Saturday, February 14, 2015

‘प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब कोई निबहत नाहिं’

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          ‘प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब कोई निबहत नाहिं


सृष्टि का प्रत्येक तत्व द्वन्द्व से उपजा है  फिर भी प्रकृति की एक लय है और इसके इसी लय में छिपा है अद्वैत का छंद । द्वैत से अद्वैत के इस प्रेममय सफर में ही प्रकृति का हर उपादान धड़कता है , रससिक्त होता है और निराकार से साकार रूप को प्राप्त होता है। अरूप से रूप की इस यात्रा में ही इस धरा और गगन के बीच सारी मैत्रियां जन्म लेती है, विकसती हैं और प्रेम तक पहुँचती है। वस्तुतः मैत्री के बसंत से प्रेम का फूल उसी प्रकार फूलता है  जैसे सावन के आने पर धरा धानी चुनर ओढ लेती है। प्रत्येक प्रेम मैत्री से पूर्णता पाता है और विरोधी व्यक्तित्वों तक को विलीन कर लेता है। प्रेम के ये महीन तंतु केवल युवावस्था में ही विकसते हों यह ज़रूरी नहीं प्रेम तो हर अवस्था में धड़कता है । प्रेम के मानुष स्वरूप को देखें तो पुरुष और स्त्री में दैहिक, मानसिक और ह्रदय के स्तर पर वैपरित्य देखने को मिलता है।  पुरुष अहंमन्य है तो स्त्री विनीत, एक सदा प्राप्त करना चाहता है तो दूसरा सदैव देने को तत्पर ।  पुरूष मैत्री प्राप्त करते ही उस पर आधिपत्य प्राप्त करना चाहता है उसे पा लेना चाहता है और अगर इस समर्पण में ना मिले तो बैचेन हो उठता है। इसके विपरीत स्त्री देह से नहीं वरन् ह्रदय के स्तर पर जुड़ती है और उसे प्रेम की चरम अवस्था प्राप्त करने के लिए दैहिक जुड़ाव की आवश्यकता नहीं होती वरन् वह प्रेम के दो मीठे बोलों से ही आह्लादित हो जाती है।  यही नहीं इसकी अनुगूंज को वह कई कई वर्षों तक उसी तीव्रता से सुनने का सामर्थ्य भी रखती है। एक का स्वभाव कोमल है तो दूसरे में अधिकार भाव की प्रबलता। वस्तुतः यही वैपरित्य ही परस्पर आकर्षण का मूल है जिसके प्रभाव में सारे विरोध घुल जाते हैं और परस्पर प्रीति उपजती है। जीवन केवल तर्कों पर आधारित रहकर नहीं जिया जा सकता यही कारण है कि प्रेम के अजस्र सोते की मनुष्को सदैव आवश्यकता है और जब वह मैत्री के शिखर पर पहुंच कर प्रवाहमान होता है तो फिर प्रेम अखण्ड हो जाता है। अपने हमराह के विचारों का स्वागत करना, समस्याओं पर सहमंथन करना, स्वीकृति अस्वीकृति दोनों का सम्मान करना, सुख दुख को साझा बिताना प्रेम और मैत्री के उच्चतम पड़ाव है। मित्रता का स्थायी भाव ही परस्पर समन्वय और सहभागिता है यही कारण है कि जब मित्रता किसी भी रिश्ते में उतरती है तो वह एक ऐसे पुल का निर्माण करती है जिसमें दो विरोधी व्यक्तित्वों का मिलन हो जाता है। आमतौर पर जिस दैहिक आकर्षण को प्रेम कह दिया जाता है वह प्रेम नहीं है वह प्रेम की क्षणिक अवस्था है जो आकर्षण समाप्त होते ही लुप्त हो जाती हैवास्तविक प्रेम तो कामना, आशा और वासना विहीन होता है और इस प्रेम का निबाह भी हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रेम का न कोई आदि होता है ना ही अंत।  किसी आध्यात्मिक पगडण्डी की ही तरह यह हर आत्मा को उस आनंदावस्था तक पहुंचा देता है जहां कोई विरला ही पहुंच पाता है। सच है  प्रेम से बड़ा जिंदगी का ककहरा और कोई नहीं हो सकता जो जीवनपर्यंत साझा स्मृतियों, जीवंत संवेदनाओं, भावाकुल तन्मयता और विरह की उदासियों के माध्यम से सतरंगी शैली में जीवन के अनमोल  शब्द कोश का निर्माण करता रहता है। प्रेम उस धड़कती सांस की तरह है जिसके बिना जीवन बेमानी है।  इस बारे में मैक्समूलर कहते हैं कि " एक फूल नहीं खिल सकता अगर धूप ना हो और कोई इंसान जी नहीं सकता अगर मोहब्बत ना हो" अतः प्रेम हर व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता है औऱ प्रेम का यह पुष्प आज जल्दी ही कुम्हलाता सा नज़र आता है तो इसके कई कारण है। आज प्रेम में एक दूसरे की भावनाओँ का सम्मान नहीं किया जाता। सब कुछ एक चरम पर जीने की तलब सी है। धैर्य , सहिष्णुता और समन्वय का स्थान अहंजन्य मानसिकता ने ले लिया है। प्रेम आज अधीर हो चला है। मिला तो कुछ पल का और नहीं तो जबरन प्राप्ति का भाव पनप रहा है। एकतरफा प्रेम ऐसे ही आकर्षण की उपज है जहां प्रेम का बीज एक ह्रदय में पनपता है और हासिल करने के उद्देश्य से विस्तार प्राप्त करता है। वह ना सुनने का आदी नही है। एक दूसरे की भावनाओं का आदर नहीं है । यही कारण है कि आज ऐसिड अटैक जैसे अपराध बढ रहे हैं। यांत्रिकता और इस जटिल जीवन चक्र की आपाधापी ने संबंधों में एक जटिलता ला दी है। इसी का नतीजा है कि आज ऱिश्तों का ठहराव और आपसी समझ समाप्त हो चले हैं और युवा अवसाद के गह्वर में फसते जा रहे हैं।  अतिशय बौद्धिकता और वैचारिकता के इस वातावरण में स्त्री और पुरूष दोनों ही तत्वों में ह्रदय तत्व शून्य हो गया है। आज स्त्री की मनोदशा भी पुरूष सी हो चली है औऱ  कई भूमिकाओं में वह प्रसाद की इड़ा का अनुसरण करती हुई ही नज़र आती है कि सिर चढ़ी रही पाया ना ह्रदय। वस्तुतः सारा तर्क प्रेम के अभाव की ही उपज है। आज ह्रदय ,ह्रदय में अविश्वास की दूरी है , यही कारण है कि अबोले प्रेम को भाषा की आवश्यकता  महसूसने लगी है वह अभिव्यक्त होना चाहता है इसीलिए दिन विशेष के माध्यम का सहारा कभी प्रपोज डे, कभी चॉकलेट डे तो कभी वैलेंटाईन डे के माध्यम से लिया जाता है। अगर प्रेम में वास्तविक अदूरी है , सहजता है तो फिर  उसे किसी भी दिखावे की आवश्यकता नहीं है वह तो साल दर साल और खिलता जाएगा। अगर सच्चे दिल से प्रेम को महसूसा जाए तो मुस्कुराह़टों का यह माली हर होंठ पर उल्लास का मधुर गीत सजा देगा जिसकी गूँज से रोम रोम पुलकित हो उठेगा।