बेहतर यह कौन जान सकता था कि वे क्या कारक थे, जिन्होंने गांधी को गांधी  बनाया. क्यों उन्होंने धन संचय को ग़लत माना, क्यों वे अपने और दूसरों के बच्चों में भेद नहीं रखते थे, क्यों इतना सब होने बावजूद भी सब कुछ त्याग कर केवल एक धोती में रहना स्वीकार किया, क्यों वे तीन बंदरों का दर्शन लेकर आए, ”हिन्द स्वराज“ में अभिभूत कर देने वाली परिकल्पनाएँ कैसे उनके मन में आईं........ और भी बहुत सारे प्रश्न हैं जिन पर लेखिका ने अपनी कलम नहीं चलाई है, जबकि इन सब प्रश्नों से कस्तूरबा को अवश्य ही दो चार होना पड़ा होगा. जब यह कस्तूरबा की डायरी है, तो इन सबके उत्तर तो होने चाहिए थे ! उपन्यास के अन्त तक वे गांधी  के यौन प्रयोगों पर कुछ न कुछ कहती ही रही हैं.
पर लेखिका का यह वक्ततव्य कि जैसा मुझे ठीक लगा, मैंने लिखा, आप अपनी तरह से लिखना चाहें, तो लिखें, कुछ अतिरिक्त टिप्पणी करने से रोकता है, हालांकि यह वक्तव्य अपनी लेखकीय जिम्मेदारी से बचना भर है.   
लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि लेखिका का यह एक सराहनीय प्रयास है. इससे एक पाठक को एक स्त्री की दृष्टि से गांधी  को समझने में अवश्य ही मदद मिलती है, विशेषकर एक माँ कीदृष्टि से. और फिर इतने बड़े व्यक्ति पर कलम चलाना कोई छोटी बात नहीं होती. लिखने वाले को अनेक ख़तरों  से जूझते हुए अपनी राह बना कर अपना काम करना होता है. लेखिका ने लिखने से पूर्व जो अनुसंधान किया होगा, जो मेहनत की होगी, उसे सलाम!

Wednesday, March 2, 2022

रेणु का कथा जगत् और परिवेश

 


 


लेख-अंश


फणीश्वरनाथ रेणु(1921-1977) भाषाई ताज़गी, लोक संपृक्ति और जीवन की साखियों से उपजे रूपायन को लेकर साहित्य में पदार्पित होते हैं। अपने अनूठे रचानकर्म के बल पर रेणु अपनेजीवन काल में ही मिथक बन गए। उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास, कहानियाँ, रिपोर्ताज, वैचारिक-स्तंभ आदि महज़ एक रचनाकार के कोरे जीवनानुभव नहीं हैं वरन् हमारे साहित्य के ऐतिहासिक और संग्रहणीय दस्तावेज़ भी हैं। बकौल डॉ.नामवर सिंहविचार जिस प्रकार प्राप्त होता है, उसी प्रकार अभिव्यक्त भी होता है। यदि वह पुस्तकों से प्राप्त होता है, तो पुस्तकीय ढंग से प्रकट होता है। यदि वह जनारण्य से दूर एकान्त कमरे में आराम-कुर्सी के चिंतन से प्राप्त होता है, तो रचना में भी एकान्त और वैयक्तिक चिंतन का रूप लेता है, और यदि वह जीवन के संघर्षों में कुछ न्‍योछावर करने से प्राप्त होता है, तो उसी गर्मी,उसी ताज़गी, उसी सजीवता, उसी सक्रियता तथा उसी मूर्तिमत्ता के साथ रूपायित होता है।साहित्य में इसी रूपायन का महत्त्व है, जो रेणु के कथा-साहित्य में ललित, रससिक्त और प्राणवंत भाषा और कथानक की सजीवता और लोकरंग लेकर जीवंत होता है। प्रेमचंद के पश्चात् हिन्दी साहित्य में एक विशेष तरह के आभिजात्य और संभ्रांत लेखन का वर्चस्व दिखाई देता है, इस भीड़ में रेणु एक नए मुहावरे की तरह उभर कर सामने आते हैं। व्यक्तित्व अकसर कृतित्व में प्रतिबिम्बित होता है, ऐसा ही रेणु के रचाव में भी देखा जा सकता है। पतनशीलता की पराकाष्ठा को देखकर उन्होंने कहा है, अन्याय और भ्रष्टाचार अब तक मेरे लेखन का विषय रहा है और मैं सपने देखता रहा हूँ कि यह कब ख़त्म हो।1आंचलिकता की रंगभूमि पर रेणु के रचनाकर्म की भावभूमि को देखें, जिसके लिए रेणु को जाना जाता है तो उनके रचाव में आज़ादी के बाद का वह गाँव है जिसका कच्चापन टूटकर बिखर रहा है, जिस गाँव की हवाओं में लोकगीतों के स्थान पर फिल्मी गीत हैं, सामूहिकता  में दरारें हैं और एक गाँव में एक पंचायत नहीं, बल्कि हर जाति, समुदाय की अपनी पंचायत है और हर उस पंचायत के लिए अपनी एक पंचलाइट है। ज़ादी के बादगाँव शहरों की ओर पलायन कर रहे थे और जो गाँव निःशेष रह गया वहाँ भी शहरी संस्कृति काबिज़ हो गई। उनकी रसप्रियाविघटन के क्षणउच्चाटनभित्तिचित्र की मयूरी’, इन्हीं विसंगतियों से उपजी कहानियाँ हैं।  पर इससे इतर रेणु की कहानियों में अनेक अन्य रंग भी दिखाई देते हैं जिनका अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि रेणु को आंचलिकता के दायरे में बाँध कर उनका मूल्यांकन करना न केवल अपरिपक्व दृष्टि की सूचना देता है वरन् अध्येता के अध्ययन पर भी प्रश्नचिह्न लगा देता है।

 

रेणु की कलम में अनेक रंग है और हिन्दी भाषा उनकी ऋणी है क्योंकि लोक रंग के हों या दैनन्दिन जीवन से संबंधित उन्होंने एक विपुल शब्द-संपदा हिन्दी को सौंपी है। रेणु की संवेदनाओं को समझने-पकड़नेऔर उन्हें कल्पना का सहारा ले शब्दों में ढालने का प्रातिभ अनूठा हैनितांत ज़मीन की ख़ुशबू से रचे शब्दों को खड़ी बोली के फ्रेम में रखकर उन्होंने ऐसे प्रस्तुत किया कि वे उनके पाठकों की स्मृति में हमेशा-हमेशा के लिए जड़े रह गए।  उनके लेखन का अधिकांश इस अर्थ में बार-बार पठनीय है। दूसरे जिस कारण से रेणु को लौट-लौटकर पढ़ना ज़रूरी हो जाता है, वह है उनकी संवेदना और उसे शब्दों में चित्रित करने की उनकी कला। वे भारतीय लोकजीवन और जनसाधारण के अस्तित्व के लिए निर्णायक अस्तित्व रखनेवाली भावधाराओं को तकरीबन जादुई ढंग से पकड़ते हैं और उतनी ही कुशलता से उसे पाठक के सामने प्रस्तुत कर देते हैं।2

 

रेणु की सर्जन यात्रा के प्रारंभ को देखें तो उन्होंने अपनेसाहित्यिक जीवन का प्रारंभ सन् 1940 के आस-पास कविताओं से किया था और वे कविताएँ पूर्णिया नगर से उस समय निकलने वाली पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहतीं थीं।3 रेणु की पहली कहानी बटबाबा1944 में साप्ताहिक विश्वमित्र (कलकत्ता) में छपी थी।रचनाकाल की दृष्टि से देखें तो रेणु की कहानियां मैला आंचल (1954) के प्रकाशन के दस वर्ष पहले हीदर्जन भर कहानियाँ प्रकाशित हो गई थीं। 1953 मेंउनकी दो कहानियाँ‘टौन्टी नैन का खेल और वंडरफुल स्टूडियो प्रकाशित हुईं। पर इन कहानियों में रेणु की उल्लेखनीयता देश के एक पिछड़े हुए क्षेत्र के आंचलिक स्वरूप का सूक्ष्म विवरणों से युक्त चित्रण मात्र है।रसप्रिया(1955) रेणु की पहली कहानी है,जिसने उन्हें एकबारगी हिन्दी के श्रेष्ठ कहानीकारों की पंक्ति में बिठा दिया।दूसरे ही वर्ष(1956प्रकाशित तीसरी कसम ने तो कहानीकार के रूप में रेणु की अमिट पहचान भी पक्की कर दी। इसके बाद रेणु की लाल पान की बेगमठेसतीन बिन्दियाँपंचलाइट, ‘सिरपंचमी का सगुन, ‘तीर्थोदक’नित्यलीला, ‘नेपथ्य का अभिनेता, कपड़घर (1957-60) आदि एक दर्जन से ऊपर कहानियाँ और ठुमरी’ नामक कहानी संग्रह (1959)प्रकाशित हुआ।... ठुमरी की भूमिका में रेणु ने इसमें संकलित सभी कथाओं का अंतर मार्ग एक ही बताया था उन्होंने अपने को ठुमरी का कथा गायक बताते हुए कहा है कि जिस प्रकार गीत के अंतर मार्ग विंग बीच-बीच में विभिन्न स्वरों के प्रयोग से वैचित्र्य और कारकार्य संपादित होता है एक स्वर को लेकर विभिन्न स्वरूप से उसकी संति दिखलाकर ही किसी राग के रूप को प्रकाशित किया जाता है उसी प्रकार इस संग्रह क एकाधिक कथाओं में एक ही विशेष मुहूर्त को विभिन्न परिवेश में रखकर रूपायित किया गया है।4

 

इस प्रकार नयी कहानी से पूर्व पाँचवे दशक में उनकी कई कहानियाँ प्रकाशित हुई। पर ये कहानियाँ मैला आँचल और परती परिकथा के शिल्प से आगे की कहानियाँ थीं। इन कहानियों में उनकी परिवेश को देखने की समझ, समसामयिक प्रवृत्तियों को पकड़ने की परिपक्व दृष्टि देखी जा सकती है।नयी कहानी के दौर को केवल महानगरीय परिवेश की कहानी समझना या संभ्रात वर्ग और नवमानव की कहानी समझना उसके फलक को सीमित करना है। दरअसल नई कहानी अनेक कथाधाराओं का समुच्चय है, जिसमें विषयवस्तु, परिस्थितियों, परिवेश, दृष्टि, प्रतिबद्धताओं का वैविध्य है। यह कोई वाद नहीं है, कोई धारा नहीं है,वरन् सर्जन का प्रगतिशील रुझान है। वस्तुतः नई कहानी कोई विशेष प्रवृत्ति न होकर एक आंदोलन है जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रवृत्तियों के दर्शन होते हैं । नई कहानी के साथ ग्रामीण अंचलों की कहानिया लिखने वाले रेणु,मार्कण्डे,शिवप्रसाद सिंह भी जुड़े हैं और लोल के रूप में लंदन,पेरिस, न्यूयॉर्क आदि को अपनाने वाले निर्मल वर्मा,उषा प्रियंवदा और विजय चौहान जैसे लेख भी भारतीय कस्बों, नगरों और महानगरों की कहानिया लिखने वाले कमलेश्वर, अमरकान्त, मोहन राकेश, विष्णु साहनी, राजेंद्र यादव तो इसके साथ है ही। जितनी विविधता नई कहानी में कथ्य की दृष्टि से मिलती है प्राय: उतनी ही शिल्प के रूप में भी दृष्टिगोचर होती है। जहाँ छोटे-छोटे अनुभव खंडों से बुना निर्मल वर्मा की कहानियों का टेक्सचर मिलता है, वही अनगढ़त का आभास तथा मर्दाना लय’ काएहसास देने वाल ज़नाना कहानीकार कृष्णा सोबती की शिल्प-चेतना और भाषा भी मिलती है5 स्पष्ट है नई कहानी विषय की दृष्टि से बहुलतावादी वैविध्य लेकर चलती है। वहाँ आत्मपीड़न की व्यथा तो है ही साथ ही सामाजिक उत्पीड़न और विसंगतियाँ भी। नया कहानीकार इसी वैविध्य को एक साथ अनेक स्तरों पर एक साथ लाने का प्रयास करता दिखाई देता है। डॉ नामवर सिंह इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि वस्तुतः आज का कहानीकार समाज में स्वयं इतनापीड़ित है कि वह अपने समानधर्मी लोगों के बीच अपनी पीड़ा बाँटने के लिए कुछ अपनी और कुछ उनकी कहने के लिए विवश है।6  रेणु एक तरफ कहानी की परम्परा का निर्वहन करते हुए अपनी विशिष्ट मानवीय संवेदना से प्रेमचंद के उत्तराधिकारी कहे जाते हैं, जो उनकी रिक्थ को सहेजता है, तो दूसरी ओर वे आज़ाद भारत और आधुनिकीकरण की बयार की तासीर भी क़रीब से पकड़ते हैं, यद्यपि आनुपातिक दृष्टि से वे कहानियाँ कम हैं और शिल्प की दृष्टि से साधारण।

 

रेणु का दूसरा कहानी-संग्रह आदिम रात्रि की महक’ 1967 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। 'अगिनखोर’ रेणु का तीसरा कथा-संग्रह है जो सन् 1974 में संभावना प्रकाशन, हापुड़ से छपा।7 इन तीन कथा संग्रहों के अतिरिक्त रेणु के कुछ अन्य कहानी-संग्रह भी मिलते हैं।इनमें सबसे पहला स्वयं रेणु द्वारा संपादित हाथ का जस(1962)कथा-संग्रह है जिसमें रेणु के साथ हिमांशु श्रीवास्तव और रणधीर सिन्‍हाकी कहानियाँसंकलित है। राजेन्द्र यादव संपादित नए कहानीकार’ पुस्तक-माला के अंतर्गत 1964 में फणीश्वरनाथ रेणु श्रेष्ठ कहानियाँशीर्षक से छपा। इसके पश्चात् राजपाल एंड संज़से 1974 में मेरी प्रिय कहानियाँ शीर्षक से रेणु की नौ कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ।

 

बचपन से ही विद्रोही तेवर रखने वाले इस क्रांतिदूत ने अपने लेखन का कारवाँ कविता से प्रारंभ किया और फिर कहानी, रिपोर्ताज औरउपन्यास के क्षेत्र में कदम रखा, परन्तु मृत्यु से ऐन पहले इमरजेंसी पर अपनी कविता लिखते हुए वे आपातकाल का विरोध करते हुए आज़ादीके हक में खड़े होते हैं। रेणु के लिए आज़ादी के व्यापक मायने हैं। कौल रेणु मैंने आज़ादी की लड़ाई आज के भारत के लिए नहीं लड़ी थी। अन्याय औऱ भ्रष्टाचार अब तक मेरे लेखन का विषय रहा है और मैं सपने देखता हूँ कि यह कब खत्म हो। अपने सपनों को साकार करने के लिए जन संघर्ष में सक्रिय हो गया हूँ।8