Monday, November 27, 2017

घातक है ये चुप्पियाँ और दमन की नीति!


पूरे देश में कन्या पूजन का माहौल है, विजयोत्सव का माहौल है पर एक वर्ग (पुरूष और प्रशासन)अब भी अपने दंभ में दमन का हिमायती है। वह अपने दंभ के चलते कपड़ों के भीतर झाँकने से भी गुरेज नहीं करता, प्रश्न कौंधता है कि क्या यही है हमारी सनातन संस्कृति? शक्ति के नौ दिन, इन दिनों में एक ओर जहाँ जन समुदाय स्त्री को कंजकों के रूप में पूजकर देवी बनाने को आमादा है, वहीं दूसरी ओर कुत्सित, सड़ा-गला सामाजिक ताना-बाना उसे अब भी महज वस्तु के तौर पर देखने का  अभ्यस्त। क्या हमें हमारे इस दोहरे आचरण पर शर्म नहीं आती। हम स्वयं को आर्य संताने कहते हैं और क्रूरता, दमन और निरंकुश हरकतों पर चुप्पी ओढ़ कर बैठते हैं। हम आठ दिन नाना अवतारों पर इतनी उछलकूद करते हैं और बाहर उसी तथाकथित देवी पर फिकरे कसते दिखाई देते हैं। दोष हमारी सड़-गल चुकी सामाजिक व्यवस्था का है। अगर आमजन चेतस हो तो प्रशासन की हिमाकत ही क्या कि वो लड़की के गिरेबां पर हाथ डालने वाले को बख्श दे। बहरहाल, तरह-तरह की कालिखों से लिपटी हुई तरह-तरह की अफवाहों से बाज़ार गरम है और मीडिया बीएचयू प्रकरण पर नितांत सुस्त, सुन्न।
राजनीति की विस्तृत और वर्चस्ववादी अवधारणा में नारें, जुमले, आश्वासन केवल और केवल दिखावटी टापू हैं, जिन पर ठहर कुछ देर राजनेता सुस्ता लेते हैं और फिर चल देते हैं, अपनी दोषपूर्ण और खोखली नीतियों पर।  इसी बात का गवाह है काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हालिया प्रकरण। वहाँ सैंकड़ों की संख्या में लड़कियाँ लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलनरत हैं । वे लड़कियाँ जिन्हें परचम उठाते देखने का समाज आदी नहीं है। एक लड़की के साथ कुछ मनचले बदतमीजी करते हैं, उसके कपड़ों पर हाथ डालते हैं। वह  लड़की शिकायत करती है पर उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होती, बल्कि उस लड़की को ही समय पर आने-जाने, सलीके से पहनने-ओढ़ने की नसीहत दी जाती है। ये बातें, बंदिशें क्या किसी सामंती युग की नहीं प्रतीत होती? छेड़छाड़ और बलात् प्रसंगों को लेकर लड़कियों के मन में आक्रोश है औऱ वे सुरक्षा की वाज़िब सी माँग को लेकर घरने पर बैठी हैं। उनकी माँगों में रात को सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति, छेड़छाड़ की घटनाओं पर रोक, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था की माँग, सीसीटीवी कैमरों की माँग और आपत्तिजनक हरकतों पर कड़ी कार्रवाई जैसी बुनियादी माँगे शामिल है। अगर यह माँगें सही है तो, इनमें राष्ट्रीयता जैसी व्यापक अवधारणाओं को खतरें में देखना नितांत एकांगी सोच का परिचय है। जहाँ एक ओर सरकारें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ औऱ सेल्फी विद डॉटर जैसे अभियानों से बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही हैं, उसे मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रही हैं, वहीं प्रशासन का  इन बुनियादी माँगों को मानने में क्या आपत्ति है, समझ से परे है। बेटियाँ बैखोफ़ जीने का अधिकार माँग रही हैं, इस हेतु वे प्रशासन से संपर्क साधने की कोशिश करती है, उनसे मदद की गुहार लगाती है, जब माँग नहीं सुनी जाती है तो महामहिम के गुजरने वाले रास्ते पर धरना देती है, पर वे भी अपना रास्ता बदल देते हैं। आधी रात को प्रशासन उन पर लाठियाँ भाँजता है, बेरहमी से पीटता है और उनके प्रतिरोध को नेस्तनाबूद कर देना चाहता है। क्या यह अहं और दमन की नीति का हिस्सा नहीं है? और उससे भी क्रूर है, इसे सत्ताविरोधी समझ राजनीतिक रंग देने की कोशिश करना।
एक वर्ग इन माँगों को वामपंथी या नक्सली हरक़त करार देता है, मुद्दा देशद्रोही और राष्ट्रद्रोही का भी बनता दिखता है,तो सीधा सवाल उसी वर्ग से बनता है कि लड़कियों को छेड़ना, उनके सामने अपने अंगों की नुमाइश करना , उनके कपड़ों पर हाथ डालना क्या राष्ट्रवादी हरकत है। चिंता का विषय है कि हम उस समय में रह रहे हैं, जहाँ  शब्द उनके अर्थ खो चुके हैं या फिर बेहद संकुचित हो गए हैं। दुखद यह है कि इस ज़रूरी मुद्दे पर भी पक्ष-विपक्ष के लोग राजनीति करेंगें। मुद्दे को प्रायोजित बताकर उसे जड़ से ही समाप्त कर देंगे। मगर इन सबसे इतर उस सच की साक्षी तो वे और सिर्फ वे लड़कियाँ ही हैं , जो इस पीड़ा को अमूमन रोज देखती-भोगती है। क्या यह अफ़सोसजनक नहीं है कि एक  विश्वविद्यालय को जो कार्य अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से स्वाभाविक संज्ञान लेकर करने थे , उसके लिए लड़कियों को आंदोलन करना पड़ रहा है। जब एक नामी और साहित्य का गढ़ रहे विश्वविद्यालय में यह सब घट रहा है तो किसी आम संस्थान की तो बिसात ही क्या।
बहरहाल बी.एच.यू हो या अन्य कोई भी संस्थान  या स्थान ,समाज में स्त्रियों के लिए हर प्रकार का उत्पीड़न होता रहा है। कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ लड़कियाँ चुभती और तरेरती नज़रों से नहीं गुजरती।बीएचयू के जिस छात्रावास की बात कही जा रही है, कहा जा रहा है, वहाँ नियम बहुत कड़े हैं। वहाँ सूर्यास्त से पहले ही दिन बीत जाता है। लड़कियों के साथ यह अमानवीय व्यवहार और तरह-तरह की बंदिशें क्या किसी आदिम युग की निशानी नहीं है। क्या राजनीति के नाम पर इंसान, इंसान को ही नहीं लील रहा है।अफ़सोस कि एक वर्ग दूसरे को काटता हुआ जाने कौनसी डगर पर बढ़ता हुआ उसे नीचे दिखाने की होड़ में उल-जलूल तर्क दिए जा रहा है। प्रतिरोध करना, प्रतिरोध की आवाज़ का समर्थन करना क्या राष्ट्रद्रोह है। बुनियादी अधिकारों और सुरक्षा की माँग करना क्या प्रायोजित माँग है। क्या एक वर्ग विशेष को तमाम अधिकार केवल पुरूष होने के नाते यह कहकर दिया जा सकता है कि, ‘लड़के हैं तो ऐसा तो करेंगे ही।’
दरअसल स्त्री के मामले में समाज अब भी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है। सामंती मानसिकता की जड़े समाज में इतनी गहरी है कि वे उसके द्वारा उठाए गए परचम के भी परखच्चे उठाने पर विश्वास रखती हैं। अगर स्त्री सफल है तो चरित्र हनन, अगर स्त्री मुखर है तो चरित्र हनन, अगर स्त्री अन्याय का विरोध कर रही है तो चरित्र हनन  औऱ वाज़िब माँग कर रही है तो दमन! कितना आसान है ना स्त्री के चरित्र पर उँगली उठा देना, उसके प्रतिरोध का दमन करना। गोया कि वह केवल देह भर है,वस्तु भर है... अपनी बात कही नहीं कि उसे गालियों से और उसके बंधनों को कुछ ओऱ कस कर, उसका दमन कर दिया जाए। गौरतलब है कि बीएचयू में एक अरसे से मध्ययुगीन आचरण बना हुआ है। वे क्या खाएँ, क्या पहने इन सबका निर्धारण वार्डन तय करती हैं।  महिला छात्रावास एक तरह से जेल बने हुए हैं। इसी वातावरण की खींच-तान और आए दिन होने वाले छेड़-छाड़ ही इस आंदोलन का हेतु है।
सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ ये घटनाएँ हमारी राजनीति का मंतव्य भी जाहिर करती हैं। जाहिर बातिन में अति तेज उक्ति को चरितार्थ करते राजनेता हर मुद्दे पर अपनी रोटियाँ सेकना चाहते हैं। किसी की अस्मिता के साथ खिलवाड़ हो तो वे उस अस्मिता को न्याय दिलाने हेतु नहीं वरन् उस अस्मिता से जुड़े धर्म को लेकर आवाज़ उठाएँगें। वे समतावादी नजरिए से नहीं, वरन् दलित, गैर दलित, हिन्दू, अहिन्दू और स्त्री , पुरूष में बाँट कर ही समाज को देखना चाहते हैं। सामाजिक जकड़नों को देखें तो कहीं भी ये कम नज़र नहीं आती वरन् इनकी तीव्रता और स्त्री के साथ हुए अपराध बढ़ते ही नज़र आते हैं। समाज और राजनीति जब तक संस्कारों और सभ्यता की आड़ में वर्चस्ववादी ताकतों को बढ़ावा देती रहेंगी, तब तक समाज में विषमता की खाई बढ़ती ही जाएगी।  क्या सरकारें, समाज और वर्चस्ववादी ताकतें समाज को पंगु नहीं बना रहे हैं। संस्थानों के उच्च पदों पर नियुक्तियाँ, उनकी मानसिकता के चलते ही संदेह के घेरे में नज़र आती हैं। सनद रहे यदि यह तथाकथित राष्ट्रवाद है तो आधी आबादी स्वतः ही धुर राष्ट्रविरोधी हो जाती है, और इसके जिम्मेदार वे ही लोग हैं, जो इन अवधारणाओं के हिमायती। यह सुखद है कि स्त्री अपनी राह खुद ढूँढ रही है, स्खलित होती अवधारणाओं पर अपनी राय ज़ाहिर कर रही है पर समाज, प्रशासन, शिक्षकों और आमजन की गढ़ी गई चुप्पी और यूँ दमन भी एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती हैं कि लिंग विभेदीकरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर हम कब तक मौन रहेंगे। एक वर्ग के स्वातंत्र्य की बुनियादी अवधारणा और  उसके प्रतिरोध को कुचलते रहेंगे। ये मुद्दे यूँही बने रहेंगे अगर समाज चुप रहता है, न्याय के साथ खड़े होने में विश्वास नहीं रखता। ये घटनाएं केवल और केवल तभी थमेंगी जब विचारों में ज्वार आएगा, अन्यथा सोए हुए तो हम सदियों से हैं ही।

Wednesday, November 1, 2017

व्यवस्था की ज़ागरूकता ही बचा पाएँगी नवांकुरों को!


वर्तमान दौर अनेक   अव्यवस्थाओं और विसंगतियों से गुजरता दौर है। कहीं राशन के धान के इंतजार में कोई भूख से दम तोड़ता है तो कहीं दवा और समुचित चिकित्सा के अभाव में कोई मौत की नींद सो जाता है। किसी भी राष्ट्र की खुशहाली का अनुमान उसके बच्चों और माताओं को देख कर सहज ही लगाया जा सकता है पर स्तब्ध कर देने वाली बात है कि यहाँ नन्हीं कौंपलें और मातृत्व पर अब भी स्याह आसमां कहर बरपा रहा है। लगातार घटता नन्हीं मौतों का यह तांडव सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे अभियान, मुद्दे और वैचारिकी आखिर किस दिशा में हैं। उदास शरद तथा छींटाकाशी और जुमलेबाजी की घटत-बढ़त के बीच  दुखद है कि गुजरात के एक सिविल अस्पताल  में नौ नवजात एक ही दिन में मृत घोषित किए जाते हैं। चौंक और दुख यहीं विदा नहीं होते वरन् गहरी टीस देते हैं कि इसी अस्पताल में बीते तीन दिनों में मौत का यह आँकड़ा  अठारह तक पहुँच  चुका है। एशिया के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में  शुमार अहमदाबाद के असारवा स्थित सिविल अस्पताल से यह दुःखद प्रसंग घटना  खासा चौंकाता है। हालांकि , हर बार की तरह अस्पताल प्रशासन इन मौतों का कारण नवजातों का गंभीर बीमारी से ग्रसित होना बताता है, पर एकाएक घटित ये मौतें अस्पताल प्रशासन की गैर-जिम्मेदारी पर सवालिया निशान छोड़ती हैं।
 चुनावी माहौल और बनते बिगड़ते सियासी समीकरणों के बीच यह वाकया फ़िलवक्त राजनीतिक हलके के लिए भी अत्यंन्त संवेदनशील बन गया है पर वास्तविक चिंता की बात यह है कि सुरक्षा और चिकित्सा, देखरेख की ज़वाबदेही तय करने वाले अस्पताल आखिर किस दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं। दुखद यह भी है कि, कोई भी महीना हो, कभी अगस्त तो कभी अक्टूबर क्यों बार-बार इन घटनाओं का दंश ढोता है ? कभी ऑक्सीजन की कमी,  कभी सड़क पर प्रसव तो कभी ऑपरेशन थिरेटर में चिकित्सकों का असंवेदनशील रवैया नवजातों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि असारवा में घटी यह घटना किसी राज्य में पहली बार घट रही हो, उत्तरप्रदेश और राजस्थान भी हाल ही में ऐसी दुखद घटनाओं के ठिये बन चुके हैं पर विचारणीय यह है कि प्रशासन और जिम्मेदार तबका ऐसी घटनाओं के बाद भी प्रभावशाली कदम क्यों नहीं उठाता दिखता।
जिस समाज में हर वर्ष तीन लाख बच्चे एक दिन भी जिंदा नहीं रह पाते और तकरीबन सवा लाख माताएँ हर साल प्रसव के दौरान मर जाती हैं, उस समाज के विकास का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। जब देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कोई कमी नहीं है तब ऐसा होना शर्मनाक ही नहीं, कुत्सित अपराध बन जाता है। शिशु मृत्यु दर में आई गिरावट के बाद भी भारत ने अब तक 30 शिशु मृत्यु दर के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया है। 2015 में जिन राज्यों में उच्चतम शिशु मृत्यु दर पाई गई उनमें मध्यप्रदेश, आसाम, उत्तरप्रदेश औऱ आसाम हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाओं , टीकाकरण और संक्रमण से बचाव की पर्याप्त सुविधाओं के अभाव तथा जन्मजात शारीरिक दोषों के कारण भारत में हर साल 11.5 लाख बच्चे 5 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही काल के ग्रास बन जाते हैं। भारत में प्रतिदिन का यह आंकड़ा लगभग चार हजार छः सौ पचास का है।  संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ ) की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में भारत में शिशु मृत्यु दर 58 प्रतिशत से भी अधिक है। यूनिसेफ के अनुसार अगर विश्व के द्वारा बाल मृत्युदर को कम करने के लिए तेजी से प्रयास नहीं किए गए तो 2030 तक  लगभग 7 करोड़ बच्चो को अपनी 5 वर्ष की उम्र तक पहुँचने से पहले ही मौत का सामना करना पड़ेगा। गौरतलब है कि यह दर गरीबी और कुपोषण के वर्चस्व में अधिक पाई गयी है। यही कारण है कि सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि कुपोषण को चिकित्सकीय आपातकाल करार दिया जाए। वर्तमान में कुपोषण की समस्या हल करने के लिए नीति बनाने और उसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त बजट की आवश्यकता के संदर्भ में कदम उठाने की आवश्यकता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया से बहुत ज़्यादा है।  नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के  अनुसार भारत में अनुसूचित जनजाति (28 फीसदी), अनुसूचित जाति(21 फीसदी), अन्य पिछड़ा वर्ग(20 फीसदी) और ग्रामीण समुदायों में (21 फीसदी) कुपोषण के मामले पाये जाते हैं। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे की तीसरी रिपोर्ट में राजस्थान में अनुसूचित जनजाति के पांच साल से कम आयु के बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं। इन मौतों से बचने और नवज़ात जीवन को बचाने के बहुत से उपाय हैं, जिन पर अगर गौर किया जाय तो बहुत सी स्थितियों पर काबू पाया जा सकता है। यूनिसेफ का मानना है कि पांच साल से कम उम्र के 22 फीसदी बच्चो की मौत न्यूमोनिया और डायरिया से हो रही है, जबकि स्वास्थ्य विभाग के मद में केंद्र और राज्य सरकार करोड़ों खर्च कर रही है। नवजात शिशुओं के मौत के पीछे शिशुओं को गंभीर रोग होना, माँ का एनिमिक होना और गर्भावस्था या प्रसव के बाद पौष्टिक आहार नहीं लेना तथा कमजोरी के कारण स्तनपान नहीं कराना भी  महत्त्वपूर्ण कारण रहें हैं। इस रिपोर्ट पर किया गया अध्ययन बताता है कि गरीब समूहों के बीच जीवन बचाने में किए गए सुधार, संबंधित देशों में शिशु एवं बाल मृत्युदर को गैर गरीब समूहों की तुलना में तीन गुना कम कर सकते हैं। यूनिसेफ ने पाया कि स्वास्थ्य औऱ वंचित बच्चों और समुदाय में निवेश करने से यह रूपयों के लिए ज्यादा मूल्य प्रदान करता है। यह कम वंचित समूहों पर 10 लाख यूएसडी के बराबर किए गए निवेश के दोगुना लोगों की ज़िंदंगी बचाता है। इस अध्ययन के लिए छह महत्त्वपूर्ण व्यवधानों को भी चुना गया जिससे मातृत्व, नवजात और शिशु व्यवधानों के संकेतों का पता चल सके। इनमें  बिस्तर पर प्रयुक्त होने वाले कीटनाशकों से लड़ने में सक्षम जाल  , प्रसवपूर्व देखभाल, स्तनपान की समय पर शुरूआत, समुचित टीकाकरण और प्रसव के समय प्रशिक्षित सहयोगी की उपस्थिति शामिल हैं। ज़ाहिर है ये सभी बुनियादी आवश्यकताएँ हैं, जिन  पर केन्द्र और राज्य सरकारों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य राज्य का विषय है, पर कोई भी राजनीतिक दल शायद ही स्वास्थ्य समस्याओं को चुनावी मुद्दों के रूप में चुनता है। किसी भी शासन की, उसकी जनता को बुनियादी आवश्यकता मुहैया करवाना महत्त्वपूर्ण जवाबदेही है अगर इसमे वह कोताही बरतता है तो यह निःसंदेह उस व्यवस्था की असफलता ही माना जाएगा। इन आंकड़ों, समस्याओं और समाधानों  पर और चर्चा करने से पूर्व यह याद करना भी उपयुक्त होगा कि हाल में जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2017 के अनुसार भारत में भूख एक गंभीर समस्या है तथा 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 100 वें पायदान पर है।
मौत के ये खौफ़नाक मंजर गुजरते  रहते हैं, जाँच आयोग गठित होते हैं और कुछ दिनों बाद कब्रों पर पड़ी मिट्टी भी सूख कर रहस्य बन जाती है । कहते हैं नन्हें ताबूत सबसे अधिक भारी होते हैं पर इन मौतों से जुड़े दंश तो वे कोखें ही जान सकती हैं जिन्होंने नो महीने उन्हें अपने रक्त के कतरे-कतरे से पाला है।  अगर सरकारें निज़ी स्वार्थों और विरोधी दलों पर छींटाकशीं और तुलनात्मक अध्ययन करने से हटकर बुनियादी ज़रूरतों की  ओर अपना ध्यान लगा लें तो सूरते हाल कुछ और ही होगा। इससे इतर प्रशासन और व्यवस्था के वर्तमान सरोकारों के लिए तो दानिश बहुत पहले कह गए हैं- ‘शहर भर के आईनों पर खाक डाली जाएगी, आज फिर सच्चाई की सूरत छिपा ली जाएगी।'

Monday, October 30, 2017

ज़रूरी है जड़ों की सहेजन!

ज़रूरी है जड़ों की सहेजन ताकि परिन्दें बैखोफ़ उड़ते रहें
बरेलवी साहब का कहन है, थके हारे परिन्दें जब घरौंदों की ओर रूख करते हैं तो सलीकेमंद शाखाएँ ही उन्हें संभालकर उनकी थकन को स्नेह की थपकियाँ देती हैं। बड़े, जो वटवृक्ष की मानिंद हमें सुरक्षा का अहसास देते रहते हैं, गर ना हो तो जीवन कितना दिशाहीन हो जाएगा, यह सोच ही भय पैदा करता है। किसी ने ठीक ही कहा है, अनुभव की पोटलियों से जब ज्ञान बूँद-बूँद रिसता है तो वह जीवन दर्शन की लकीरें बन, मिसाल बन जाता है। वृद्धजन जिन्हें हम हमारे अग्रज,बड़ेरे, विरासत या थाती कहकर पुकारते हैं, दरअसल वो हमारी संस्कृति के पुरोधा हैं। कितना सुखद होता है ना कि, सांझबाती सा कोई जलता रहता है, हमारी देहरी पर और हम सुकून से उसके सकारात्मक उजास में जीते रहते हैं। हमारे बड़ेरे, वृद्ध हमारी थाती है। अगर वृद्ध ना हो तो नयी पीढ़ी विभ्रमित हो  जाएगी शायद इसीलिए वेद और स्मृतियों ने भी बुजुर्गों के सम्मान की बात कही है।
वृद्ध हमारी जिम्मेदारी नहीं वरन् आवश्यकता है
विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रता हुआ मानव शरीर उत्तरोत्तर विकास करता  है। सूर्य की ही भाँति जीवन का अरूणोदय होता है और उसी की भाँति मध्यम हो अस्ताचल भी। संभवतः इसी कारण कार्ल युंग ने वृद्धावस्था की तुलना डूबते हुए सूर्य से की है;निस्तेज, एकाकी और डूब की ओर बढ़ता हुआ जीवन। यह बिम्ब और सोच ही मन में एक उथल-पुथल मचा देती है तो फिर इस अवस्था को तमाम वैपरीत्य के बीच जीना कितना दुभर होता होगा, कल्पना से परे है। इसी असहाय और अरक्षित स्थिति के कारण वेद भी इस अवस्था विशेष में परिवार तथा संतति की भूमिका और जवाबदेही तय करते हैं। हमारे वेदों और स्मृतियों में आयुवृद्ध, कुलवृद्ध,शीलवृद्ध और ज्ञानवृद्ध जैसी अनेक महत्ती अवधारणाएँ मिलती हैं। मनुस्मृति में इस अनुभवी वर्ग  के प्रति श्रद्धाभाव इस प्रकार व्यक्त किया गया है- अभिवादन शीलस्य नित्यवृद्धोपसेविनः,चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥ (मनुस्मृति २-१२१, उद्योगपर्व ३९/७४)
अर्थात् नित्य गुरुजनों का अभिवादन और बड़ों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश एवं आत्मबल की प्राप्ति होती है ।
निःसंदेह वृद्ध हमारे समाज की धुरी हैं। कोई भी परिवार उनके अभाव में मानवीय उच्चों को नहीं छू सकता।  हमारे पुरोधा हमें ना केवल अपने अनुभवों से हमें जीवन जीने की अमूल्य सीख दे देते हैं, वहीं भावनात्मक टूटन पर अपने नेह की मरहम भी लगाते हैं। बड़ों की छाँव वटवृक्ष सी होती है, स्नेहिल, हरियल जिसमें हर थकन दूर होती नज़र आती है।

आधुनिकता की बयार में रीतती संबंधों की ऊष्मा
आज तकनीक, आधुनिकतावाद और बाज़ारवाद की मजबूरियों ने मनुष्य को मनुष्य से दूर कर दिया है। देश, समाज और परिवार को अपना पूरा जीवन दे देने वाले बुजुर्ग, अपनी ही संतति से दूर हो अकेले हो गए हैं। कई बार उनका अकेलापन इतना क्रूर नज़र आता है कि उनके दुनिया से लौट जाने की खबर भी खबर बन कर ही सामने आती है। बुजुर्गों का अकेलापन, उनकी समस्याएँ और उनके प्रति समाज की उदासीनता आज के संवेदनहीन समय की कड़वी सच्चाई है। अनुभवों की इस हरियल ओट को सूखता देख प्रसाद की ये पंक्तियाँ अनायास ही जेहन में उमड़ती हैं-“ अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है, क्या वह केवल अवसाद मलिन झरते आँसू की माला है?”
गुड़ सी मीठी और दर्द के नमकीन से पगी स्मृतियाँ
वृद्धावस्था जिसे हम जीवन का सांध्य कहते हैं, वह किसी दिवस का अंत जैसा कतई नहीं है। दरअसल हमारा नज़रिया, सामाजिक व्यवहार और अपनों की बेरूखी ही इस अवस्था के प्रति यह सोच प्रदान करती है। वृद्धावस्था का सच्चा आनंद है, आत्म-संतोष। वृद्धावस्था शरीर को ज़रूर जीर्ण-शीर्ण कर देती है, पर मन को नहीं कर सकती। रस्किन बांड जैसे अनेक जीवंत उदाहरण है, जिनके उत्साह को वृद्धावस्था लील नहीं सकी है, वरन् उनके अनुभव का उजास उनकी ढलती उम्र में भी एक अद्भुत गरिमा के साथ उनके व्यक्तित्व में नज़र आता है। जीवन की संध्या दर्द निवारकों के साथ-साथ अपने साथ एक अपूर्व श्री भी लाती है । कितना सुखद है कि मन में भावों का मृदु समीर सांस दर सांस हिलोरे लेता रहता है और स्मृतिअंचल पर चाँद-तारों से सजी गुड़ में पगी तो कभी कुछ नमकीन,  स्मृतियाँ ऊभ-चूभ होती रहती है। यह सच है कि हर अवस्था के अपने सुख और दुख हैं परन्तु चूँकि यह अवस्था कुछ हद तक दूसरों पर आश्रित है , अतः सामाजिक जवाबदेही सुनिश्चित करना ज़रूरी आवश्यकता बन जाती है।
जनसांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य
आँकड़ों की माने तो समाज में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। 2026 तक भारत में वरिष्ठजनों की आबादी 10.38 करोड़ से बढ़कर 17.32 करोड़ हो जाने का अनुमान है। बदलते समय में मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः की परंपरा वाले हमारे आर्य देश में बुजुर्गों की स्थिति शोचनीय है। यूनाइटेड नेशंस पोपुलेशन फंड की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 90 फीसदी बुजुर्ग लोगों को सम्मान की ज़िंदगी जीने के लिए ताउम्र काम करना पड़ता है। रिपोर्ट का दुखद पक्ष यह भी है कि साढ़े पाँच करोड़ बुजुर्ग लोग रोज़ाना रात को भूखे पेट सोते हैं और हर 8 में से 1 बुजुर्ग अवसाद और एकाकीपन के चरम पर जीता है। संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन, बार-बार वरिष्ठनागरिकों की समस्याओं की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। ये संगठन सरकारों और समाज को बार-बार चेताते हैं कि इस दिशा में नए विकल्पों और राहतों को खोजना होगा, परस्पर सहयोग और सद्भाव को बढ़ाने का प्रयास करना होगा नहीं तो मशीनीकृत होती संवेदनाओं के इस युग में यह वर्ग नितांत एकाकी और कुंठायुक्त जीवन जीने को बाध्य हो जाएगा।

बदलता सामाजिक ढ़ाँचा
भारत में पारिवारिक ढाँचा जिसका आधार सहजीवन और सहभागिता था , अब तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवार  व्यवस्था से जुड़े परिवार अब तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं। यही कारण है कि वृद्धों के लिए संरक्षण व्यवस्था अब समाप्त हो रही है। आय के लिए देश  की सीमाओं को लाँघ कर जाने वाले विकल्पों ने इस वर्ग को नितांत अकेला कर दिया है। वर्तमान में देश में हज़ार से अधिक वृद्धाश्रम पंजीकृत हैं। इनमें से 278 बीमार बुजुर्गों के लिए हैं जबकि 101 विशेषतौर पर बुजुर्ग महिलाओं के लिए हैं। 1999 में केंद्र सरकार ने बुजुर्गों के लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा की है, जिसके अंतर्गत स्वास्थ्य,सुरक्षा और सुचारू जीवन को ध्यान में रखते हुए अनेक सुविधाओं का ख्याल रखा गया है। 2007 में आए मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सीटिजन्स एक्ट के तहत वृद्ध संरक्षण को कानूनी जिम्मेदारी का जामा पहनाया गया। अनेक ऐसे कानून बन रहे हैं जो साधनहीन बुजुर्गों को उचित गुजारा भत्ता , आश्रय , चिकित्सा सुविधा और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं परन्तु अभी भी जमीनी स्तर पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हमारी सरकारों को वरिष्ठजनों की सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई और निर्णय लेने होंगे ताकि उन्हें कम से कम परेशानी उठानी पड़े। बैंक, रेल्वे स्टेशन आदि सार्वजनिक स्थलों तथा सरकारी कार्यस्थलों पर उनकी सुविधाओं का विशेष ख्याल रखते हुए व्यवस्थाएँ करनी होंगी, ताकि उनका जीवन सुचारू रूप से अपनी यात्रा करता रहे।
एकाकी जीवन जीने और उपेक्षा  का शिकार हैं वरिष्ठजन
चिंता का विषय है कि आज यह अनुभवी वर्ग सर्वाधिक कुंठाग्रस्त है। यह वर्ग आहत है कि जीवन का व्यापक अनुभव होते हुए तथा जीवन पर्यन्त अपनों के लिए सुख- सुविधा जुटाते हुए खुद को होम करने पर भी उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। स्वयं को अनुत्पादक और निष्प्रयोज्य समझे जाने पर यह वर्ग दुःखी होता है और सतत एकाकी जीवन जीने तथा जीवन के मौन छोर की ओर बढ़ने को बाध्य हो जाता है। हालांकि हमारे संविधान में वृद्ध जनों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई है साथ ही उन्हें कई कानूनी अधिकार भी प्रदान किए गए हैं।परन्तु इन अधिकारों के साथ-साथ उन्हें भावनात्मक , मनोवैज्ञानिक एवं आर्थिक संरक्षण भी प्रदान करना होगा जिससे वे मानसिक एवं शारीरिक शोषण से बच सकें। बच्चों में छुटपन से ही वृद्धों के प्रति आदर और देखभाल के बीज रोपने होंगे । परिवार महत्वपूर्ण निर्णयों में वृद्ध जनों को शामिल कर उन्हें उनकी महत्ता का विश्वास सहज ही दिला सकता है। बातें यूँ बहुत छोटी-छोटी हैं परन्तु सहयोग के लिए नयी पीढ़ी  को ही सधैर्य आगे आना होगा क्योंकि अनुभव के इन आशीष देते हाथों की हर परिवार को सतत आवश्यकता  है। वृद्धों के प्रति सही दृष्टिकोण तथा सकारात्मक सोच ही अनुभव के इन ख़जानों को अधिक समय तक सजग बनाए रखने में कारगर हो सकती है।

Monday, October 16, 2017

स्मृतियों में बसी हैं स्मिता!



एक चेहरा जो बेहद सादा है पर कशिश इतनी कि आँखें उस पर ठिठक कर रह जाएंँ। गोरे रंग से इतर सांवले का सम्मोहन, जिसके लिए भारतीय स्त्री को जाना जाता है,उसकी बेमिसाल मिसाल हैं स्मिता। 'साड़ी में लिपटा श्याम ज्यों' , तो इस छब में स्मिता सा कोई ओर नज़र नहीं आता। उसकी उन आँखों की मुरीद हूँ जिसकी आँखों में मानों सात समंदर ठहरे हैं।

स्त्री हर स्मृति में ठहरी होती है, जैसे कि हर पल की धड़ाधड़ी को करीब से महसूस करती हुई। जिन लम्हों, छुअनों का अन्य के लिए कोई मोल नहीं, उसे भी यह अन्या जी भर सहेजती है। एक मुस्कराहट, एक तल्खी, और जज़्बातों की गर्माहट को उससे बेहतर कोई ओर अपनी सांसों में व्याख्यायित नहीं कर सकता। उसकी आँखों का सावन तो जाने कितने युकलेप्टिस पीते हैं। इसी संजीदगी और स्त्री के स्त्री होने को सेल्यूलाइड  पर स्मिता जी भर जीती नजर आती है।

श्याम बेनेगल की 'चरण दास चोर' से आरंभ हुई यह यात्रा कई खूबसूरत मोड़ों से होकर गुजरती है। मंथन, बाज़ार, भीगी पलकें, भूमिका, चक्र, मंडी, आक्रोश, अर्द्धसत्य, रावण और मेरी प्रिय, 'आखिर क्यों' इन सभी फिल्मों की स्मृति, किरदारों के नाम सहित ज़ेहन में जीवंत है।  टेलीफिल्म सद्गति में भी उनका अभिनय कहाँ भूलाए भूलता है।

कुछ ना कह कर भी सब कह देने वाली बोलती आँखों के खिंचाव को आज भी उतनी ही शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । अमूल का विज्ञापन इस खास चेहरे के कारण ही जाने कब से मेरे लिए खास हो गया था।  अनेक किरदार हैं जिनमें से एक है आखिर क्यों की निशा शर्मा। यहाँ स्त्री की कोमलता में छिपी सशक्तता को वे इतनी सादगी और सहजता से बयां कर देती है कि 'कोमल है कमजोर नहीं' पंक्तियाँ मन पर अमिट हो जाती हैं। जाने कितने-कितने किरदार हैं जिन्हें देख लगता है कि इसे केवल स्मिता ही निभा सकती थीं ..।

समानान्तर फिल्मों में जिस संजीदगी, गांभीर्य, सशक्त अभिनय और नैसर्गिक सौंदर्य की आवश्यकता हुआ करती हैं , वे सभी खूबियां स्मिता में देखी जा सकती हैं । स्मिता का जादू इस तरह है कि अब इस दौर में नंदिता में भी स्मिता की तलाश होने लगती है, हालांकि यह तुलना ठीक नहीं । यह जीवन इन पंक्तियों की तरह ही रहा कि दिलों पर राज तो किया पर मुहब्बत को तरस गए..
सादगी में लिपटी उन प्रश्निल आँखों का सौन्दर्य  वाकई एक दिलकश कशिश का अजस्र सोता है। यूँही कहाँ कोई आखिर दिल के करीब हुआ करता है।

#स्मृतियों_में_जीवित_श्यामल_गात

चित्र गूगल से साभार

Thursday, August 24, 2017

विदा की देहरी पर बेटियाँ 

बेटियाँ देहरी उघाँलते वक्त 
सिर्फ आशीष नहीं बिखेरती 
अपने मेहंदी रचे हाथों से 
वरन् समेट रही होती हैं 
एक साथ बहुत कुछ 
अपनी विक्षिप्त मनःस्थिति में। 

बरसते आँसुओं में
वे कोरों से चुपचाप पकड़ती हैं 
उसी देहरी पर देरतलक ठिठकी पदचापें 
स्वर्ण मृग सी चपल और सुंदर स्मृतियाँ 
और थेले में लौटती सारी दुनिया की खुश सौगातें 

अपनी सुबकती हिचकियों में 
वे बार-बार अनुरोध करती है 
तैतीस करोड़ देवताओं से 
माँ बाबा की छाँव में कुछ और देर रूके रहने का 
ताकि थामे रहे भाई के हाथ को देरतलक  
और बहन से लिपट कर 
गला दे तमाम शिकवे 
मीठी चुहलबाजियों के 

आशाओं और इच्छाओं के भँवर में 
वे लौटती हैं उस चंदन के पालने पर 
जिसकी डोरी का रेशम 
मन पर अब तलक बेहिसाब बिछलता है 

जानते हो! 
विदा होते वक्त 
बेटी का दिल 
पहाड़ सा होता है 
भय की सिकुड़न और 
परिस्थितियों को झेलने की विराटता को
एक साथ, चुपचाप सहेजे हुए!

- विमलेश शर्मा

प्रगतिशील सोच के ही पैरोकार हों धारावाहिक



दृश्य साधन मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं, इसी कारण सामाजिक मनोविज्ञान के तार भी इससे गहरे जुड़े हुए दिखाई देते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान में संस्कार और पुरातन जकड़ने इतनी गहरी है कि वर्चस्ववादी ताकतों और मानसिकता को हवा देने वाली स्थितियाँ समाज सहज ही आत्मसात भी कर लेता है। टी.वी. और उसमें आने वाले ऐसे धारावाहिक इसी मानसिकता को हवा देते हैं। यह मंच अनेक प्रसंगों में घर-घर की कहानी और परम्पराओं की दुहाई के नाम पर ही सामाजिक जड़ मान्यताओं को बढ़ावा देता रहा है। कुछ नया करने की आड़ में ये शो कभी अतिमानवीय कथानकों को पकड़ते हैं, तो कभी जड़ मान्यताओं को हवा देते हैं। कभी ये इतिहास के झरोखों से केवल ऐसे प्रसंगों को चुनते हैं, जो महज़ भूलों से स्मृति में जमे रहते हैं तो कभी किसी कुप्रथा को ही आभिजात्य और सामंती रंग देकर विलासिता को बढ़ावा देते प्रतीत होते हैं। वर्तमान में ऐसे कथानक टी.वी. सीरीयल्स में बढ़ गए हैं जो घर की भीतरी संस्कृति में चुपचाप दखल देते हैं। हाल ही में बाल विवाह को एक विलास और सामंती कलेवर में प्रस्तुत करने वाले सीरियल को प्रतिबंधित करने की माँग उठी है। टेलीविजन पर दिखाया जा रहा शो पहरेदार पिया कीशुरू से ही अपने लीक से हटकर विषय होने के कारण विवाद में रहा है। इस धारवाहिक के नाटकीय कथानक में 10 वर्ष के बच्चे और 19 साल की लड़की का विवाह दिखाया गया है। यहाँ 10 वर्ष का अबोध बालक शादी की रस्म पूरी तन्मयता से पूर्ण करते हुए दिखाया जा रहा है, निःसंदेह दर्शक बालमन पर इसका नकारात्मक असर कहीं न कहीं गहरे तक पड़ता ही है। साथ ही भव्य तरीके से इन कुप्रथाओं को सामने रखना सामाजिक मनोविज्ञान के ताने-बाने पर भी प्रभाव डालता है। गौरतलब है कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा बाल विवाह होते हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया के 40 प्रतिशत बालविवाह होते हैं। 49% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में ही हो जाता है। बालविवाह जैसा अभिशाप ही लिंगभेद और अशिक्षा का भी सबसे बड़ा कारण है। हालांकि कई कानून और संस्थाएँ इन्हें रोकने का काम कर रही है, पर अभी भी बदलाव का आंकड़ा छूना आसान नहीं है।
इस शो के कथानक और विषय को लेकर बढ़ते प्रतिरोध को लेकर हालांकि इसके किरदार शो के बचाव में आगे आते हुए कह रहे हैं कि हम किसी को कुछ नहीं सिखा रहे हैं, बल्कि यह प्रगतिशील विचारों का शो है। यह शो को प्रथम दृष्टया देखने पर तो कतई प्रतीत नहीं होता। फिलवक्त शो को बंद करने के लिए दायर की गई ऑनलाइन याचिका ने शो के आयोजकों को चिंता में ज़रूर डाल दिया है।  ख़बरों की माने तो दर्शक बिलकुल नहीं चाहते कि टी.वी. पर इस तरह के शो आएं। स्मृति इरानी तक अपनी बात पहुँचाने के लिए विरोध स्वरूप प्रारम्भ  हुई इस मुहीम में CHANGE.ORG वेबसाइट पर एक दर्शक ने सीरियल को बैन करने के लिए एक अभियान प्रारम्भ किया है। इस मुहीम पर अभी तक 55.000 लाइक्स भी आ चुके हैं। चिंता का विषय यह है कि शो एक 10 वर्ष के किशोर और नवयौवना के बीच प्रेम-प्रसंगों के दृश्य दिखला रहा है। राजकुमार , रनिवासों सा परिवेश लिए यह शो अपने रंग व दृश्य संयोजन के लिए भी चर्चा में रहा है। परन्तु विसंगति किसी भी सांचे में परोसी जाए उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। आधुनिक पीढ़ी टी.वी. को अपना आदर्श मानती है और उसका अंधाधुंध अनुसरण करती हुई दिखाई देती है। हालिया मामलों में वीडियो गेम का मामला और उससे प्रभावित होकर खेल में जीवन झोंक देने वाले प्रसंग भी हम देख रहे हैं। यह मनोविज्ञान ही तो है जो इतने गहरे तक व्यक्तित्व पर असर डालता है कि वह परिवेश के हाथों की कठपुतली मात्र बन जाता है।
हमारे समाज का एक बड़ा तबका अर्द्धशिक्षित और अशिक्षित है। वे उसी बात को सत्य मान बैठते हैं, जो दिखाई दे रहा है। एक सामान्य धारणा यह भी है कि जो दिखता है वह सच ही होता है, ऐसे में जब लिंगभेद और सामाजित संतुलन की बात करते हैं तो फिर ये शो आँखों का काजल चुराते से प्रतीत होते हैं। यह भ्रम , छलावा, झूठा वैभव परोस कर टेलीविजन संस्कृति, शुचिता और नैतिकता पर भी प्रभाव डाल रहा है।  किसी भी समाज और सामाजिक व्यवस्था हेतु नैतिक और सामाजिक बंधनों का जटिल होना, कहीं ना कहीं सामाजिक साम्य स्थापित करने के लिए भी होता है। ऐसे में अगर वैपरीत्य को बढ़ावा दें तो सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाएगा। वर्तमान में अनेक प्रसंग है जो बालमन और युवामन को अपनी गिरफ़्त में ले रहे हैं। कहीं बाजारवाद उन पर हावी है तो कहीं वह अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उलझा है। कहीं वह रोजगार प्राप्ति की दौड़ में इतना आगे बढ़ गया है कि उसके अपने, दीवारों के भीतर ही चीख-चीख, कहीं पीछे छूट दम तोड़ रहे हैं। स्थितियाँ निःसंदेह भयावह है, अगर इन्हें संभालना है तो दृश्य-श्रव्य साधनों को सुधारवादी दृष्टिकोण सामने रखना होगा। केवल शो की प्रसिद्धि के लिए ऐसे विषयों को बढ़ावा देना कतई नासमझी है। शायद इसीलिए भारतीय दर्शक भी इस प्रकरण पर असंतुष्ट नज़र आ रहा है और सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाले इस सीरियल को प्रसारण के पहले दिन से ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है। शो में ना केवल घटनाक्रम को लेकर ही आपत्ति है वरन् उसके संवाद भी बेतुके हैं। ये संवाद मनोविज्ञान की नज़र से संवेदनशील मन के लिए बहुत घातक हैं।
दूसरी तरफ़ भारत में अभी भी समाज का ढांचा पितृसत्तात्मक ही है। ऐसे में महिलाओं को अभी भी अपने अधिकारों के लिए अनेक स्तरों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है। आधी आबादी पर परम्पराओं की जकड़नें इतनी अधिक हैं कि अनेक स्याह साये उनका अनवरत पीछा कर रहे हैं। शिक्षा और आधुनिक युग की बयार ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता तो प्रदान दी है परन्तु दकियानुसी मानसिकता और पितृसत्ता के पैरोकार अभी भी इस स्वतंत्र छवि वाली स्त्री से नाखुश हैं। ऐसे में परम्पराओं या अन्य छलावे के माध्यम से  स्त्री जीवन को कुंद बनाकर प्रस्तुत करने वाली मानसिकता वाकई प्रतिबंधित ही होनी चाहिए। सिनेमा, रंगमंच, साहित्य आदि जनमानस की भावनाओं पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं अतः सेंसर की भी इन्हें ही अधिक आवश्यकता है। साहित्य, समाज और सिनेमा स्वहितों को छोड़कर, लामबंद होकर अगर विसंगतियों के खिलाफ़ मोर्चा खोल ले तो इससे बेहतर नज़ीर अन्य नहीं होगी, अन्यथा यही होगा कि-

मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी,

वो झूठ बोलेगा और ला-जवाब कर देगा।(परवीन शाक़िर)

Tuesday, July 4, 2017

आत्महत्या के विरूद्ध!

कोई भी आत्महत्या कचोटती है, देरतलक..! उस अजाने दर्द की सीलन मन की दीवारों पर कई दिनों तक जमी रहती है, कभी दबे पाँव यूँही आ धमकती है। मानव मन के कितने कोने केवल खुद तक ही जाहिर होकर रह जाते हैं, यही सीमा शायद भीतर गहरे तक कहीं भावनाओं की सुनामी पैदा करती है। माना मृत्यु का अपना सम्मोहन है पर हम फिर भी जीवन जिए जाने के तर्क दिए चले जाते हैं।
कोई गहरी नींद को अपने पूरे होश में कैसे चुनता है, कैसे जीवन के चटख या धुंधलके से मुँह मोड़ता है यह तो सिर्फ वही जान सकता है, जो इस पीड़ा और निर्णय का साक्षी रहा हो.. हमारा देय हर जीवन में खुश लम्हों का जोड़ हो तो हम सहचर आत्माएं हैं वरना प्रकारांतर से उस जीवन के अवरोधों में ही तो शामिल । हर जीवन के अपने संघर्ष हैं... किसी ओर की नजर में भले वे तिल से हों पर प्रभावित मन के लिए तो पहाड़ से ही होते हैं।
 उफ्फ! वाकई तमाम अवरोधों, भावनाओं की उठापटक के साथ जीवन जीना  बहुत मुश्किल है।

 जाना है कि अवसाद स्थायी नहीं हो सकता अगर उसे हराने के लिए दिल से कोशिश की जाए। पर कई बार परिवेश दिल की इन कच्ची कोशिशों पर हावी हो जाता है और भावनाओं का ज्वार तमाम वैचारिकी को परे धकेल एक पूर्ण विराम को अपना कर सफर समाप्ति की घोषणा कर देता है। हम बस इस विराम की स्याह छाँह में देर तलक बस सिसकते रह जाते हैं...!

आत्महत्या के विरूद्ध
___________________

यूँ टूटता है हर घड़ी कुछ
मन के निबिड़ एकांत में

कहीं चटकता है शीशे सा ख्वाब
किसी सड़क के सबसे खूबसूरत मोड़ पर
तो कहीं सिन्दूरी आँचल से गिर पड़ते हैं सितारे कई

पर रीतती संवेदनाओं के बीच भी
चलना होता है
खुद को
खुद के लिए ही
अनवरत!

दर्शन बतलाता है कि
इक बोझ उतारने के लिए
दूसरा लादना समझदारी नहीं
वह सिखलाता है
चेतना की इस पगडण्डी पर खौफ़नाक  सांये हैं
पर लड़ना होगा उन तमाम अँधेरों से
जो छीनते हो
स्वत्व, आस और चंदीले ख्वाब

मैंने माना
मौत दर्ज़ है
ज़िंदगी कि किताब के
उस अंतिम पृष्ठ पर
किसी अदृश्य अल्फाज़ की तरह

पर  उसके माथे पर चमकने तक,
इंतजार करना होगा..!

Thursday, June 29, 2017

सजग रहकर तोड़ना होगा सूचनाओं का भ्रमजाल




हर खबर का अपना सूचना तंत्र होता है। कभी यह तंत्र जनपक्षधर होकर   सामाजिक हित में जनता के साथ खड़ा होता है तो कभी महज सनसनी फैलाता है। यों हर प्रसारित सूचना का उद्देश्य भी होता है और फलादेश भी।समाज में परिवर्तन के साथ-साथ पत्रकारिता में भी बदलाव आया है।तत्काल खबरों की चुनौती से सोशलमीडिया के प्रयोग को बल मिला। कोई भी खबर हो, अब सोशल मीडिया के हवाले से चंद मिनटों में ही वायरल हो जाती है। पर नई सम्भावनाओं की इस तलाश ने खबरों की विश्वसनीयता को ध्वस्त कर दिया है। अब तक यह माना जाता था कि जो दिखता है,वो सच होता है संभवतः इसीलिए टी.वी. को अखबारों से अधिक महत्त्व मिला। उसी टी.वी का अगला पायदान फेसबुक, ट्वीटर,व्याटस एप्प हुए क्योंकि ये हर वर्ग की जद में हैं तथा लोकप्रिय साधन हैं। सोशल मीडिया के ये मंच दरअसल बेलगाम भी हैं। ये प्रसारण में तो तीव्र हैं पर उन पर नज़र रखने के लिए प्रभावी तीसरी आँख नहीं है जिसका नतीजा है कि इस पर झूठी खबरों का चलन बढ़ता जा रहा है।  ये मंच जो घटनाओं के समीकरण से अजान आम आदमी की जद में है, उसे भ्रमित करता है। ऐसी ही खबरों को आजकल  फेक न्यूज का नाम दिया गया है। ऐसा नहीं है कि ऐसी झूठी खबरों का बाज़ार सिर्फ और सिर्फ भारत में ही फल-फूल रहा है बल्कि पूरा विश्व इनकी जद में हैं। वैश्विक स्तर पर सरकारों द्वारा इन झूठी खबरों को प्रसारित करने का ताजा तरीन मामला अमेरिका राष्ट्रपति चुनावों का है। जिनमें से अगर बतौर उदाहरण देखें तो डेनवरगारजियन डॉट काम पर एक खबर इस हेडलाइन के साथ वायरल हुई कि हिलेरी इमेल लीक प्रकरण में जो संदिग्ध  एफ बी आई एजेन्ट था वह मर्डर या आत्महत्या के तहत मृत पाया गया। ऑनलाइन फेक न्यूज के मामले तब सामने आए जब अमेरिका ने 45 वें राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप को चुना। विश्लेषक व प्रभाव रखने वाले मीडिया ने हिलेरी की जीत को लेकर भविष्यवाणी की थी, लेकिन आम दर्शक गलत साबित हुआ । वास्तविकता, काल्पनिकता से बहुत अलग थी।  ऐसी खबरें जो कोई तीसरी आँख,कौतूहल को बढ़ाने के लिए उत्पादित करती है कई मर्तबा विरोधी दलों को लाभ या हानि पहुँचाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
फेक न्यूज की बड़ी श्रृंखलाएँ सोशल मीडिया के इन मंचों पर मौजूद हैं,पर जो बात चौंकाती है वह यह है कि सरकारें भी इन फेक न्यूज का उत्पादन अपनी सहूलियत और निजी स्वार्थों को साधने के लिए करती हैं। इसी बात का खुलासा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की कम्यूनिकेशन प्रोपेगेंड़ा रिसर्च प्रोजेक्ट नाम की एक रिपोर्ट में भी किया गया है। जिसमें एक स्वचालित कम्पयूटर स्क्रिप्ट का जिक्र है जो एक साथ कई लाख लोगों को भेजी जा सकती है और इसके जरिए ट्वीटर, फेसबुक और पेज पर लाइक्स और फालोवरस की संख्या और साझा की गई पोस्ट्स दिखाई जाती है। फॉक्स, यूटीवी,वायाकॉम 18,वार्नर ब्रास जैसी कंपनियां जिस तरह हमारे सिनेमा को नियंत्रित कर रही हैं उसी तरह सोशल मीडिया के फेक लाइक्स, फॉलोअरस जैसे आँकड़ें भी देश और विदेश की कई वेबसाइट्स के जरिए  इसी तरह परदे के पीछे से संचालित हो रहे हैं, ट्राई हो रहे हैं। ये घटनाएँ मीडिया की आजादी औऱ गिरती साख को तो बताती ही है पर जनतंत्र को भी भीतर से तोड़ कर रख देती है।
सोद्देश्य और जन पक्षधर लेखन की बजाय महज सनसनी बनाए रखने का, इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता    का यह स्याह पक्ष खौंफ पैदा करता है। इसमें आम आदमी कभी भी ट्रोल किया जा सकता है, सरे आम किसी पर भी पत्थर फेंका जा सकता है या कोई भी बेकाबू , अनिंत्रित और हिंसक, नमाजी भीड़ के हत्थे चढ़ सकता है। पिछले कुछ सालों में भारतीय राजनीति के अखाड़े में नेताओं के लिए सोशल मीडिया बेहद मारक और अचूक हथियार साबित हुआ है। पूर्व में भ्रष्टाचार के विरोध में हुए आंदोलन से इस मंच की ताकत का एहसास राजनीतिक पार्टियों को हो गया था। इसी जादू से प्रभावित होकर सभी राजनीतिक पार्टियों को इस ओऱ रूख भी करना पड़ा। लोकसभा चुनावों के बाद हालांकि इस पर बहस तेज हो गयी है  कि सोशल मीडिया के कितने फायदे हैं और कितने नुकसान पर फिर भी अपनी तरह से अनुकूल लहर फैलाने का काम सरकारों, राजनितिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं द्वारा जारी है। कुछ लोग एक मैमे बनाते हैं, जिसे ट्वीटर पर पोस्ट किया जाता है औऱ फिर वह व्हाट्स एप्प ग्रुप्स में चलने लगता है। न्यूयार्क टाइम्स में छपा लेख इन्हीं खतरों की ओर ध्यान खींचता है। फेक न्यूज का यह बढ़ता आँकड़ा अब सरकारी और आर्थिक दखल से भी आगे बढ़ गया है। ट्रंप जैसे राजनयिक लोग इस धारा का इस्तेमाल भी करते हैं और फिर इसे बाजारू भी घोषित कर देते हैं।
          फेक न्यूज के बढ़ते दायरे ने मुख्य धारा की खबरों और बौद्धिक लेखों को हाशिए पर धकेल दिया है । आज का युवा जिन खबरों से स्वाधिक प्रभावित है,वह फेक न्यूज है। आज अगर कोई आम आदमी सरकार या प्रशासन के खिलाफ गलत बयानबाजी करता है तो उस मुखर विरोध को दबाने के लिए आई टी कानून हैं, उसे फिर भी रोका जा सकता है। पर जब स्वयं सरकारें इस तरह के आरोपों से घिरेंगी तो उनके लिए ट्राई(नियामक संस्था) की भूमिका में कौन आगे आएगा। सरकारें, दल इन फेक न्यूज के माध्यम से अवाम की जन भवनाओं को उकसाने का प्रयास करते हैं। दरअसल यह एक सीमित जानकारी के तहत जनता को भ्रम में रखने  की कोशिश है। सोशलमीडिया पर वायरल होने वाली ये खबरें उन्माद पैदा करती है। इस तरह से खबरों का अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करना , किसी को राष्ट्रवादी, गैर राष्ट्रवादी घोषित करना भारत ही नहीं विश्व स्तर की राजनीति  का हथियार है। कैराना को कश्मीर बनाने की साजिश हो, मंदिर और मस्जिद जलने की अफवाह हो या अन्य देश पर आक्रमण या लड़ाई की खबरें हो अनेक खबरों की फेक न्यूज ,आज फेसबुक या न्यूज अपडेट्स पर तैरती मिलती रहती है। अभी हाल ही में आरक्षण खत्म करने की बातें भी सोशल मीडिया पर तैरती मिल रही थी, जो बेबुनियाद थीं।

जाहिर है कि ये मामले  मीडिया की स्वायत्ता के खिलाफ खतरे को इंगित करते हैं। कोई खबर छपती है, चलती है और किसी अन्य का राजनीतिक कैरियर खत्म हो जाता है,। यह डिजाइन, यह साजिशें जनता को ही रोकनी होगी। ऐसे संगठन बनाने होंगे  जो फेक न्यूज की निगरानी रख सके। हमें विवेकबोध की ज़रूरत है जो सच औऱ झूठ में अंतर कर सके। बहुत कम लोग हैं जिन्हें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य मामलों की वास्तविक समझ है पर आज कोई भी आकर विचार, तथ्यों और विश्लेषणों से परे मह़ज क्षणिक भावावेश में आकर अपनी राय ज़ाहिर कर देता है औऱ बात सच, झूठ के परीक्षण से गुजरे बिना ही वायरल हो जाती है। ऑनलाइन वर्ग को फेकन्यूज वेंडर्स के प्रति जागरूक होना होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए बीबीसी ने स्लो न्यूज जारी करने की बात कही है तथा फेसबुक ने भी एडिटिंग का विकल्प रखने की बात कही है। बीबीसी के अनुसार 83 प्रतिशत भारतीय दर्शक इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि यह सूचना, खबर असली है या नकली। इस भ्रम से बचने के लिए ब्लूम लाइव डॉट इन, हाल्ट न्यूज डॉट इन(अहमदाबाद) तथा मीडिया विजिल जैसी अनेक वेबसाइट्स ऐसी खबरों, पोस्टस को उद्घाटित करने की कोशिश कर रही हैं जो नकली हैं, पर इनका प्रसार अभी भी बहुत कम है। सोशल मीडिया पर भ्रम के इस कारोबार को, जिसके मूल में कहीं ना कहीं तल्खी बनाए रखने की जिद और सनसनी ही शामिल है, रोकना होगा अन्यथा मीडिया जनतंत्र के उस विश्वास को खो देगा जो उसने अपनी प्रतिबद्धता और विश्वसनीयता के दम पर हासिल किया है ।

Thursday, June 15, 2017

सेना पर गलत आरोप उचित नहीं!











कश्मीर हमारा ताज़ ..कितना खूबसूरत लगता है ना यह कहना, पर वहाँ के हालात  दर्द और खौफ़ की अज़ीब दास्तां को बयां करते हैं। कभी सेना पर पथराव तो कभी पैलेटगन का विरोध जैसे अनेक वाकये हमें गाहे-बगाहे सुनने को मिलते हैं। सुना है, वहाँ की वादियाँ जोरदार धमाकों और फायरिंग से गूँजती है और ऐसे मौकों पर लोग वहाँ बत्तियाँ गुल करके एक दूसरे की घड़कन सुना करते हैं। आसरा होता है तो बस सेना का कि वह सब कुछ सहेज लेगी। सेना की नीतियाँ स्वयं सेना तय करती है और निःसंदेह वे जनहित में ही होती हैं। अगर ऐसे में कोई मामला वैपरीत्य में  प्रचारित होता हुआ नज़र भी आता है तो उसे लेकर सम्पूर्ण सेना, उसकी कार्रवाई और नीतियों पर ही प्रश्नचिन्ह  लगा देना बेमानी प्रतीत होता है कश्मीर में सेना के साथ बदतमीजी को लेकर तो कभी उनकी भूमिका को लेकर आए दिन कुछ ना कुछ सुनने को मिल जाता है।  अगर वहाँ किसी पत्थरबाज को पकड़ लिया जाता है और सीख के लिए सैनिकों के द्वारा आत्मरक्षक कदम  जनहित में उठाया जाता है, तो वह मानवाधिकार के घेरे में आ जाता है। हालांकि अन्य दृष्टि से यह भी मानवाधिकार के विपरीत है पर क्या ये स्थितियाँ औऱ इनमें सेना के द्वारा उठाए जाने वाले कदम इतने आसान हैं जितने की हमें सोशल मीडिया पर पोस्ट या टीप करते, पढ़ते हुए,लिखते, देखते या सुनते हैं, शायद नहीं।

एक वीडियो सोशल मीडिया पर फिर वायरल हो रहा है। इस वीडियों के सच या झूठ होने पर अभी कोई तय सूचना भी नहीं है, पर यह झूठ सा दिखने वाला सच आहत करता है । वीडियों में बुरका पहनी हुई एक महिला सेना पर आरोप लगाती हुई नज़र आ रही है कि सेना हमारे घरों में जबरन घुसकर  हमें परेशान करती है, तोड़-फोड़ करती है। उनका कहना है कि सेना के जवान हमारे साथ मार-पीट करते हैं, नाना प्रकार की माँग करते हैं, फिर हम इनका साथ क्यों दें। जैसा कि अमूमन होता है,वीडियों के जारी होते ही इसे बड़ी संख्या में लोगों द्वारा शेयर भी किया जा चुका है। अनेक लोगों ने वीडियों पर प्रतिक्रिया भी दी है। कई लोगों ने सेना के खिलाफ टिप्पणियाँ भी लिखी हैं, लेकिन जो बात चौंकाने वाली है वह यह कि वीडियों पर कमेंट करने वाले यूजर एक ही सम्प्रदाय विशेष के हैं। यूँ इन खबरों , वीडियों से मुत्तसिर नहीं हुआ जा सकता पर फिर भी ये घटनाएं कोमल जनमानस और सेना के विश्वास पर व्यापक प्रभाव तो छोड़ती ही हैं।
खबरों का रसायन कितना मारक होता है , यह हम सभी जानते हैं। इसलिए पत्रकारिता में भी शब्दों को बहुत तोल-मोल कर प्रयोग करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। फिर ऐसे में सोशल मीडिया पर सेना को लेकर क्षेत्र विशेष का ऐसा संवेदनशील  वीडियों या खबर आना जनमानस में एक सनसनी पैदा करता है। माना क्षेत्र विशेष में स्थितियाँ जटिल हैं पर अधिकतर ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाले लोग पूर्वाग्रहों  औऱ अतिवाद से ग्रसित होते हैं। पूर्वाग्रह  औऱ अतिवाद दोनो ओर हैं, दाएँ भी हैं और बाएँ भी , तमाम विचारधाराओं में पर क्या वे राष्ट्र या मानवता से ऊपर उठकर हैं हम इन अतिवादी ध्रूवों से बचकर मध्यम मार्ग की तलाश कर हालातों का सामना जनतांत्रिक तरीकों से भी तो कर  सकते हैं।
दरअसल ऐसी खबरों और दोषारोपण से उस सेना का मनोबल टूटता है जो सब कुछ छोड़कर भले ही किसी की नज़र में अपनी आजीविका के लिए ही सही, पर अपनी जान हथेली पर लिए सरहद पर खड़ी है। सेना को प्रश्निल निगाहों से देखना, या उस पर बेवजह आरोप लगाना उसकी निष्ठा, उसकी प्रतिबद्धता को ठेस पहुँचाना है। राजनीतिक उठापठक और बहसें सदा से होती रही हैं, अनेक मामलों को पक्ष-प्रतिपक्ष अपनी सहूलियत से उठाता रहा है परन्तु किसी भी राष्ट्र की सेना को लेकर लगातार दुष्प्रचार किया जाना, गलत खबरों का खंडन नहीं किया जाना , सेना में भी रोष पैदा करता है। युद्ध, दंगों औऱ अप्रिय हालातों का पैरोकार कोई नहीं होता, सरहद पर खड़ा सैनिक भी अमन चाहता है पर जब बात देश के आत्मसम्मान की आती है तो उन्हें फैसले लेने की अनुमति होनी चाहिए। सरकार, मीडिया तंत्र या किसी भी बाहरी संस्था का हस्तक्षेप उसकी कार्यप्रणाली में सीधा-सीधा दखल पैदा करता है। यह बात हम सैम मानेक शॉ के समय में भी देख सकते हैं जब वे सेना में बगैर किसी राजनीति के दख़ल में काम करना पसंद करते थे, उसके नतीजे भी हमारे सामने हैं। इसका ज़िक्र बहराम पंताखी अपनी किताब सैम मानेक शॉ- द  मैन एंड हिज टाइम्स में भी करते हैं। सोचने की बात यह है कि अब अगर ऐसी स्थितियाँ आ जाएँ तो सेना के निर्णयों का हम कितना सम्मान कर पाएँगें। यह भी सही है कि सेना की कार्रवाई और ऐसी घटनाओं का राजनीतिक लाभ कमाने की नीति भी लोकतंत्र के लिए हानिकारक ही है। माओत्से तुंग का यह कथन ठीक है कि- हज़ारों फूलों को खिलने दो, हज़ारों विचारों को टकराने दो’, पर अगर कुतर्क हो, प्रसारित विचार द्वेषपूर्ण हों तो उन पर गहन चिंतन और तदनुरूप रोकथाम भी उतनी ही ज़रूरी है।


सूचना के बाजार के अपने खतरे हैं। यह अफीम की तरह काम करता है,धीरे पर देरतलक और प्रभावी।  यह धीरे-धीरे आपकी मानसिकता को सौंखता है, खराब कर दैता है। भावनाओं का कब किस तरह व्यक्ति के विरोध में और व्यक्ति सापेक्ष प्रयोग करना है, यह बाज़ार बखूबी जानता है। क्या ऐसे वीडियों, ऐसी खबरें, तकनीक के संसार में एक हिंसक समाज को नहीं पैदा कर रही हैं? इनमें से ही वे लोग जन्मते हैं जो ट्रोल करते हैं, फब्तियाँ कसते हैं, असहमति का विरोध करते हैं। यह सभी स्थितियाँ खतरनाक हैं, अतः इनका विरोध होना चाहिए। हरिशंकर परसाई कहते हैं, सत्य को भी प्रचार चाहिए, अन्यथा वह, मिथ्या मान लिया जाता है। अतः सेना को लेकर भी जो भ्रांतियाँ जनमानस में हैं या जिनका दुष्प्रचार किया जा रहा है, उनका खंडन आवश्यक है। क्योंकि बात सेना के आत्मसम्मान से भी जुड़ी है , फिर यह भी कहा गया है कि किसी भी देश की सेना कितनी भी ताकतवर क्यों ना हो, अगर उस देश के लोग उसके साथ नहीं हैं तो वह कमजोर पड़ जाती है। वस्तुतः जनमानस ही सेना का सपोर्ट सिस्टम है। ऐसी खबरों को लेकर जो वाद-प्रतिवाद और नकारात्मक टीपें हैं उन्हें देख-सुनकर तो फिलवक्त परवीन शाकिर की पंक्तियों में  यही कहा जा सकता है कि- 

               “मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी, 
                  वो झूठ कहेगा औऱ लाजवाब कर देगा।

Monday, June 5, 2017

सतत आवश्यकता है स्त्री मुद्दों पर बात करने की..



तिरे माथे पर यह पैराहन खूबसूरत है, पर तू इससे परचम बना लेती तो बेहतर था, शायद मज़ाज की इस शायरी का ही असर है कि हरियाणा की लड़कियों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की है। स्त्री आज भी जूझ रही है कहीं तीन तलाक का मुद्दा है , कहीं मंदिर प्रवेश को लेकर उसके अधिकारों की मांग से धर्म के तथाकथाथित सिंहगढ़ों की चूलें हिल रही हैं तो कहीं आदिवासी अस्मिता के मामले औऱ निर्भया सरीखे वाकये उसकी देह पर घात लगाए बैठे हैं । दंगे हो,  धर्म हो या राजनीति की सियासत स्त्री की अस्मिता को तार-तार करने का कोई भी मौका तथाकथित पितृसत्तात्मक मानसिकता द्वारा छोड़ा नहीं जाता। मुद्दों पर नज़र डाले तो महिला आरक्षण विधेयक जाने कब से लंबित पड़ा है, स्त्री का गैर सांस्थानिक श्रम किसी भी आंकड़ें से बाहर की विषयवस्तु है, साथ ही संस्थागत लैंगिक विभेद से भी वह हर क्षण जूझती रहती है।
 धरा के भूगोल के हर चप्पे पर स्त्री के लिए स्थितियाँ कमोबेश एक जैसी ही है। इसीलिए कहा गया है कि स्त्री का ना कोई  देश है , ना जाति और धर्म। स्त्री अधिकारों को लेकर बहुत सी लड़ाईयाँ लड़ी गई  हैं और अभी भी लड़ी जानी बाकी है पर इस बीच जब लड़कपन की  दहलीज़ पर कदम रखती लड़कियाँ अपने हक औऱ हकूक की बात करती है तो तसल्ली होती है। बात हरियाणा की लाडलियों की है जो विषम  लिंगानुपात के लिए कुख्यात है। प्रधानमंत्री मोदी एक ओर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ आंदोलन की शुरूआत पानीपत से कर बेटियों की हौंसलाअफजाई करते हैं वहीं दूसरी ओर रेवाड़ी जैसी घटनाएँ यथास्थिति बयां करती है कि हालात अब भी क्या और कैसे हैं! हरियाणा की लड़कियों का एक ओर बता मेरा याद सुदामा रे वीडियो देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध होता है वही इसी अंचल की बालाओं का शिक्षा के लिए जुनुन सभी के लिए आदर्श बन जाता है। यह उनका जुझारूपन ही है कि वे शिक्षा के लिए अनशन पर बैठकर सरकार की ओर अपना ध्यान खींच रही है, उन्हें अपने नजरिए से मामलों को देखने की दीठ प्रदान कर रही हैं।
मामला जैसा दिख रहा है, उसके अनुसार हरियाणा के रेवाड़ी के गोठड़ा टप्पा डहीना गाँव की ये लड़कियाँ अपने विद्यालय को क्रमोन्नत करने की मांग की गुहार राज्य सरकार के समक्ष रख रही हैं। गौरतलब है कि रेवाड़ी के गोठड़ा टप्पा डहेना गांव की 83 छात्राएँ स्कूल छोड़कर 10 मई से धरने पर बैठी थीं। इनमें से 13 लड़कियाँ भूख हड़ताल पर थीं। इन छात्राओं की मांग थी कि उनके गाँव के सरकारी स्कूल को 10 वीं कक्षा से बढ़ाकर 12 वीं तक किया जाए। आंदोलन पूरे देश में सुर्खियाँ और सहानुभूति बटोर चुका था। यह उनके जुनून का ही नतीजा है कि छात्राओं और उनके अभिभावकों की   माँग स्वीकृत हो गई है और यूँ अनशन भी समाप्त, पर क्या ऐसे अनशन उचित है, या सरकारें  क्या अनशन और धरनों की ही भाषा समझती है,  यह बात बार-बार जेहन में आती है।
दरअसल सत्ता कई मुद्दों से एक साथ जूझ रही होती है। ऐसे में आम जन की अनेक समस्याओं की ओर उसका ध्यान नहीं जा पाता। जनसाधारण अपनी मांग को सरकार के सन्मुख रखने के लिए ऐसे कदम उठाता है जिससे उसकी बात उन कानों तक पहुँचे, जो अब तक उदासीन रहे हैं। स्त्री मुद्दों को लेकर अतिरिक्त संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए। केवल अभियान चलाने या कि सहायता कोष में राशि देने मात्र से स्त्री हितों की बात लागू नहीं हो जाती। इस आधी आबादी को जीने के मूलभत अधिकारों की दरकार है जिन पर सदियों से पितृसत्ता कुंडली मार कर बैठी है। स्त्री बैखोफ होकर जीना चाहती है, संभवतः यही चाहना ही इस आंदोलन के केन्द्र में भी रही है।
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार गाँव में 12वीं  तक  स्कूल नहीं होने के कारण अनेक लड़कियां आगे की पढ़ाई छोड़ देती हैं. आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें गाँव से 3 किमी. दूर दूसरे गाँव जाना पड़ता है। यातायात के संसाधनों के अभाव के कारण ये दूरी और अधिक लगने लगती है। छेड़छाड़ के प्रसंगों का सतत घटना एक भय भी पैदा करता है।  ऐसे में छात्राओं द्वारा ऐसी मांग उठाना काबिलेतारीफ और निहायत जरूरी है।
हालांकि माध्यमिक से उच्च माध्यमिक तक अपग्रेड करने के लिए छात्रों के नामांकन संबंधी कुछ नियम होते हैं जिनके अभाव में यह मांग पूरी नहीं की जा सकती। परन्तु सरकार द्वारा झुककर, छात्र हित में में स्कूल क्रमोन्नत किए जाने का यह फैसला वाकई सराहनीय है। गौरतलब है कि 2016 में रेवाड़ी जिले में ही स्कूल जाते समय एक छात्रा के साथ बलात्कार होने के बाद, दो गाँवों की सभी लड़कियों ने स्कूल छोड़ दिया था। पूर्व में भी सरकारों और प्रशासन द्वारा स्कूल क्रमोन्नत की मांग की गई पर मामला ढाक के तीन पात ही रहा। यही कारण है कि इस बार बच्चियाँ आर-पार के मूड में थीं।
एक ओर  जहाँ सरकारी विद्यालयों में गिरते नामांकन चिंता का विषय है वहीं दूसरी ओर शिक्षा के अधिकार के लिए ऐसे कदमों का आगे आना उत्साह पैदा करता है। उत्साहवर्धक है कि राज्य में बीते वर्ष से लिंगानुपात की दर  834 से 906 में इजाफा हुआ है। हरियाणा  में महिला साक्षरता दर भी 75.4% दर्ज की गई है। लड़कियों के द्वारा अपनी बात को दमदार और गाँधीवादी तरीके से सामने रखना ये जताता है कि समानीकरण की दिशा में भी वहाँ कुछ प्रयास हो रहे हैं। समान सुविधा और अवसर उसकी वास्तविक मेधा को परिष्कृत करने में अहम् भूमिक निभा सकते हैं।
यह सही है कि समाज, संसद, आर्थिक परिवेश में नारी की सक्रिय उपस्थिति से ही आर्थिक विषमता, साम्प्रदायिक असहिष्णुता औऱ प्राकृतिक शोषण से गहरे रंगे चित्रों को कुछ हल्का किया जा सकता है। बात ऋचाओं की करें तो वहाँ भी उल्लेख्य है – श्री वाक्च नरीणां, स्मृतिमेधा, धृति, क्षमा अर्थात्  श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा  स्त्री की प्रकृति प्रदत्त शक्तियाँ , क्षमताएँ हैं। शिक्षा भी उसके उन्हीं अधिकारों और क्षमताओँ में शुमार है, जिससे वंचित करना, दरअसल उसे उसके मानवीय अधिकारों से वंचित करना है। निःसंदेह छात्राओँ की यह पहल स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में एक जरूरी हस्तक्षेप है।


Friday, June 2, 2017

असफलता के तौल में ढुलकती ईवीएम की विश्वसनीयता


राजनीति भी अजीब शै है,कब किस तरह किस मुद्दे को राई का पहाड़ बना दिया जाए और पहाड़ को राई यह बात राजनीति के जानकार और खिलाड़ी बखूबी जानते हैं। दोषा –प्रत्यारोप तक तो ठीक है परन्तु जब संवैधानिक व्यवस्था को ही चुनौती दी जाती है तो बात चिंता पैदा कर देती है। हाल ही में सम्पन्न पाँच विधानसभा चुनावों में अनेक पार्टियों द्वारा ईलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन को लेकर खुलकर बयानबाजी और बहस हुई थी। जो दल हार का मुँह देक रहा था उसी को चुनाव आयोग से शिकायत हो रही थी। इसी के मद्देनजर आयोग ने 12 मई को ईवीएम से संबंधी गड़बड़ी की शिकायतों को लेकर आयोजित सर्वदलीय बैठक के बाद मान्यता प्राप्त और सभी राजनीतक दलों को खुली चुनौती में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया ।  3 जून को आयोजित होने वाली इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए 26 मई तक राजनीतिक दलों को आवेदन करना था लेकिन निर्धारित समय सीमा तक केवल दो दलों ने आवेदन किया । अनेक दलों द्वारा तरह-तरह के आरोप लगाए जाने के बावजूद सिर्फ दो दलों एन.सी.पी. औऱ माकपा ने आवेदन किया और वे ही चुनौती के लिए आगे भी आए। पर उनका यह आना चुनौती के लिए ना होकर प्रक्रियागत जानकारी लेना ही अधिक साबित हुआ। मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी के अनुसार दोनों दलों के प्रतिनिधियों ने ईवीएम हैक करने के बज़ाय मशीन के तकनीकी पहलुओं की भ्रांतियों को दूर करने का आग्रह किया । उनकी माँग के मुताबिक चुनाव आयोग ने उनकी माँग को स्वीकारते हुए मशीन संबंधी तकनीकी पहलूओं पर सविस्तार जानकारी दी।
पहले ईवीएम पर आरोप लगाने और फिर उससे पल्ला झाड़ लेने का मामला बचकाना लगता है फिर भी चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों के सक्रिय सहयोग का स्वागत करते हुए कहा कि इससे देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में मजबूती प्राप्त होगी। इससे पूर्व आप पार्टी ने भी ईवीएम मशीन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाए थे परन्तु उसने भी आयोग की जाँच प्रणाली से खुद को अलग कर अलग जाँच करने का निर्णय लिया। पंजाब चुनावों में इस मुद्दें में आप की विरोधाभासी बयानबाजी समझ से परे रही है।
ईवीएम का प्रयोग पहली बार 1982 में केरल विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ। तब तक भारत में आरपी एक्ट,1951 के तहत मतपत्र और मतपेटी का ही प्रयोग होता आ रहा था,चुनाव आयोग ने तब भारत सरकार से कानून में संशोधन का आग्रह किया।  चुनाव आयोग ने अपनी आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए ईवीएम को चुनावी क्षेत्रों में उतारा। मुद्दा हाइकोर्ट में भी गया और पिल्लै की जीत के बाद शांत भी हुआ। परन्तु ईवीएम पर यह बहस आज भी जारी है। इस के बाद 1989-90 में विनिर्मित ईवीएम का प्रयोगात्मक आधार पर पहली बार नवम्बर 1998 में आयोजित 16 विधानसभाओं के साधारण निर्वाचनों में इस्तेमाल किया गया। ये निर्वाचन क्षेत्र राजस्थान, मध्यप्रदेश औऱ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, नई दिल्ली से संबंधित थे। साथ ही यह जानना भी ज़रूरी है कि  जिस ईवीएम के लिए इतना बवाल मच रखा है उसके बनाने में कई बैठको,प्रोटोटाइपों का परीक्षण औऱ व्यापक फील्ड ट्रायल भी किया गया है। ईवीएम दो लोकउपक्रमों की सहायता से भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड,बेंगलुरू एवं इलेक्ट्रोनिक कॉर्पोरेशन ऑफ,इण्डिया,हैदराबाद के सहयोग से निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की जाती है। इसकी तैयारी,निर्माण एवं प्रयोग में गहन परीक्षणों से गुजरने के बाद ही इसे प्रयोग के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में उतारा गया है। ज़ाहिर है इसमें निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता को शामिल करके ही लोकतंत्र के विश्वास के निवेश के तहत लोकहित में तथा पर्यावरण हित में तकनीक का दामन साधा गया होगा। फिर  भी अगर संशय रहता है तो वह चुनावों के बाद ही क्यों सामने आता है, समझ से परे है।
ऐसा नहीं है कि यह विरोध पहली मर्तबा ही दर्ज़ किया गया है । विरोधी पार्टियों द्वारा पूर्व में भी यह विरोध दर्ज़ करवाया गया है।  भारतीय जनता पार्टी जो इन दिनों ईवीएम के इस्तेमाल का समर्थन कर रही है,  वह भी पूर्व में इसका विरोध करने वाली राजनीतिक पार्टी रही है। वर्ष 2009 में जब भारतीय जनता पार्टी को चुनावी हार का सामना करना पड़ा, तब पार्टी के शीर्ष से वंचित रहे और वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सबसे पहले ईवीएम की कार्यप्रणाली और उसकी संदिग्धता पर सवाल उठाए थे। इसके बाद पार्टी ने भारतीय और विदेशी विशेषज्ञों, कई गैर सरकारी संगठनों और अपने विचारकों और विशेषज्ञों की मदद से ईवीएम मशीन के साथ होने वाली छेड़छाड़ और धोखाधड़ी को लेकर पूरे देश में अभियान भी चलाया।
इस अभियान के तहत ही 2010 में भारतीय जनता पार्टी के  प्रवक्ता और चुनावी मामलों के विशेषज्ञ जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी- 'डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट ऑन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?' इस किताब की प्रस्तावना लाल कृष्ण आडवाणी ने लिखी और इसमें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्राबाबू नायडू का संदेश भी प्रकाशित है हालांकि इस पुस्तक में वोटिंग सिस्टम के एक्सपर्ट स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेविड डिल ने भी बताया है कि ईवीएम का इस्तेमाल पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है।

भाजपा के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब की शुरुआत में लिखा है- "मशीनों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है, भारत में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन इसका अपवाद नहीं है. ऐसे कई उदाहरण हैं जब एक उम्मीदवार को दिया वोट दूसरे उम्मीदवार को मिल गया है या फिर उम्मीदवारों को वो मत भी मिले हैं जो कभी डाले ही नहीं गए।" यह उद्धरण किसी भी मशीन के लिए सही है क्योंकि मशीन मानव निर्मित उपकरण ही तो है और ऐसा असंभव है कि उससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।पर बात भारतीय निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने को लेकर भी जुड़ी है। निर्वाचन आयोग चुनाव को लेकर अनेक सावधानियाँ बरतता है, कड़ी निगरानी में मतदान प्रक्रिया को अंजाम देता है। सीलपैक ईवीएम उपकरण मतदान स्थलों तक पहुँचाने से लेकर मतगणना तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया भी विशेष निगरानी में होती है जिसमें अब वीवीपैट भी शामिल है। भारत में यह पहली बार नहीं है जब इस तरह का हल्ला मचा है, भारत सहित अन्य देशों में भी इस तरह का विरोध होता रहा है परन्तु अनेक विवादों के साथ ही विश्व के अनेक देशों में जहाँ इसका चलन है वहाँ पेपल बैकअप के प्रावधान के साथ स्वीकार्य भी है,जिसे हमारे यहाँ भी अपनाया गया है। बात इतनी सी है कि यह हंगामा हार के बाद ही क्यों बरपता है क्या ऐसा करना  देश की संवैधानिक व्यवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने का अलोकतांत्रिक रवैया नहीं है? इस रवैये से तो यही तय होता है कि- आईना देख अपना सा मुँह लेके रह गए....

Wednesday, May 31, 2017

सिसक रही हैं अनुभवों की कई पोटलियाँ....

वृद्ध हमारी जिम्मेदारी नहीं वरन् आवश्यकता हैं






विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रता हुआ मानव शरीर उत्तरोत्तर विकास करता  है। सूर्य की ही भाँति जीवन का अरूणोदय होता है और उसी की भाँति मध्यम हो अस्ताचल भी। संभवतः इसी कारण कार्ल युंग ने वृद्धावस्था की तुलना डूबते हुए सूर्य से की है;निस्तेज, एकाकी और डूब की ओर बढ़ता हुआ जीवन। यह बिम्ब और सोच ही मन में एक उथल-पुथल मचा देती है तो फिर इस अवस्था को तमाम वैपरीत्य के बीच जीना कितना दुभर होता होगा, कल्पना से परे है। वेद भी इस अवस्था विशेष में परिवार तथा संतति की भूमिका और जवाबदेही तय करते हैं। परन्तु हाल-ए-जमाना कुछ और ही बयां करता है। खबर है कि सिने-जगत की क्लासिक फिल्म का दर्ज़ा प्राप्त पाकीज़ा की अभिनेत्री गीता कपूर को उनके बेटे ने अस्पताल में भर्ती कराकर वहीं लावारिस हालत में छोड़ दिया है। अस्पताल प्रशासन ने फीस के पैसे लेने गए उनके पुत्र और उनकी पुत्री से संपर्क साधने की  अनेक कोशिश भी की, पर नतीजा निराशाजनक ही रहा। गीता बताती हैं कि उनका पुत्र उनके साथ आए दिन मार-पीट करता है। उन्हें एक कमरे में बाँध कर रखा जाता है औऱ चार दिन में एक बार खाना दिया जाता है। गीता के वृद्धाश्रम जाने से मना कर देने पर हालात और विकट हो गए तथा  साथ ही उनकी नाजुक हालत के चलते ही उन्हें अस्पताल में लाया गया है। अस्पताल प्रशासन की भूमिका इस मामले में सराहनीय है कि वे गीता को इलाज और तमाम सुविधाएँ, उनकी नाजुक हालत के चलते मुहैया करा रहे हैं,  साथ ही एक शिकायत भी वे दर्ज़ करवा चुके हैं। राजस्थान के खींवसर गाँव से भी माँ की सेवा को लेकर पति-पत्नी में विवाद की ख़बर है। ये तमाम खबरें समाज का आईना हैं, हालांकि ऐसे कुछ ही वाकये सामने आ पाते हैं पर स्थितियाँ वाकई चिंताजनक हैं।
भारतीय संस्कृति में वृद्धों को सदैव धरोहर के रूप में देखा गया है। लोकरक्षक राम हो या आदर्श पुत्र के प्रतीक श्रवण कुमार सदैव मातृ-पितृ धर्म का निर्वहन करते हुए ही चित्रित किए गए हैं। बात आदर्शों तक ही सिमटी रहे तब तक तो ठीक परन्तु यथार्थ कुछ और ही बयां करता है। अनेक ऐसे मामले हैं जहाँ उन वृद्धों को जो धरोहर और अनुभव की खेप के रूप में हमारे बीच हैं, अनदेखी का सामना करना पड़ता है। कहा गया है कि वृद्धावस्था और बचपन एक जैसी अवस्था होती है ;जिद्दी,असहाय और अन्य पर निर्भर। यह मानने पर भी दोनों अवस्थाएँ समान ध्यानाकर्षण नहीं खींच पाती। बच्चों की शैतानियाँ, जिद जहाँ मन पर  फुहार सी बरसती है वहीं बड़ों की कमजोरियाँ कलहकारी हो जाती हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों है, इसे ठीक से समझना होगा।
गौरतलब है कि वृद्धों की समस्या पर सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र महासभा में अर्जेन्टीना ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया था। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय को समाप्त करने तथा जागरूकता फैलाने के लिए 14 दिसम्बर 1990 को एक निर्णय के फलस्वरूप 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस घोषित किया। निःसंदेह दिन विशेष के  इस आग्रह में  वर्ग विशेष के लिए सम्मान की चिंता ही समाहित थी। आज हम औसत आयु पर नज़र डालें तो चिकित्सा और अन्य सुविधाओं के चलते, आंकड़ों के अनुसार औसत जीवन प्रत्याशा दर बढ़कर 70 वर्ष हो गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में औसत जीवन प्रत्याशा दर, वैश्विक जीवन प्रत्याशा दर 67.88 वर्ष की तुलना में 65.48 वर्ष थी। वांशिगटन यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट भी भारत में लोगों के औसत उम्र संबंधी बढ़े हुए मामलों को सहमति देती है।   जनसंख्या के आंकड़ों पर नज़र डाले तो 60 से अधिक आयु के लोगों की संख्या में वृद्धि भारत में 1961 से प्रारम्भ हुई। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के चलते यह संख्या निरन्तर बढ़ रही है। 1991 में 60 वर्ष से अधिक आयु के 5 करोड़ 60 लाख व्यक्ति थे, जो 2007 तक बढ़कर  8 करोड़ 40 लाख हो गए। यह वृद्धि जहाँ शुभ संकेत है वहीं वृद्धों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, उनके साथ होने वाले अपराध और उपेक्षा के मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक जीवन शैली और खानपान की मजबूरियों के चलते बहुत कम उम्र से ही लोगों को अनेक बीमारियाँ होने लगी है ऐसे में इस वर्ग की निर्भरता युवा वर्ग पर बढ़ जाती है।
वृद्ध व्यक्ति शारिरीक रूप से तो अक्षम होते ही हैं साथ ही उनमें अनेक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी होते हैं। आज की संस्कृति में बहुत कम बातें ऐसी हैं जो वृद्ध व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाती हैं। अपने प्रिय या अन्य किसी संबंधी का बिछोह भी उन्हें संवेगात्मक स्तर पर तोड़ कर रख देता है। वृद्ध व्यक्तियों के संवेगों का भाव पक्ष प्रबल होने की होने की अपेक्षा दुर्बल होता है। उनके व्यवहार का स्वरूप सामान्य स्फूर्ति और जोश में उमड़ पड़ने की अपेक्षा  रेगिस्तान में बहने वाली जलधारा के समान संकीर्ण होकर क्षीण हो जाता है। अनेक कुसमायोजनों से बचने के लिए वृद्धावस्था को सुगम और सुखी बनाने के प्रयास समाज और परिवार ही  कर सकता है।
आज के अधिकांश युवा एकाकी एवं आत्मकेन्द्रित जीवन जीने के अभ्यस्त हैं। उन्हें अपने इर्द-गिर्द किसी प्रौढ़ की उपस्थिति खटकती है। बिन माँगें दिशा-निर्देश और बात-बात में टोका-टाकी होने पर वह उनसे खास दूरी बना लेता है। आज अनेक परिवार आणविक परिवार हैं जिसमे अमूमन एक या दो बच्चे होते हैं। शिक्षा, व्यवसाय एव विवाह के पश्चात् उऩका आशियाना किसी ओर शहर या देश में हो जाता है औऱ पीछे छूट जाते हैं , वृद्ध माता- पिता। अनेक प्रसंगों में घर के अपने और पुत्र-पुत्री ही उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते नज़र आते हैं।  घटनाएँ साक्षी हैं जहाँ बुजुर्ग को या तो चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है ,या उसके साथ हिंसक व्यवहार किया जाता है। सामाजिक प्रतिष्ठा तथा अपने अवस्थागत अधिकारों के प्रति अधिक सजग नहीं होने के कारण ऐसे वृद्ध नियति को ही अपना भाग्य मान कर ये अत्याचार सहते जाते हैं या फिर इच्छा, अनिच्छा से किसी वृद्धाश्रम की शरण ले लेते हैं।

चिंता का विषय है कि आज यह अनुभवी वर्ग सर्वाधिक कुंठाग्रस्त है। वह इस बात से आहत है कि जीवन का व्यापक अनुभव होते हुए तथा जीवन पर्यन्त अपनों के लिए सुख- सुविधा जुटाते हुए खुद को होम करने पर भी उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। स्वयं को अनुत्पादक और निष्प्रयोज्य समझे जाने पर यह वर्ग दुःखी होता है और सतत एकाकी जीवन जीने तथा जीवन के मौन छोर की ओर बढ़ने को बाध्य हो जाता है। हालांकि हमारे संविधान में वृद्ध जनों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई है साथ ही उन्हें कई कानूनी अधिकार भी प्रदान किए गए हैं।परन्तु इन अधिकारों के साथ-साथ उन्हें भावनात्मक , मनोवैज्ञानिक एवं आर्थिक संरक्षण भी प्रदान करना होगा जिससे वे मानसिक एवं शारीरिक शोषण से बच सकें। बच्चों में छुटपन से ही वृद्धों के प्रति आदर और देखभाल के बीज रोपने होंगे । परिवार महत्वपूर्ण निर्णयों में वृद्ध जनों को शामिल कर उन्हें उनकी महत्ता का विश्वास सहज ही दिला सकता है। बातें यूँ , ये सभी बहुत छोटी-छोटी हैं परन्तु सहयोग के लिए युवाओं को ही आगे आना होगा क्योंकि अनुभव के इन आशीष देते हाथों की हर परिवार को सतत आवश्यकता  है। वृद्धों के प्रति सही दृष्टिकोण तथा सकारात्मक सोच अनुभव के इन ख़जानों को अधिक समय तक सजग बनाए रखने में कारगर हो सकती है। बहरहाल, सामूहिक प्रयास ही हमारी सांस्कृतिक जड़ों के क्षरण को रोकने में कारगर होंगे यही सोच लेकर समाज, परिवार और राज्य को एकसाथ आगे आना होगा।


Sunday, April 30, 2017

अतिमानवीय कथानक और दिप-दिप पौरुष की बयानगी - बाहुबली - 2



फैंटेसी आकर्षित करती है क्योंकि वहाँ तर्को की उलझनें मौन हो जाया करती है। बाहुबली-2 इसी बात को रेखांकित करती हुई अपने नैसर्गिक रंगों से आपको उस कल्पना लोक में ले जाती है जहाँ राजसी परियाँ हैं,  एक राजकुमार है और कथानक को आगे बढ़ाते परम्परागत सियासी घटनाक्रम। पर फिल्म देखते वक्त मेरे लिए , कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा उस सवाल से अधिक अहमियत कुछ और रख रहा था और वह था , अपनी आँखों से प्रभास को पहली मर्तबा बड़े पर्दे पर देखना। मेरे जेहन में यह एक नायक का जाना और दूसरे का आना था। मैं जाने क्यों ऐतिहासिक किरदारों में,  राजसी वस्त्रों में विनोद खन्ना और प्रभास के डील डौल की तुलना कर रही थी।

दक्षिण नाटकीय प्रस्तुतियों की प्रभाविकता में बेजोड़ है, यह बात एक बार फिर बाहुबली से सिद्ध होती है परन्तु फिल्म का हर दृश्य प्रभास के नायकत्व के विस्तृत फलक से जुड़ा होकर भारतीय धीरोदात्त नायक की एक नयी परीभाषा भी गढ़ता है । फैंटेसी हो, प्रभास सा महानायकत्व हो तो आप  बौद्धिकता को छोड़ उसके साथ बहने पर मजबूर अपने आप हो जाएँगे।
प्रभास के बाद कटप्पा का अभिनय, स्वाभिमानिनी नायिकाओं को टक्कर देता है। कटप्पा, माने न्यायशास्त्र की कुटिलताओं के भेंट चढ़ता एक निर्दोष मानव। अपने प्राण प्रण की रक्षा में यह मुझे अनेक स्थानों पर उसने कहा था कि याद अनायास ही दिला जाती है। शिवा द्वारा शीतल रात में चकोर पक्षियों के दृश्य को प्रेमिल दृष्टि से देखने से इतर उन्हें आँच पर पका कर खाने की इच्छा, कटप्पा की परिवेश और कार्यजन्य विविधता  से उपजी मनसा दृष्टि को दर्शाती है। देवसेना और बाहुबली तथा अवन्तिका और शिवा के प्रेम प्रसंग औदात्य भावों को मानवीय पृष्ठभूमि पर खड़ा करते हैं । फिल्म स्त्री पुरुष को एक धरातल पर तो खड़ा करती ही है पर साथ-साथ अतिमानवीय प्रसंगों में भी मानवीय करूणा भर देती है।
फैंटेसी है तो फिल्म को इतिहास की कसौटियों पर तौलना बेमानी होगा पर कुछ बातें फिर भी है जो चेतना के द्वार खटकटाती है। फिल्म में दो मर्तबा पिंडारियों का जिक्र हुआ है, एक तरफ उनकी जीवित चेहरों को जल समाधि में तब्दील कर देने की निर्ममता है तो दूसरी ओर भयंकर आक्रमण!  दरअसल चौंक इसी आक्रमण में निहित है। पिंडारी दल, वो भी इतनी बड़ी संख्या में चौंकाता है। इतिहास में इन दलों का इतनी अधिक संख्या में होने का उल्लेख कम ही है।

प्रभास का दिप-दिप पौरुष तमाम ऊब और कौतुकों को झेलने का धीरज देता है तो हर किरदार का डूब कर किया गया अभिनय फिल्म के दृश्यों को सजीवता प्रदान करता है। प्रेम के पगे हुए  और मातृत्व के दृश्य भावनाओं को खाद देते हैं तो खलनायकों का अभिनय जुगुप्सा भाव  पैदा कर उनके अभिनय को पूरे अंक दे देता है।शिवगामी और देवसेना के किरदारों को राम्या और अनुष्का  अपने  दमदार अभिनय के द्रष्टान्त से प्रस्तुत करती हैं ।

कल्पना लोक में खड़ा माहिष्मति साम्राज्य स्त्री संदर्भों के दमदार निर्णयों, एक माँ के अविचल इंतज़ार और मरकर भी प्रण निभाने की लकीर प्रस्तरों पर खींचता है तो वहीं धर्म के लिए किसी के भी विरुद्ध जाने की बात कह जीवनसाथी के साथ भी खड़ा होता है। घटनाएँ बतलाती हैं कि समय हर कायर को शूरवीर होने का अवसर प्रदान करता है। राजा और प्रजा के सहसंबधों पर आधारित यह कहानी राजनीतिक हलकों को भी चुपचाप समाजवाद का संदेश दे जाती है।
निर्देशक राजमौली ने पटकथा को इतने रोमांचक तरीके से पर्दे पर दर्शाया है कि दर्शक एकबारगी कहानी को भूल जाता है। मध्यांतर तक तीसरे भाग के आने के कयास भी मन में उग आते हैं। नि:संदेह प्रभास के मार्फत बाहुबली का जुनून हर दृश्य में दर्शक के सर चढ़ कर बोलता है। सिनेमेटोग्राफी और तकनीक इस फिल्म को एक नया आयाम देती है वहीं नीले पर्दे पर फैंटेसी के दर्शाये जाने के जोखिम को भी एक सकारात्मक और नयी दिशा प्रदान करती है।
इस फिल्म की सफलता दक्षिण के ही निर्देशन में आने वाली महाभारत की  सफलता भी सुनिश्चित करती है। बौद्धिकता से परे अगर बालमन के उत्साह के साथ आप इस रोमांस और कौतुक को देखने जायें तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है।
-विमलेश शर्मा