Tuesday, June 2, 2020

एक मतवाली रानी थी ...बस यही उसकी कहानी थी!






यह बात वैसी ही है जैसे बारिश बीत जाने पर बात बारिश की पर बारिश कहाँ बीत पाती है वह तो स्मृति में दर्ज हो जाती है किसी अनुस्मृति की तरह ...और कोई उससे मुक्त होना चाहे तो भी कैसे और भला क्यों कर !

ऐसी ही बात एक फ़िल्म की जिस पर बेवज़ह बवाल हुआ और ख़ासी आलोचना भी । यों मन नकारात्मक आलोचना पर कान नहीं धरता पर राजस्थान के चटख रंग , राठौड़ा री आन ( ओ म्हानै राठौड़ा री बोली प्यारी लागे म्हारी  माँ), घेर घूमेर घाघरा और घूमर मन के बहुत पास बजता है तो देखनी तो थी ही सो आज मुझ तक पहुँची यह भी।

कुछ तो लोक का असर है कि ये रजवाड़े खींचते हैं अपनी ओर और कुछ समय को मानती हूँ कि हर चीज का आप तक पहुँचने का एक वक़्त होता है सो आज ‘पद्मावती’ पहुँची मुझ तक। वह पद्मावती जिसे इतिहासकार कल्पना भी मानते हैं पर वह कल्पना नहीं मोहक व्यक्तित्व की स्वामिनी और प्रेम - निष्ठा में पगी एक रानी थी । धन -स्त्री और सत्ता प्रसार इतिहास के हर उन्मादी राजा के लिए केन्द्र में रहे हैं , यहाँ भी हैं।

घणी घणी खम्मा...ये ही शब्द राग में तिरते रहते हैं जब पद्मावत का पहले-पहल दृश्य-मंच आँखों पर बिछने लगता है , तब जब यह फ़िल्म अपना और अपने किरदारों का वास्तविक परिचय दे रही होती है।

फ़िल्म के प्रारम्भ में ही लोक समृद्ध लगता है ...लोक तो होता ही समृद्ध है पर कलाकार या सहृदय उससे स्वयं को कितना भर पाता है यह महत्त्वपूर्ण होता है ।दीवारों पर लोक उरेहन और पार्श्व में बजता मद्धम लोक संगीत ...तो शुरुआत अच्छी रही । आप यों कह सकते हैं कि भव्यता की पदचाप सुनाती हुई-सी।

पहला ही दृश्य जलालुद्दीन ख़िलजी का और फिर सनकी अलाउद्दीन का ...इतिहास की थोड़ी बहुत समझ रखने वालों को ये किरदार अपनी अदाकारी से बहुत अधिक समृद्ध कर देता है। मंगोल फ़तह करना, अपने ही चाचा जलालुद्दीन को मौत के घाट उतारकर तख़्ता पलट करना , इतात खान को मौत के घाट उतारना और उसकी स्त्री- लम्पटता को चरम पर दिखाते जाने कितने वीभत्स  दृश्य हैं जिन्हें रणवीर ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है । रणवीर सिंह को देखकर लगता है कि सफलता के लिए बस मेहनत की ज़रूरत होती है, और कुछ नहीं ...हालाँकि यह इस समय की एकपक्षीय सच्चाई पर उसे देखकर इस बात पर यक़ीन होता है ।

तख़्ता-पलट जैसी क्रूरताओं के लिए कहा गया है कि यह सल्तनत का दस्तूर है , सच ही तो है कि सत्ता पर एक सनक सवार होती है और यह सनक स्वकेन्द्रित हो जाए तो फिर जनता के लिए जीना मुश्किल हो जाता है ।
मेहरुन्निसा के साथ ज़्यादती अलाउद्दीन की सनक का पता स्वयं देती है, चित्तौड़गढ़ के क़िले के बाहर हताश और विद्रोह करती अपनी सेना को ढाढ़स बँधाता अलाउद्दीन और फिर सकारात्मक परिणाम पाकर वज़ीर को आँख का इशारा करता अलाउद्दीन कितनी बातें प्रकारांतर से कह जाता है ...दृश्यों में इसी प्रकार तो अर्थ -स्फीतियाँ होती हैं और यही मन पर अंकित रह जाती हैं ।

मलिक काफ़ूर की बात की जानी चाहिए कुछ...एक गुलाम जिसे अपनी ग़ुलामी का एहसास नहीं है जो अलाउद्दीन से प्रेम करता है ...दैहिक प्रेम और यही कारण है कि वह उसके आस-पास किसी स्त्री की मौजूदगी को स्वीकार नहीं कर पाता है। वह प्रेम करता है ;परन्तु किसी राजा की एकाधिक रानियों की ही तरह उसमें भी सौतिया-डाह है जो अनेक स्तरों पर उद्घाटित हुआ है।

मेहरून्निसा का प्रेम से पीडा तक का सफ़र हरमों की दबी सच्चाइयाँ हैं जहाँ मल्लिका -ए -जहाँ को महारानी पद्मावती  का इस्तक़बाल करना भी एक मजबूरी बन जाता है ।

“उसूल इंसानों के लिए होते हैं जानवरों के लिए नहीं”, कहन अलाउद्दीन की क्रूरताओं के लिए सच ही जान पड़ता है ।

दूसरी ओर पद्मावती जिसे साहित्य की विद्यार्थी होने के नाते जायसी के रचे में ख़ूब पढ़ा है ; उसकी नागमणी का विरह-वर्णन तो समूचे मरुभूमि को डूबो देने का सामर्थ्य रखता है पर यहाँ वह नागमति अनुपस्थित है पर पद्मावती का सौन्दर्य मैंने जायसी के शब्दों से ही देखा है-

“वह पदमिनि चितउर जो आनी । काया कुंदन द्वादसबानी ॥
कुंदन कनक ताहि नहिं बासा । वह सुगंध जस कँवल बिगासा ॥”

रतनसेन और पद्मावती का प्रेम सच्चा, तरल और समर्पित है वहीं पहली रानी नागमति को जीवन से विरक्त दिखाने के पीछे रजवाड़ों में एकपत्नीव्रत का अभाव होने की पीड़ा को ही अधिक उद्घाटित करता है।  रत्नसेन को उसी तरह चित्रित किया गया है जिस तरह एक बलशाली राजा के समक्ष सभी युक्तियों से जूझते हुए दिखाया जाना चाहिए ।

राघव-चेतन का विद्रोह तनिक अतिरंजना लिए है जो अंत तक बना रहता है और मेवाड़ के होम होने का कारक बनता है । पर यह भी संदेश देता हुआ कि राग यमन कभी चंदन की ख़ुशबू देता है तो कभी ग़ुलामी की दुर्गंध भी...चयन हमारा ही होता है।




पटकथा के मूल में स्पष्ट संदेश है कि, ‘सौन्दर्य घातक नहीं था/ होता वरन् उसकी ओर उठने वाली कुदृष्टि घातक थी/ होती है।’ पर यह लोक बार-बार अपने हर कुकृत्य से यह सिद्ध करता है कि दोष रूप का होता है , स्त्री-देह का होता है उस पर उठने वाली आँख का नहीं। जाने क्यों ये शब्द स्वयं निकले जब रानी आठ सौ दासियों के वेश में सेना को लेकर चल पड़ती है कि,”स्त्री को कम मत आँकों जब वो चुप हो जाती है तो प्रकृति उसका साथ देती है।” हाँ! आप चाहें तो इसे मेरी स्त्री-दृष्टि कह सकते हैं ।

गोरा और बादल जैसे कर्तव्यनिष्ठ और जाँबाज़ साथी हो तो चित्तौड़ अभेद्य हो ही जाता है । उनके ही साथ उनकी माँए जो इला ने देणी आपणी जैसी घुट्टी उन्हें हिंडोले में हर श्वास के साथ देती है । पद्मावती के दिल्ली जाने न जाने पर विरोधाभास मिलते हैं पर सात-सौ (फ़िल्म में आठ सौ) डोले और उनमें स्त्री-वेश में वीर जाने की बात को कितने ही इतिहास-ग्रंथों में मिलती है। इस संदर्भ में नरेन्द्र मिश्र जी की गोरा-बादल कविता ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए, इतिहास पर ऐसा प्रभावी लिखा कम मिलता है-

“गोरा बादल के अंतस में जगी जोत की रेखा
मातृ भूमि चित्तौड़दुर्ग को फिर जी भरकर देखा
कर अंतिम प्रणाम चढ़े घोड़ो पर सुभट अभिमानी
देश भक्ति की निकल पड़े लिखने वो अमर कहानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी “
(नरेन्द्र मिश्र)

“खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार...”, कहानी में खुसरो हैं और उनकी कविताई के ज़रिए अलाउद्दीन अपने हाथ में प्रेम की लकीर खोजता दिखाई देता है ।

कहानी मैं धार तलवार की है ...राजपूतों की आन है और प्राण-पण से ख़ुद को बनाए रखने की ज़िद  जिस पर बवाल मचना समझ से परे है। क्या एक रानी का नृत्य आपत्ति का केंद्र था तो सामंती दृष्टि में तब और अब कितना अंतर आया है , समझा जा सकता है ।

और फिर राजस्थान का पहला साका होता है । क्रंदन , बलिदान और पीडा की तीव्र लपटों में झुलसता मेवाड़ बचा रह जाता है और उसी के बीच जीतकर भी हारा हुआ  सिंकदर द्वितीय (सानी) ।

अंततः गिद्ध-दृष्टि मँडराती रह जाती है और सोना तप कर कुंदन बन जाता है। हाथों की छाप आत्मा पर अमिट छाप बन जाती है ।जो बच जाता है वह बस प्रेम 💓

बात मेरी और चित्र गूगल से साभार

विमलेश

Monday, May 4, 2020

इक थप्पड़ के बहाने !


                                               


बातें बहुत-सी होती हैं ...किताबों में , कहानियों में और यों ही फ़िल्मों की कहानियों में भी ...पर बात असल में हो कितनी पाती है ।
जो नहीं देखना चाहती थी इतना सुन-सुन कर वह मैंने भी देखी ...थप्पड़!
नि:संदेह करारा नहीं था उतना...पर विमर्श के अतिवाद पर पहुँचते हुए हम दर्शक यह क्यों भूल जाते हैं कि यह केवल अमू की कहानी नहीं है ...उस अमू की जिसका जीवन में कोई ख़्वाब नहीं था और जिसने विवाहोपरान्त सिर्फ़ और सिर्फ़ एक अच्छी समर्पित पत्नी बनना चाहा था वरन् यह उस जैसी बहुतेरी लड़कियों की कहानी है , जो हर वर्ग में मौजूद हैं । 
यह जानना ज़रूरी है कि कुछ ज़ख़्म संघर्षशील बनाते हैं ! 
इस फ़िल्म में हर स्त्री किरदार स्त्री जीवन की त्रासदी लेकर आता है ...यद्यपि बहुत से झोल , बहुत जगह यह भी मन में आता है कि इससे कई-कई गुना अधिक घरेलू हिंसा तो स्त्रियाँ सहन कर रही हैं , तो यहाँ क्यों एक सशक्त-सी दिखने वाली महिला अशक्त, असहाय और परिस्थतियों के आगे घुटने टेकती नज़र आती है । 
एक-एक संवाद सवाल करता जान पड़ता है ख़ामोशी से पर यह सुनने के लिए भोक्ता की टीस की ज़रूरत होगी । ना यह कहकर इस कथानक को बेहतरीन नहीं बता रही । सिर्फ़ यह कहना है कि बहुत से सवाल हैं ...बहुत सारे जो इस पितृसत्ता पर चोट करने का प्रयास करते हैं ...पर चोट क्या वाक़ई हो पाती है , इस तरह का सिनेमा देखकर भी समाज इस कुंद छवि से बाहर आ पाता है ...? बहस इस पर होनी चाहिए पर नहीं वह यह क्यों नहीं कर पाई इस पर सुई ठहर जाती है । 
नहीं होता विरोध करना आसान और जिस तरह उसे बचपन से संस्कार दिए जाते वहाँ तो हर लड़की का अंत समाज कुछ ओर ही देखना चाहता सो लड़ते -लड़ते कभी तो उम्र गुजर जाती है । 
फ़िल्म में सुनीता का चित्रांकन देखा आपने असली नायिका वह है , जो भिड़ती है , जीतती है पर क्या वह वाक़ई जीत पाती है ? वकील का चरित्र निभाती नायिका स्वयं की शर्तों पर जीने का असल मानी सीखती है पर तब जब वह अमू का केस लड़ती है और साथ ही कई सवाल भी पीछे छोड़ देती है कि क्या अलगाव के बाद वह उस एक ठप्पे के साथ जी पाएगी । 
कभी इस ठप्पे के बारे में सोचा है आपने ? लोगों के प्रश्नचिह्नों को रोज महसूस किया है , क्या स्त्री होने के नाते ही उसे उस दृष्टि से देखने का प्रयास किया है ...नहीं बल्कि आप उसे देखकर असुरक्षित होने लगती हैं ...ठीक यहीं उसका हमवर्ग पितृसत्ता में शामिल हो जाता है । 
बात समाज की कुंद सोच पर प्रहार करने की होती है , बात उन प्रश्निल निगाहों पर रोक की होनी चाहिए, बात उस जीवन में ...उसकी हँसी में विषाद को नहीं खोजे जाने की होनी चाहिए पर बात यह नहीं होती । 
हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ आज भी कई स्टेट्स और तसवीरें तालें में जबरन बंद रहती हैं ...उनके तथाकथित उन रिश्तों के कारण ।पर नहीं बात उन पर नहीं ही होगी। 
इतना भर सोचती हूँ कि थप्पड़ भले ही बहुत असरकारी नहीं , ठीक है पर बहुत -से ज़रूरी सवाल तो छोड़ती ही है चाहे उतने प्रभावी न बन पड़े हों । 
विनर्श की ही आड़ में देखना है और तुलना ही करनी है तो छपाक से बेहतर फ़िल्म है थप्पड़। 
अनुगूँज सुनाई तो देती है कम-अज-कम।
कम ही सही पर इस समाज के लिए इतनी ही डोज़ ज़रूरी और काफ़ी क्योंकि यह तो इसे भी झेलने का माद्दा नहीं रखता ।
विमलेश शर्मा
#इक_थप्पड़_के_बहाने


Sunday, May 3, 2020

राम कथा सुन्दर करतारी!






रामायण और महाभारत में कथानक को लेकर अनेक विमर्श खड़े हुए हैं और कई प्रसंगों में जबरन खड़े कर दिए गए हैं , सत्य है; परन्तु विमर्श की दिशा ठीक होनी चाहिए , चिंतन शोधपरक होना चाहिए अन्यथा कुपाठ  तो हर धार्मिक और मिथकीय कृति का होता ही रहा है।

कोई ठीक-ठीक इन लौकिक काव्यों का मनन करे तो सारे प्रमेय स्वत: ही हल होते दिखाई देते हैं... ये महाकाव्य सतर्क और सचेत होकर लिखे गए हैं...कई स्थलों पर तो स्वयं रचयिता नायक/ पात्रों से यह कहलवाता है कि नहीं इस कहे को यों , ठीक यों ही देखा जाना चाहिए ; और किसी अतिरंजना पर किसी वरिष्ठ, कभी किसी मित्र तो कभी किसी परिवारजन के माध्यम से सचेत भी करते हैं कि  मानवीय धर्म सर्वोपरि है ।

रामायण में हर संवाद , हर विमर्श (चिंतन) एक अन्तर्कथा को लिए है । रामायण की घटनाओं में सर्वाधिक प्रश्न सीता परित्याग पर खड़े हुए हैं और फिर जिस तरह राम उत्तररामायण में महानायकत्व के पूर्ण शशि से तनिक घटते नज़र आते हैं ; वहाँ यह संशय गहरा जाता है। यद्यपि इसी घटत को लेकर और नाना उपेक्षाओं को लेकर साहित्य को नवीन आयाम भी मिले।

सीता पुनि बोली (उपन्यास), साकेत (काव्य) रामकथा पर आधृत ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं; जहाँ क्रमश:परम्परागत मूक सीता को आधुनिक मन की प्रश्निल मन:स्थिति की वाणी और उर्मिला , कैकयी को केन्द्र में लाने के प्रयास किए गए हैं ।

वस्तुत: रामायण   के प्रतिनिधि पात्रों की पीडा मूक है ; उन पर दायित्व और मर्यादा का भार भारी जिसे निर्वहन करते वे अतिमानवीय / दैवीय हो जाते हैं और वाल्मीकि जैसे स्थिर और त्रिकालदर्शी सीता की शपथ और पुन: परीक्षा पर विचलित । सीता के बाद जीवन के  उत्तरार्द्ध में  लक्ष्मण  परित्याग भी  विह्वल करता है। सरयू में राम-लखन और अयोध्यावासियों का विषाद से मुक्त होने के लिए स्वयं को समाप्त करना भी विचलित करता है; परन्तु महानायक को साकेत धाम पहुँचाने के लिए विषाद से मुक्ति का यह मार्ग सटीक जान पड़ता है।

भक्ति निर्मल करती है इसीलिए त्याग , शील  और मधुरा भक्ति भावों से ओतप्रोत रामकथा मन को धीर देती है , सबल बनाती है , आत्मबल प्रदान करती है तो अश्रुजल के प्रवहन से आत्मा को परिष्कृत भी करती है ।

यहाँ मानवीय गुणों की सीख देते कई स्थल हैं जिनसे नव युवमन इस विपद में अवश्य लाभान्वित हुआ होगा।


चित्र- राजा रवि वर्मा ( साभार-गूगल)

Wednesday, April 29, 2020

जीवन कितना कुछ हमसे छीन लेता है...







कोई था !
कोई है ! 
ये ‘था’ और ‘है’ काल का भान कराते कितने क्रूर पद हैं । कोई लौट जाता है अनंत में ... उसे जिसे देखते हुए उसकी सराहना में आँखें ख़ुश हो जाया करती थी । पर था/ थे, ‘नहीं रहे’, जैसे पद सुनकर डूबा हुआ मन और डूबता है । इस डूब में चमकीले जामुन के रंग की वो चिड़िया गुलमोहर पर यकायक उसके अलग स्वर से चहकती है , मानो खिड़की खटखटा कर कह रही हो , जीवन है अभी...चलना है अभी; और यों एक डूब से वो उबार लेती है। 
हम में से अधिकतर दूसरों के काँधों पर सुख खोजते हैं ; कुछ किरदारों/भूमिकाओं में जाने कितने सपने जीते हैं और कोई जो मन को भाता है , इस जीवन की वास्तविकता से परिचय करवाता है तो बस वक़्त को ताकते रह जाते हैं । इरफ़ान का जाना एक ऐसी ही बेचैनी उत्पन्न करता है।इरफ़ान शब्द यों तमीज़ और विवेक का पर्याय पर सिने पटल पर भी वे अपने सजीव अभिनय से अपने इस नाम को बड़ी सादगी से सार्थक करते जान पड़ते हैं।
इरफ़ान से जुड़ें कई किरदार हैं कई कहानियाँ यों , जिनका ज़िक्र करते-करते शब्द कम पड़ जाए और उसका जादू फिर भी लिखना बाक़ी रह जाए पर दो पर अभी बात करूँगी फिर भी। बीते दिनों लंच बॉक्स और अंग्रेज़ी मीडियम देखी। लंच बॉक्स की चिट्ठियाँ और उनके शब्द ज़ेहन में तैरते हैं , एक स्मित चेहरे पर उतरती है और एक मशीनी ज़िंदगी एकाएक खिल उठती है; यह सब शायद संजीदा अभिनय से ही संभव हो पाया । और इसी के चलते अक़सर निर्णय नहीं कर पाती कि किरदारों को केन्द्र में लिखकर फ़िल्म बुनी जाती है या किरदार कहानी के अनुरूप खुद को ढालते हैं। 
अंग्रेज़ी मीडियम की कहानी में दम नहीं होने के बावजूद इरफ़ान हमेशा की तरह दिल जीतते ही हैं । कितने किरदार हैं जिनसे वो बने रहेंगे हमारे बीच सदा पर जीवन कभी-कभी इतना कठिन क्यों होता है । 
इरफ़ान हर साँचें में पूरे उतरते नज़र आते हैं , जैसे कि कोई ख़ामी कहीं रही ही ना हो ; बीतकर , रीतकर भी कोई इतना पूरा ।
इस मतलबी और बाज़ारू दुनिया में इतना नैसर्गिक , सहज , जुझारू, जीवट कोई हो तो अपनी ओर खींचता ही है। प्रेम, जीवन और निष्ठा के मामले में भी इरफ़ान बहुत अलग मुक़ाम पर नज़र आते हैं।   एक इंसान सच्चा भी हो, सहज भी हो और जीवन को एक प्रयोगशाला की तरह देखने जज़्बा भी रखता हो और अपने लोटने पर अपना एक हिस्सा सभी के मन में छोड़ जाता हो तो यह उसके जीवन की उपलब्धि ही कही जाएगी।

कुछ ख़बरों पर यक़ीन करने का मन नहीं होता। आज की यह ख़बर ऐसी ही थी...

तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।(निदा)


इरफ़ान का यों अचानक जाना वाक़ई दु:खद है!

Monday, April 6, 2020

सहेजन

“इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।”
(नीरज)

यहाँ इस महफ़िल का आलम भी  यों ही है; एक वीराना-एक सन्नाटा । तसवीरों पर क़सीदे और कहीं तंज की धार पर तर्क। ऐसे में लगता है प्रेम कहीं कोने में दुबके हुआ खड़ा है ; एक संशय जो हर ओर पसरा है।  विचारों के मकड़जाल में हर कोई अपने से ही उलझा है। अलग दिखने की होड़ और प्रवृत्ति जैसे  नेह के सेतुबंधों को तोड़ रही है।
जिनका दिन है उन्हीं के शब्दों में यह बात बार-बार लबों पर है कि -
“आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं “

आस और अदब का दीप यों तो नहीं बुझना था।

नेह की बात कीजिए, प्रतिबद्धता की बात कीजिए। हमारी सबसे बड़ी कमी यही है ‘प्रतिबद्धता से मुँह मोड़ना’, जिसकी बात-परसाई भी बार-बार अनेक लेखों में करते हैं।

सोचिए ज़रा हम अवसरों की टोह लेते हैं क्या ? कई चीजें कई दीवारों पर देखी कहीं बंद तालों में कहीं खुली । कहीं समय-विशेष में कही गई, कहीं अलग-थलग करती हुई। मौक़े तलाशने से क्षणिक सफल हुआ जाता है; यह खुशी वैसी ही है जैसे कोई उथली किताब लिखकर उसका प्रचार कर खुश हो लिया जाए; बल्कि असलियत तो पाठक से पहले स्वयं उस लेखक को पता होती है।

तटस्थता इस समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है ...नहीं सुनाइए किसी तटस्थ को यह पंक्ति बार-बार कि जो तटस्थ है समय लिखेगा , उसका भी अपराध। मानवीय बनिए।  जो बन सके जन-जन के लिए कीजिए । जो ज्ञान , जो सीख एक जीवन को आगे बढ़ा सके ; उतना भर ही सही...पर कीजिए ।

सारी दुनिया को कोसकर एक अलग दुनिया नहीं बनाई जा सकती...हाँ,अकेले चलकर भी इसकी ख़ूबसूरती में योग ज़रूर दिया जा सकता है।

यह लिखना शायद खुद को ही सँभालना ...पर यह भी ज़रूरी लगता है ।