Wednesday, August 19, 2020

मन के घाव मरहम मन का

 जीवन का हर बीतता, रीतता, गुज़रता  हुआ पल जीवन की सच्चाई है। कई दृश्य इन पलों में जुड़ते जाते हैं। कुछ चाहे तो कुछ अनचाहे पर ...पल की नियति यही कि उसे बस गुज़र जाना होता है। कभी ये तुषार पात से कृषण नष्ट कर जाते हैं तो कभी अनचाहे ही गोद भर जाते हैं।


जीते हुए , चलते हुए यही जाना कि सात्त्विक सत्ताएँ कर्म की गुत्थियाँ सुलझाती हैं। कभी मन डूबने लगे और एकाएक कोई कहकहा कहकशाँ सा कानों में गूँज जाए तो उसे तुम तक पहुँचाने वाले को धन्यवाद कहना उसे देर तक निहारना , मौन आभार व्यक्त करना। 


जीवन जी लिया जाना तुम्हारा सच है , एकमात्र सच और इस सच को केवल तुम्हीं जान सकते हो। पतझड़ का शोक और वसंत के उल्लास को तुम्हीं ने जी भर जिया है । जीवन की पीडा को अकेले ही सहा है सो कभी कोई आत्मीय कहे कि मेरे न होने पर ऐसा कैसे करोगे तो कहना मुस्कुराते हुए कि तुम सदा साथ रहोगे मेरे , मेरे इस विश्वास की ही तरह। 


किसी मंदिर जाती वृद्धा से पूछो आस्था के मानी क्या होते हैं , किसी मकतब में बैठे उस अबोध से पूछो जो क़ुरान की आयतों को मौलवी के गोल होते ओंठों में पढ़ने की कोशिश करता है , दुनिया उतनी ही सरल है जितने हमारे भाव और उथली उतनी ही जितना हमारा मन। 


ठीक ही कहा है कि ऊर्जा का अनियंत्रित प्रवाह वजू को तोड़ देता है, इबादत में ख़लल पैदा करता है। सो बहने दो सकारात्मकता का सोता अपने भीतर । दंभ, झूठ , अहंमन्यता और पक्षपात जैसे शब्दों को जहाँ देखों वहीं छोड़ दो एक सद्भावना के साथ कि तुम्हारी क्रूरता कहीं तुम पर ही हावी न हो जाए , प्रार्थना तुम्हारे लिए कि तुम पर सात्त्विक अनुग्रह बरसे । निंदा से बच गए तो तर गए सो ठूँठपन  ठूँठ मन को ही मुबारक़। 


कबीर इसीलिए तो कह गए कि -

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

 कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे यदा-कदा दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीडा होती है । हरिऔध ने भी इन्हीं भावों के साथ ‘एक तिनका’ कविता लिखी।


 आज इतना ही कहना कि -


समाज आत्मीय जन से नहीं 

आत्मीय मन से बनता है

इससे कम और ज़्यादा 

कुछ नही समाज

न ही मानी कुछ ओर 

इस गोल दुनिया के


यहाँ दृश्य ज़ल्दी ही 

बदल जाया करते हैं


सुबह ...घनेरी शाम में 

और उदास शाम पूरबी उजास में!


काल के दिन वर्तुल अयन पर घूमते हैं

जाने कब वे 

उसी घुमाव पर 

लाकर तुम्हें खड़ा कर दे 

जहाँ तुम कल इठलाते हुए खड़े थे

और ठीक वहीं कोई मूक मन लिए 

सहमा बैठा था


सो नतशिर रहना 

नतमन रहना 

जीतना मन कालुष्य को

बनना आत्मीय 

बनना सहज,जीतना स्व को

और रहना 


अविजित!!


विमलेश शर्मा

#मन_के_घाव_मरहम_मन_का

Monday, July 20, 2020

ज़रूरी_ ग़ैरज़रूरी

एक दूजे का हाथ थामे चलना महत्त्वपूर्ण होता है ...स्पर्धा, प्रतिस्पर्धा कितनी तो नकारात्मक ऊर्जा वाले शब्द हैं ...इन्हीं की ओट में जाने कितनी ऊर्वराओं  ने दम तोड़ दिया जाने कितनी आवाज़ों ने मौन साध लिया और जाने कितने होश और जज़्बों से पगे अरमानों की राह में ये ही शब्द और नकारात्मक उत्प्रेरक से आ खड़े हुए ।

पर हमें इनके प्रयोग का शऊर नहीं ही आया।

हम यह सब भलीभाँति जानते हैं पर जब आस-पास घटते देखते हैं तो नहीं बोल पाते हैं ;प्रतिरोध नहीं कर पाते हैं ...’प्रति’ उपसर्ग यहाँ भी जुड़ा पर इसके जुड़ने के ज़रूरी प्रत्यय को हम ग़ैरज़रूरी बना देते हैं ।

दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए योग्यताओं का सम्मान ज़रूरी है , नवीन और ऊर्वरा का स्वागत ज़रूरी है , ज़रूरी है उतनी ही जड़ों और बड़ों की सहेजन भी , ज़रूरी हैं बेख़ौफ़ साये भी उन दरख़्तों के जो बस छाँव देना जानते हैं , जो थामना -सुधारना-आशीषना जानते हैं ...पर उफ़्फ़ कितने ‘पर’ हैं यहाँ!

भली-सी बातें लगती है न ये सब ...पर बस उपमान ही बनकर रह जाती हैं ।

बात इतनी-सी ही तो है...

“दुनिया सुन्दर हमीं से है
असुन्दर भी हमीं से ही! “

#यह_दुनिया_ग़र_मिल_भी_जाए_तो_क्या_है

Monday, June 15, 2020

खुशियाँ अंतस् की प्रतिध्वनियाँ हैं!







खुशियाँ अंतस् की प्रतिध्वनियाँ हैं!!!


जीवन कोमल प्रार्थनाओं के फलीभूत होने सा ही होता है -पवित्र, निर्मल और पूर्णतया सात्त्विक। हम सभी स्वजीवन की पगडंडियों पर अजान यात्राओं के राही हैं। इस यात्रा में कुछ ऐसा है जो हम जैसा ही है, जो हमें आकर्षित करता है, जो हमें राह दिखा कर कुछ देर जीवन को पुलक से भर जाता है, जो हमें हमारी आत्मा के अंश जैसा ही लगता है; सर्वथा अनुकूल ।  आध्यात्मिक व्याकरण की ऐसी अनुभूतियाँ जीवन से जुड़ने पर ही महसूस की जा सकती हैं। जीवन की किसी साँझ में जाने कौन अजान आशीष धरते हाथों से एक दिया किसी चौखट पर जला जाता है और हम उसे आसमानी आशीष की मुस्कराहट मान किसी बुत को पूजने लगते हैं। प्रकृति का हर उपादान ऐसे ही चमत्कारों और जाने कितनी कीमिया और रहस्यों से ही तो भरा है।

प्रकृति के पोर-पोर में छिपा है जीवन का संदेश

फुनगियों पर चमकती शाम की आखिरी धूप हो या हवा के थपेडें में किसी शाख से विलग होता हुआ कोई दल; वह हर आँख को जीने का कोई संदेश देकर जाता है। यह निर्भर उस आँख पर करता है कि वह उस संदेश को कितना देख पा रहा है , या कितना जी पा रहा है। निर्मल वर्मा कहते हैं कि-‘ इस दुनिया में कितनी दुनियाएँ खाली पड़ी रहती हैं, जबकि लोग ग़लत ज़गह पर रहकर सारी ज़िन्दगी गँवा देते हैं।’ सुखी रहने के लिए इन जगहों का ही सही चुनाव करना भर होता है। जीवन एक सतत यात्रा है और इस यात्रा में  जाने कितने वक्फों में, बारिश की  बूँदों की ही तरह माथे  पर कोमल नेह बरसता रहता है।यह कई बार उस पागल प्रेमी की ही तरह होता है जो लाख उपेक्षा करने के बाद भी अपनी थाप भर से जीवन में रस घोल देने को आमादा हो जाता है। बस तुम्हें बनना होता है तो समर्पिता पृथ्वी कि आकाश तुम पर बेसाख्ता टूट पड़े।



यहाँ सत्य कुछ भी नहीं

जीवन में शाश्वत कुछ भी नहीं फिर भविष्य के अजाने खौंफ से जेबे भारी करने का कोई नतीजा है भी नहीं। दूसरी ओर जो बीत गई सो बात गई ठीक ही कहा गया है। अतीत को पीठ पर लादे चलने का भी कोई औचित्य नहीं । अतीत व्याघात तो दे सकता है पर मार्गदर्शक नहीं हो सकता। वह करणीय, अकरणीय का बोध तो करा सकता है पर नई राहों का पता नहीं बता सकता। यहाँ तो जीने का सलीका यही है कि जितनी चवन्नियाँ बर्फ के गोलों पर खर्च कर दिए जाए वो ईश्वर की  याद में फेरे गए मनकों की ही तरह जीवन का हासिल है। मनुष्य का हृदय इस जगत् की सबसे पवित्र वस्तु है। यहाँ खिलने वाले फूल कोमल और इतने नाजुक होते हैं कि छूने भर से उनकी रंगत बदल जाती है , इसलिए कोशिश करना की वे सहज भाव से खिलते रहें। उन्हें परम्पराओं की खाद देना और सभ्यताओं का सलीका कि वे आदिम भले बनें रहें पर आदमी की ही तर्ज़ पर। इन फूलों को खिलने देना कि यह खिलना ही प्रकृति का सबसे खूबसूरत राग है ।

प्रकृति के छंद सहज पुलक के निर्माता हैं

जाने कौनसा छंद प्रकृति सहेजती है कि जब वह माथे पर बरसता है, तो हर आँख हँस देती है। यह हँसी, पुलक उस रात के दर्द को भी लील जाती है जब चाँद फूल-फूल झरने के बज़ाय बादलों की ओट में छिप कर रोया था। जीवन की घटनाओं को सहेजना सायास नहीं होता वे अपने कौतुहल या दर्द के अतिरेक से स्वयं आकार ले लेती हैं अपने भीतर। और सुरक्षित रहती हैं ठीक वैसे ही जैसे माँ की कोख में कोई बालक। अनुकूल अवसर आने पर आप उस नरम फोहे के अहसास को महसूस कर सकते हैं। परन्तु घटनाओं से चिपके रहकर थम जाना जीवन से विमुख होना है।

प्रकृति का संतुलन बेजोड़ है

प्रकृति का हर उपादान अपने नर्तन से जीवन नाविन्य और सातत्य का एक नया संदेश देता जान पड़ता है। फिर अगर कोई जन्म और फिर मृत्यु को ही जीवन का अंतिम सत्य मान ले तो, उस जीव सा मूर्ख और नासमझ तो कोई और होगा ही नहीं। मृत्यु से पूर्व जीवन में अजीवन का हस्तक्षेप प्रकृति की सकारात्मक वृत्ति में धुर विरोधी अवधारणा है। दरअसल जीवन में जो करीब है वो हमें दिखाई नहीं देता और जो साँसों में शामिल है उसका पता भी नहीं चलता। यही इस जीवन की विडम्बना है। जो दूर है, अप्रस्तुत है वो मनुष्य को आकर्षित करता है। जो कल्पित है वह उसे चमत्कार से भर देता है पर जो करीब है वो कल-कल बहता रहस्य , मन के गह्वरों में छिपा है। जो अगर खोज लिया जाए तो कबीर की उलटबाँसियाँ सच साबित हो जाएगी नहीं तो ‘ताका जल कोई हंसा पीवै बिरला आदि बिचारी की ही तर्ज़ पर’ जीवन की भूलभूलैया में इंसान कहीं खो जाएगा।

खुशियाँ अंतस् की अन्तर्ध्वनियाँ हैं

खुशियों की खोज में हर व्यक्ति बाहर की यात्रा करता रहता है। नतीजतन वह रिक्त हो जाता है। इस रिक्तता को भरने के लिए खुद का ही योग करना पड़ता है। जीवन के गणित के सूत्र वाकई अद्भुत है, यहाँ के दुःख रहस्यों की चाबियाँ हैं जो जीवन जीने के नज़रिए में कुछ न कुछ नया जोड़ देते हैं। जगत् की रीति कहती है कि विषम का योग किया जाए तो यहाँ चमत्कारी परिणाम देखने को मिलते हैं । यहाँ दुःख आत्मा का श्रृंगार है तो प्रेम हरसिंगार का नाजुक फूल।इसी धरा पर स्याह रात की आदिम गंध जाने कौनसी चमकीली सुबहों के तार छिपाए रहती है कि पृथ्वी के सीने पर प्रातः एक धूप का फूल चुपचाप खिल उठता है। सर्जन मौन होता है , विध्वंस शोर करता है। सर्जन वेदनाओं की अनन्य सीमाओं को लाँघता है पर तीक्ष्ण वेदनाएँ ही जीवन में अनुभवों के मोती जोड़ती है । जीवन का ऐसा पाठ सिखाती हैं जिसका अभ्यास सौ जीवन जीने पर भी नसीब नहीं होता । सच है यह! यकीन नहीं होता तो किसी बच्चे की कोमल आँखों में झाँकिए ईश्वर मुस्कुराता हुआ मिलेगा। ठीक उसी तरह जैसे मानों कोई कच्ची प्रार्थना सहज ही सुन ली गई हो। यहाँ ईश्वर को खोजने निकलोगे तो कुछ ज़िंदा अक्स सहसा उभरते हुए मिलेंगे और हज़ारों बरसों के तजुर्बात पानियों पर तिरते। अजब है यह जीवन-दर्शन पर संशय कपाट अनावृत्त करने पर ही है यहाँ वास्तविक जीवन सिद्धि !

 लिखा गया था अहा ज़िंदगी के लिए कभी!

विमलेश शर्मा

Tuesday, June 2, 2020

एक मतवाली रानी थी ...बस यही उसकी कहानी थी!






यह बात वैसी ही है जैसे बारिश बीत जाने पर बात बारिश की पर बारिश कहाँ बीत पाती है वह तो स्मृति में दर्ज हो जाती है किसी अनुस्मृति की तरह ...और कोई उससे मुक्त होना चाहे तो भी कैसे और भला क्यों कर !

ऐसी ही बात एक फ़िल्म की जिस पर बेवज़ह बवाल हुआ और ख़ासी आलोचना भी । यों मन नकारात्मक आलोचना पर कान नहीं धरता पर राजस्थान के चटख रंग , राठौड़ा री आन ( ओ म्हानै राठौड़ा री बोली प्यारी लागे म्हारी  माँ), घेर घूमेर घाघरा और घूमर मन के बहुत पास बजता है तो देखनी तो थी ही सो आज मुझ तक पहुँची यह भी।

कुछ तो लोक का असर है कि ये रजवाड़े खींचते हैं अपनी ओर और कुछ समय को मानती हूँ कि हर चीज का आप तक पहुँचने का एक वक़्त होता है सो आज ‘पद्मावती’ पहुँची मुझ तक। वह पद्मावती जिसे इतिहासकार कल्पना भी मानते हैं पर वह कल्पना नहीं मोहक व्यक्तित्व की स्वामिनी और प्रेम - निष्ठा में पगी एक रानी थी । धन -स्त्री और सत्ता प्रसार इतिहास के हर उन्मादी राजा के लिए केन्द्र में रहे हैं , यहाँ भी हैं।

घणी घणी खम्मा...ये ही शब्द राग में तिरते रहते हैं जब पद्मावत का पहले-पहल दृश्य-मंच आँखों पर बिछने लगता है , तब जब यह फ़िल्म अपना और अपने किरदारों का वास्तविक परिचय दे रही होती है।

फ़िल्म के प्रारम्भ में ही लोक समृद्ध लगता है ...लोक तो होता ही समृद्ध है पर कलाकार या सहृदय उससे स्वयं को कितना भर पाता है यह महत्त्वपूर्ण होता है ।दीवारों पर लोक उरेहन और पार्श्व में बजता मद्धम लोक संगीत ...तो शुरुआत अच्छी रही । आप यों कह सकते हैं कि भव्यता की पदचाप सुनाती हुई-सी।

पहला ही दृश्य जलालुद्दीन ख़िलजी का और फिर सनकी अलाउद्दीन का ...इतिहास की थोड़ी बहुत समझ रखने वालों को ये किरदार अपनी अदाकारी से बहुत अधिक समृद्ध कर देता है। मंगोल फ़तह करना, अपने ही चाचा जलालुद्दीन को मौत के घाट उतारकर तख़्ता पलट करना , इतात खान को मौत के घाट उतारना और उसकी स्त्री- लम्पटता को चरम पर दिखाते जाने कितने वीभत्स  दृश्य हैं जिन्हें रणवीर ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है । रणवीर सिंह को देखकर लगता है कि सफलता के लिए बस मेहनत की ज़रूरत होती है, और कुछ नहीं ...हालाँकि यह इस समय की एकपक्षीय सच्चाई पर उसे देखकर इस बात पर यक़ीन होता है ।

तख़्ता-पलट जैसी क्रूरताओं के लिए कहा गया है कि यह सल्तनत का दस्तूर है , सच ही तो है कि सत्ता पर एक सनक सवार होती है और यह सनक स्वकेन्द्रित हो जाए तो फिर जनता के लिए जीना मुश्किल हो जाता है ।
मेहरुन्निसा के साथ ज़्यादती अलाउद्दीन की सनक का पता स्वयं देती है, चित्तौड़गढ़ के क़िले के बाहर हताश और विद्रोह करती अपनी सेना को ढाढ़स बँधाता अलाउद्दीन और फिर सकारात्मक परिणाम पाकर वज़ीर को आँख का इशारा करता अलाउद्दीन कितनी बातें प्रकारांतर से कह जाता है ...दृश्यों में इसी प्रकार तो अर्थ -स्फीतियाँ होती हैं और यही मन पर अंकित रह जाती हैं ।

मलिक काफ़ूर की बात की जानी चाहिए कुछ...एक गुलाम जिसे अपनी ग़ुलामी का एहसास नहीं है जो अलाउद्दीन से प्रेम करता है ...दैहिक प्रेम और यही कारण है कि वह उसके आस-पास किसी स्त्री की मौजूदगी को स्वीकार नहीं कर पाता है। वह प्रेम करता है ;परन्तु किसी राजा की एकाधिक रानियों की ही तरह उसमें भी सौतिया-डाह है जो अनेक स्तरों पर उद्घाटित हुआ है।

मेहरून्निसा का प्रेम से पीडा तक का सफ़र हरमों की दबी सच्चाइयाँ हैं जहाँ मल्लिका -ए -जहाँ को महारानी पद्मावती  का इस्तक़बाल करना भी एक मजबूरी बन जाता है ।

“उसूल इंसानों के लिए होते हैं जानवरों के लिए नहीं”, कहन अलाउद्दीन की क्रूरताओं के लिए सच ही जान पड़ता है ।

दूसरी ओर पद्मावती जिसे साहित्य की विद्यार्थी होने के नाते जायसी के रचे में ख़ूब पढ़ा है ; उसकी नागमणी का विरह-वर्णन तो समूचे मरुभूमि को डूबो देने का सामर्थ्य रखता है पर यहाँ वह नागमति अनुपस्थित है पर पद्मावती का सौन्दर्य मैंने जायसी के शब्दों से ही देखा है-

“वह पदमिनि चितउर जो आनी । काया कुंदन द्वादसबानी ॥
कुंदन कनक ताहि नहिं बासा । वह सुगंध जस कँवल बिगासा ॥”

रतनसेन और पद्मावती का प्रेम सच्चा, तरल और समर्पित है वहीं पहली रानी नागमति को जीवन से विरक्त दिखाने के पीछे रजवाड़ों में एकपत्नीव्रत का अभाव होने की पीड़ा को ही अधिक उद्घाटित करता है।  रत्नसेन को उसी तरह चित्रित किया गया है जिस तरह एक बलशाली राजा के समक्ष सभी युक्तियों से जूझते हुए दिखाया जाना चाहिए ।

राघव-चेतन का विद्रोह तनिक अतिरंजना लिए है जो अंत तक बना रहता है और मेवाड़ के होम होने का कारक बनता है । पर यह भी संदेश देता हुआ कि राग यमन कभी चंदन की ख़ुशबू देता है तो कभी ग़ुलामी की दुर्गंध भी...चयन हमारा ही होता है।




पटकथा के मूल में स्पष्ट संदेश है कि, ‘सौन्दर्य घातक नहीं था/ होता वरन् उसकी ओर उठने वाली कुदृष्टि घातक थी/ होती है।’ पर यह लोक बार-बार अपने हर कुकृत्य से यह सिद्ध करता है कि दोष रूप का होता है , स्त्री-देह का होता है उस पर उठने वाली आँख का नहीं। जाने क्यों ये शब्द स्वयं निकले जब रानी आठ सौ दासियों के वेश में सेना को लेकर चल पड़ती है कि,”स्त्री को कम मत आँकों जब वो चुप हो जाती है तो प्रकृति उसका साथ देती है।” हाँ! आप चाहें तो इसे मेरी स्त्री-दृष्टि कह सकते हैं ।

गोरा और बादल जैसे कर्तव्यनिष्ठ और जाँबाज़ साथी हो तो चित्तौड़ अभेद्य हो ही जाता है । उनके ही साथ उनकी माँए जो इला ने देणी आपणी जैसी घुट्टी उन्हें हिंडोले में हर श्वास के साथ देती है । पद्मावती के दिल्ली जाने न जाने पर विरोधाभास मिलते हैं पर सात-सौ (फ़िल्म में आठ सौ) डोले और उनमें स्त्री-वेश में वीर जाने की बात को कितने ही इतिहास-ग्रंथों में मिलती है। इस संदर्भ में नरेन्द्र मिश्र जी की गोरा-बादल कविता ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए, इतिहास पर ऐसा प्रभावी लिखा कम मिलता है-

“गोरा बादल के अंतस में जगी जोत की रेखा
मातृ भूमि चित्तौड़दुर्ग को फिर जी भरकर देखा
कर अंतिम प्रणाम चढ़े घोड़ो पर सुभट अभिमानी
देश भक्ति की निकल पड़े लिखने वो अमर कहानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी “
(नरेन्द्र मिश्र)

“खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार...”, कहानी में खुसरो हैं और उनकी कविताई के ज़रिए अलाउद्दीन अपने हाथ में प्रेम की लकीर खोजता दिखाई देता है ।

कहानी मैं धार तलवार की है ...राजपूतों की आन है और प्राण-पण से ख़ुद को बनाए रखने की ज़िद  जिस पर बवाल मचना समझ से परे है। क्या एक रानी का नृत्य आपत्ति का केंद्र था तो सामंती दृष्टि में तब और अब कितना अंतर आया है , समझा जा सकता है ।

और फिर राजस्थान का पहला साका होता है । क्रंदन , बलिदान और पीडा की तीव्र लपटों में झुलसता मेवाड़ बचा रह जाता है और उसी के बीच जीतकर भी हारा हुआ  सिंकदर द्वितीय (सानी) ।

अंततः गिद्ध-दृष्टि मँडराती रह जाती है और सोना तप कर कुंदन बन जाता है। हाथों की छाप आत्मा पर अमिट छाप बन जाती है ।जो बच जाता है वह बस प्रेम 💓

बात मेरी और चित्र गूगल से साभार

विमलेश

Monday, May 4, 2020

इक थप्पड़ के बहाने !


                                               


बातें बहुत-सी होती हैं ...किताबों में , कहानियों में और यों ही फ़िल्मों की कहानियों में भी ...पर बात असल में हो कितनी पाती है ।
जो नहीं देखना चाहती थी इतना सुन-सुन कर वह मैंने भी देखी ...थप्पड़!
नि:संदेह करारा नहीं था उतना...पर विमर्श के अतिवाद पर पहुँचते हुए हम दर्शक यह क्यों भूल जाते हैं कि यह केवल अमू की कहानी नहीं है ...उस अमू की जिसका जीवन में कोई ख़्वाब नहीं था और जिसने विवाहोपरान्त सिर्फ़ और सिर्फ़ एक अच्छी समर्पित पत्नी बनना चाहा था वरन् यह उस जैसी बहुतेरी लड़कियों की कहानी है , जो हर वर्ग में मौजूद हैं । 
यह जानना ज़रूरी है कि कुछ ज़ख़्म संघर्षशील बनाते हैं ! 
इस फ़िल्म में हर स्त्री किरदार स्त्री जीवन की त्रासदी लेकर आता है ...यद्यपि बहुत से झोल , बहुत जगह यह भी मन में आता है कि इससे कई-कई गुना अधिक घरेलू हिंसा तो स्त्रियाँ सहन कर रही हैं , तो यहाँ क्यों एक सशक्त-सी दिखने वाली महिला अशक्त, असहाय और परिस्थतियों के आगे घुटने टेकती नज़र आती है । 
एक-एक संवाद सवाल करता जान पड़ता है ख़ामोशी से पर यह सुनने के लिए भोक्ता की टीस की ज़रूरत होगी । ना यह कहकर इस कथानक को बेहतरीन नहीं बता रही । सिर्फ़ यह कहना है कि बहुत से सवाल हैं ...बहुत सारे जो इस पितृसत्ता पर चोट करने का प्रयास करते हैं ...पर चोट क्या वाक़ई हो पाती है , इस तरह का सिनेमा देखकर भी समाज इस कुंद छवि से बाहर आ पाता है ...? बहस इस पर होनी चाहिए पर नहीं वह यह क्यों नहीं कर पाई इस पर सुई ठहर जाती है । 
नहीं होता विरोध करना आसान और जिस तरह उसे बचपन से संस्कार दिए जाते वहाँ तो हर लड़की का अंत समाज कुछ ओर ही देखना चाहता सो लड़ते -लड़ते कभी तो उम्र गुजर जाती है । 
फ़िल्म में सुनीता का चित्रांकन देखा आपने असली नायिका वह है , जो भिड़ती है , जीतती है पर क्या वह वाक़ई जीत पाती है ? वकील का चरित्र निभाती नायिका स्वयं की शर्तों पर जीने का असल मानी सीखती है पर तब जब वह अमू का केस लड़ती है और साथ ही कई सवाल भी पीछे छोड़ देती है कि क्या अलगाव के बाद वह उस एक ठप्पे के साथ जी पाएगी । 
कभी इस ठप्पे के बारे में सोचा है आपने ? लोगों के प्रश्नचिह्नों को रोज महसूस किया है , क्या स्त्री होने के नाते ही उसे उस दृष्टि से देखने का प्रयास किया है ...नहीं बल्कि आप उसे देखकर असुरक्षित होने लगती हैं ...ठीक यहीं उसका हमवर्ग पितृसत्ता में शामिल हो जाता है । 
बात समाज की कुंद सोच पर प्रहार करने की होती है , बात उन प्रश्निल निगाहों पर रोक की होनी चाहिए, बात उस जीवन में ...उसकी हँसी में विषाद को नहीं खोजे जाने की होनी चाहिए पर बात यह नहीं होती । 
हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ आज भी कई स्टेट्स और तसवीरें तालें में जबरन बंद रहती हैं ...उनके तथाकथित उन रिश्तों के कारण ।पर नहीं बात उन पर नहीं ही होगी। 
इतना भर सोचती हूँ कि थप्पड़ भले ही बहुत असरकारी नहीं , ठीक है पर बहुत -से ज़रूरी सवाल तो छोड़ती ही है चाहे उतने प्रभावी न बन पड़े हों । 
विनर्श की ही आड़ में देखना है और तुलना ही करनी है तो छपाक से बेहतर फ़िल्म है थप्पड़। 
अनुगूँज सुनाई तो देती है कम-अज-कम।
कम ही सही पर इस समाज के लिए इतनी ही डोज़ ज़रूरी और काफ़ी क्योंकि यह तो इसे भी झेलने का माद्दा नहीं रखता ।
विमलेश शर्मा
#इक_थप्पड़_के_बहाने


Sunday, May 3, 2020

राम कथा सुन्दर करतारी!






रामायण और महाभारत में कथानक को लेकर अनेक विमर्श खड़े हुए हैं और कई प्रसंगों में जबरन खड़े कर दिए गए हैं , सत्य है; परन्तु विमर्श की दिशा ठीक होनी चाहिए , चिंतन शोधपरक होना चाहिए अन्यथा कुपाठ  तो हर धार्मिक और मिथकीय कृति का होता ही रहा है।

कोई ठीक-ठीक इन लौकिक काव्यों का मनन करे तो सारे प्रमेय स्वत: ही हल होते दिखाई देते हैं... ये महाकाव्य सतर्क और सचेत होकर लिखे गए हैं...कई स्थलों पर तो स्वयं रचयिता नायक/ पात्रों से यह कहलवाता है कि नहीं इस कहे को यों , ठीक यों ही देखा जाना चाहिए ; और किसी अतिरंजना पर किसी वरिष्ठ, कभी किसी मित्र तो कभी किसी परिवारजन के माध्यम से सचेत भी करते हैं कि  मानवीय धर्म सर्वोपरि है ।

रामायण में हर संवाद , हर विमर्श (चिंतन) एक अन्तर्कथा को लिए है । रामायण की घटनाओं में सर्वाधिक प्रश्न सीता परित्याग पर खड़े हुए हैं और फिर जिस तरह राम उत्तररामायण में महानायकत्व के पूर्ण शशि से तनिक घटते नज़र आते हैं ; वहाँ यह संशय गहरा जाता है। यद्यपि इसी घटत को लेकर और नाना उपेक्षाओं को लेकर साहित्य को नवीन आयाम भी मिले।

सीता पुनि बोली (उपन्यास), साकेत (काव्य) रामकथा पर आधृत ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं; जहाँ क्रमश:परम्परागत मूक सीता को आधुनिक मन की प्रश्निल मन:स्थिति की वाणी और उर्मिला , कैकयी को केन्द्र में लाने के प्रयास किए गए हैं ।

वस्तुत: रामायण   के प्रतिनिधि पात्रों की पीडा मूक है ; उन पर दायित्व और मर्यादा का भार भारी जिसे निर्वहन करते वे अतिमानवीय / दैवीय हो जाते हैं और वाल्मीकि जैसे स्थिर और त्रिकालदर्शी सीता की शपथ और पुन: परीक्षा पर विचलित । सीता के बाद जीवन के  उत्तरार्द्ध में  लक्ष्मण  परित्याग भी  विह्वल करता है। सरयू में राम-लखन और अयोध्यावासियों का विषाद से मुक्त होने के लिए स्वयं को समाप्त करना भी विचलित करता है; परन्तु महानायक को साकेत धाम पहुँचाने के लिए विषाद से मुक्ति का यह मार्ग सटीक जान पड़ता है।

भक्ति निर्मल करती है इसीलिए त्याग , शील  और मधुरा भक्ति भावों से ओतप्रोत रामकथा मन को धीर देती है , सबल बनाती है , आत्मबल प्रदान करती है तो अश्रुजल के प्रवहन से आत्मा को परिष्कृत भी करती है ।

यहाँ मानवीय गुणों की सीख देते कई स्थल हैं जिनसे नव युवमन इस विपद में अवश्य लाभान्वित हुआ होगा।


चित्र- राजा रवि वर्मा ( साभार-गूगल)

Wednesday, April 29, 2020

जीवन कितना कुछ हमसे छीन लेता है...







कोई था !
कोई है ! 
ये ‘था’ और ‘है’ काल का भान कराते कितने क्रूर पद हैं । कोई लौट जाता है अनंत में ... उसे जिसे देखते हुए उसकी सराहना में आँखें ख़ुश हो जाया करती थी । पर था/ थे, ‘नहीं रहे’, जैसे पद सुनकर डूबा हुआ मन और डूबता है । इस डूब में चमकीले जामुन के रंग की वो चिड़िया गुलमोहर पर यकायक उसके अलग स्वर से चहकती है , मानो खिड़की खटखटा कर कह रही हो , जीवन है अभी...चलना है अभी; और यों एक डूब से वो उबार लेती है। 
हम में से अधिकतर दूसरों के काँधों पर सुख खोजते हैं ; कुछ किरदारों/भूमिकाओं में जाने कितने सपने जीते हैं और कोई जो मन को भाता है , इस जीवन की वास्तविकता से परिचय करवाता है तो बस वक़्त को ताकते रह जाते हैं । इरफ़ान का जाना एक ऐसी ही बेचैनी उत्पन्न करता है।इरफ़ान शब्द यों तमीज़ और विवेक का पर्याय पर सिने पटल पर भी वे अपने सजीव अभिनय से अपने इस नाम को बड़ी सादगी से सार्थक करते जान पड़ते हैं।
इरफ़ान से जुड़ें कई किरदार हैं कई कहानियाँ यों , जिनका ज़िक्र करते-करते शब्द कम पड़ जाए और उसका जादू फिर भी लिखना बाक़ी रह जाए पर दो पर अभी बात करूँगी फिर भी। बीते दिनों लंच बॉक्स और अंग्रेज़ी मीडियम देखी। लंच बॉक्स की चिट्ठियाँ और उनके शब्द ज़ेहन में तैरते हैं , एक स्मित चेहरे पर उतरती है और एक मशीनी ज़िंदगी एकाएक खिल उठती है; यह सब शायद संजीदा अभिनय से ही संभव हो पाया । और इसी के चलते अक़सर निर्णय नहीं कर पाती कि किरदारों को केन्द्र में लिखकर फ़िल्म बुनी जाती है या किरदार कहानी के अनुरूप खुद को ढालते हैं। 
अंग्रेज़ी मीडियम की कहानी में दम नहीं होने के बावजूद इरफ़ान हमेशा की तरह दिल जीतते ही हैं । कितने किरदार हैं जिनसे वो बने रहेंगे हमारे बीच सदा पर जीवन कभी-कभी इतना कठिन क्यों होता है । 
इरफ़ान हर साँचें में पूरे उतरते नज़र आते हैं , जैसे कि कोई ख़ामी कहीं रही ही ना हो ; बीतकर , रीतकर भी कोई इतना पूरा ।
इस मतलबी और बाज़ारू दुनिया में इतना नैसर्गिक , सहज , जुझारू, जीवट कोई हो तो अपनी ओर खींचता ही है। प्रेम, जीवन और निष्ठा के मामले में भी इरफ़ान बहुत अलग मुक़ाम पर नज़र आते हैं।   एक इंसान सच्चा भी हो, सहज भी हो और जीवन को एक प्रयोगशाला की तरह देखने जज़्बा भी रखता हो और अपने लोटने पर अपना एक हिस्सा सभी के मन में छोड़ जाता हो तो यह उसके जीवन की उपलब्धि ही कही जाएगी।

कुछ ख़बरों पर यक़ीन करने का मन नहीं होता। आज की यह ख़बर ऐसी ही थी...

तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।(निदा)


इरफ़ान का यों अचानक जाना वाक़ई दु:खद है!

Monday, April 6, 2020

सहेजन

“इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।”
(नीरज)

यहाँ इस महफ़िल का आलम भी  यों ही है; एक वीराना-एक सन्नाटा । तसवीरों पर क़सीदे और कहीं तंज की धार पर तर्क। ऐसे में लगता है प्रेम कहीं कोने में दुबके हुआ खड़ा है ; एक संशय जो हर ओर पसरा है।  विचारों के मकड़जाल में हर कोई अपने से ही उलझा है। अलग दिखने की होड़ और प्रवृत्ति जैसे  नेह के सेतुबंधों को तोड़ रही है।
जिनका दिन है उन्हीं के शब्दों में यह बात बार-बार लबों पर है कि -
“आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं “

आस और अदब का दीप यों तो नहीं बुझना था।

नेह की बात कीजिए, प्रतिबद्धता की बात कीजिए। हमारी सबसे बड़ी कमी यही है ‘प्रतिबद्धता से मुँह मोड़ना’, जिसकी बात-परसाई भी बार-बार अनेक लेखों में करते हैं।

सोचिए ज़रा हम अवसरों की टोह लेते हैं क्या ? कई चीजें कई दीवारों पर देखी कहीं बंद तालों में कहीं खुली । कहीं समय-विशेष में कही गई, कहीं अलग-थलग करती हुई। मौक़े तलाशने से क्षणिक सफल हुआ जाता है; यह खुशी वैसी ही है जैसे कोई उथली किताब लिखकर उसका प्रचार कर खुश हो लिया जाए; बल्कि असलियत तो पाठक से पहले स्वयं उस लेखक को पता होती है।

तटस्थता इस समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है ...नहीं सुनाइए किसी तटस्थ को यह पंक्ति बार-बार कि जो तटस्थ है समय लिखेगा , उसका भी अपराध। मानवीय बनिए।  जो बन सके जन-जन के लिए कीजिए । जो ज्ञान , जो सीख एक जीवन को आगे बढ़ा सके ; उतना भर ही सही...पर कीजिए ।

सारी दुनिया को कोसकर एक अलग दुनिया नहीं बनाई जा सकती...हाँ,अकेले चलकर भी इसकी ख़ूबसूरती में योग ज़रूर दिया जा सकता है।

यह लिखना शायद खुद को ही सँभालना ...पर यह भी ज़रूरी लगता है ।