Saturday, March 30, 2019

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल !


किसी भी प्रदेश की भाषा उसकी सांस्कृतिक धरोहर की पहचान होती है। उस भाषा में अनेक संस्कारअपनापन और भाव रचे-बसे होते है। इन सभी उदात्त गुणों के कारण ही  मातृभाषामायड़ भाषा दिल के करीब होती है । म्हारो मरुधर देस अर्थात् राजस्थान शताब्दियों से अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। अरावली पर्वतमाला और विषम स्थलाकृति ने इस प्रदेश की 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति को एक धरोहर की भाँति संभाल कर रखा है । यहाँ के लोग ,लोक भाषा ,संस्कृतिलोक नृत्यलोक चित्रकला सभी में ;सजीवता ,माधुर्य एवं अपनेपन के दर्शन होते हैं।

 राजस्थानी भाषा जिसके लिए कहा गया है कि यह हर चार कोस पर बदल जाती है ;परन्तु इस वैविध्य में भी एक अनूठे ऐक्य के दर्शन इस भाषा में होते हैं। यह धरती वीर और भक्ति रस से सराबोर है। यहाँ एक ओर मीरा,रसखान ,दादू जैसे भक्त हुए हैं ;वही समकालीन साहित्य में कन्हैयालाल जी सेठिया ,केसरी सिंह जी बारहठ ,सूर्यमल्ल जी मीसण ,विजयदान जी देथाश्री नन्द भारद्वाज तथा श्री चन्द्र प्रकाश देवल जैसे अतिविशिष्ट साहित्यकार हुए हैं ;जिन्होंने अपनी रचनाओं से राजस्थानी भाषा को समृद्ध किया है और अनवरत सर्जनरत भी हैं।

यह धरती वीरोचित् भावनाओं से समृद्ध धरती है ,यह धरती है ढोला मारू के माधुर्य पूर्ण प्रेम की धरती इसीलिए यहाँ का जनमात्र कण कण सूं गूँजे जय जय राजस्थान और प्रेम के साझा स्वर उच्चारित करता है लहरिया की ही भाँति राजस्थानी भाषा विविध गुणों एवं रंगों को अपने विस्तृत कलेवर में समेटे हुए है ;जिसमें कही मेवाड़ी की धूम है तो कहीं ढूँढाड़ी की यहाँ की भाषा का आकर्षण ही है कि केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस’ लोकगीत आज राष्ट्रीय ही नहीं वरन् राष्ट्रीय  फलक पर भी छाया हुआ है जिसे सुनकर रोम रोम पुलकित हो उठता है। 

यहाँ की भाषा में वो शक्ति है जो मृत्यु को भी एक उत्सव की तरह मानने को बाध्य करती है । यहाँ माताएँ बचपन से ही अपनी संतानों को "ईला न देणी आपणी हालरिया हुलरायै " जैसे गीत लोरी की तरह सुनाती हे ,तथा राष्ट्र को श्रेस्ठ पुत्र (संतान) रत्न प्रदान करती हैनिः संदेह यह यहाँ की भाषा की महत्ता  का ही प्रमाण है कि इसका माधुर्य समूचे प्रदेश को एकता के सूत्र में बाँधने का सामर्थ्य रखता है। भारतीय संस्कृति की अनेक सात्विक विशेषताओं को राजस्थानी भाषा अपनी कुक्षि में संजोये हुए है । परन्तु आज यही भाषा अपनी वास्तविक पहचान को प्राप्त करने के लिए तरस रही है। किसी अंचल की विशेषता उसकी भाषा ही होती है इस संदर्भ में कवि कन्हैयालाल सेठिया की ये पंक्तियां आज सही मालूम होती है- खाली धड़ री कद हुवैचेहरे बिन पिछाणराजस्थानी रै बिनां,क्यां रो राजस्थान। सच ही राजस्थानी के बिना राजस्थान की क्या पहचान है । इस संदर्भ में गौर किया जाए तो संवैधानिक मान्यता इस भाषा के विस्तार को ही नया फलक प्रदान नहीं करेगी वरन् पर्यटन को भी खासा प्रभावित करेगी। 

पर्यटन से इतर एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के रूप में इस भाषा का प्रयोग अगर किया जाए तो मनोवेज्ञानिक रूप से यह जरूर ही प्रभावी कदम होगा क्योंकि वही भाषा बच्चा जल्दी सीखता है जो दिल के क़रीब होती है। इसी क्रम में राजस्थानी को संवेधानिक मान्यता दिलाने के प्रयास वर्षों से निरन्तर जारी है जिसे अब विजय प्राप्त होनी चाहिए । राजस्थानी लोगों एवं भाषा ने अपने व्यापारिक कौशल व माधुर्य के बल पर भारत ही नहींबल्कि दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है। गौरतलब है कि एक तरफ जहाँ राजस्थानी भाषा संविधान की आँठवीं अनुसूची में स्थान पाने के लिए संघर्षरत है वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने 2011 में ही व्हाइट हाऊस के प्रेसिडेंसियल अपॉइंटमेंटस की प्रक्रिया में पहली बार इस भाषा को अंतराष्ट्रीय भाषाओँ की सूची में भी शामिल किया था। निःसंदेह इस सार्थक पहल से इस भाषा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। अगर मायड़ भाषा को मान्यता प्राप्त होती है तो इस भाषा के साहित्य को न केवल संरक्षण के अनेक प्रयास होंगे वरन् इस भाषा का श्रेष्ठ साहित्य भी जन जन के लिए सुलभ होगा।

 आज जब युवा पीढ़ी अपनी ज़ड़ों से दूर हो रही है तब यह भाषा संस्कारों के सहेजन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। राजस्थानियों के लिए मायड़ भाषाभावनाओं को समझने का सबसे सशक्त माध्यम है। मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई के साथ ही राजस्थानीहिन्दी और अंग्रेजी की त्रिस्तरीय शिक्षण व्यवस्था को भी लागू करने की ज़रूरत है जिससे यह ऐतिहासिक धरोहर हमारे भविष्य निर्माताओं के भी सामने आए। रोजगार के नवीन अवसरसांस्कृतिक एकताअक्षुण्णता और मनोवैज्ञानिक सबलता प्रदान करने एवं भाषाई शोध में गुणवत्ता प्रदान करने के लिए इस भाषा को मान्यता प्राप्त होना अत्यन्त आवश्यक  है जिससे ही सही मायने में इस भाषा के विकास मे आ रही समस्त बाधाएँ दूर होंगी। 

कहा भी गया है निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ,बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै ना हिय को शूल।

Friday, March 8, 2019

औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ
इक सच के तहफुज्ज के लिए लड़ी हूँ।

फ़रहत ज़ाहिद जब यह ग़ज़ल लिखते हैं तो मानो स्त्री-संघर्ष के हज़ार वर्षों के संघर्ष को आवाज़ दे देते हैं। स्त्री को शक्त करने में जो अनेक कारण हमने देखें हैं उनमें वर्चस्व की राजनीति;जिसमें सम्पत्ति और सत्ता जैसे पक्ष प्रमुख रहे हैं, ही सामने आए हैं। हम देखते हैं कि सत्ता का यह संघर्ष इतना प्रचंड रहा है कि इनके चलते स्त्री को डायन तक करार दे दिया गया है;परन्तु इन बंदिशों के इतर एक तसवीर और भी है जिसे देखें तो स्त्रीवाद की लड़ाई,अपने हक़ूक के लिए किए गए संघर्ष में विजय पाती नज़र आती है और वह है सामाजिक स्तर पर आर्थिक बराबरी । स्त्री आज न्यायिक, शिक्षा, प्रशासनिक, सैन्य और राजनीति सभी क्षेत्रों को अपनी कर्मस्थली बना रही है , हालांकि शक्ति के उच्च स्तरों यथा विश्वविद्यालय के कुलपति स्तर और राजनीति के सत्तासीन पदों पर अब भी महिलाओं की उपस्थिति कम ही है ;परन्तु यह परिदृश्य भी ज़ल्द बदलेगा ऐसी आशान्विति है।   

स्त्री और समाज को उसकी समता की लड़ाई में जिस पक्ष पर बात करनी है वह है उस पर लैंगिक-प्रशिक्षण की थोपी गई सीख और संघर्ष, जिसमें उसके उठने-बैठने-पहनने-खाने सरीखे तमाम क्रियाकलाप पुरुषसत्ता की हदबंदियों में हैं। इन हदबंदियों को तोड़ने में शिक्षा और सकारात्मक सोच एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकती है। बहुत कुछ हो रहा है और बहुत कुछ होना बाकि है। बहुतेरे संविधान संशोधन हुए हैं, क़ानून और नियम बनाए गए हैं, अध्यादेश लाए गए हैं, पर सामाजिक-सोच और नज़रिया क्या हम वाकई बदल पाए हैं, यह सोचना होगा। सोचना होगा कि क्या स्त्री के प्रति सम्मान भाव समाज में पैदा हो पाया है। दुखद है पर कहना होगा कि अभी भी कुत्सित और संकीर्ण विचारधाराएँ उसे उसके मानवीय अधिकारों से वंचित कर रही है। इस सोच को बदलने के लिए समझदार और मानवीय सोच से लबरेज़ वैचारिक और समरसतावादीबौद्धिकी की आवश्यकता है । बात वैश्विक परिप्रेक्ष्य में की जाए या कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री की स्थिति कमोबेश एक-सी ही है। अतः स्त्री को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए, समता और समानता के लिए प्रयास तो सतत करने होंगे साथ ही स्वयं स्त्री को भी यह जानना होगा कि स्त्रीवाद की लड़ाई में वह कहीं छद्म स्त्रीवाद को तो नहीं अपना रही है;कहीं वह अपने बरअक्स स्वयं ही एक और विपक्ष तो नहीं गढ़ रही है।
स्त्री के नैसर्गिक गुण उसकी कमतरी नहीं वरन् सामर्थ्य है ।वह त्यागमयी, दयामयी, क्षेममयी है तो वह धीरा भी है। य अतिरिक्त गुण जो कि रिक्तता क़तई नहीं है नवपीढ़ी को याद दिलाते रहने होंगे अन्यथा नए जमाने की स्त्री  स्वातंत्र्य का परचम उठाए एक ऐसे उच्छृंखल वर्ग का संकुल बन जाएगी जो पितृसत्ता के क्रूर पक्ष का तो अक्स होगी ही साथ ही देह की जकड़न में बँधी गैर-ज़िम्मेदार नस्ल का भी प्रतिनिधित्व करेगी।

Saturday, January 26, 2019

हे मातृभूमि तू प्राणों से भी बढ़कर है...मणिकर्णिका

मातृभूमि के दीवाने इस अनूठी भारत -भूमि पर कम नहीं वरन् बहुतेरे हैं  ; जो इसी धरा पर जब-तब मणि की तरह दैदीप्यमान होते रहे  और अपने रक्त का क़तरा-क़तरा मातृभूमि को सौंप इसी में रम गए। इन्हीं मणियों में एक मणि दीपती है मणिकर्णिका की तरह। मणिकर्णिका उर्फ़ मनु ; जिसे हम झाँसी की रानी की तरह जानते हैं । वह किरदार जो 1857 की क्रांति, जातीय अभिमान , स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रेम में आकंठ सराबोर है। बिठुर के पेशवा के यहाँ पली - बढ़ी मणि अपने आत्मबल में अनूठी है।

मणि इस फ़िल्म में यह संदेश देती है कि स्त्री को सशक्त करने की ज़रूरत नहीं वह स्वयं  शक्ति से प्रदीप्त है; और इसी का वैषम्य जब देखती है तो कई ज़गह सामंती और वर्चस्ववादी ताक़तों से  लड़ती भी नजर आती है।  देवर सदाशिव राव का एक कथन कि मैं औरत के समक्ष सिर नहीं झुकाता , राजमाता का मनु को रसोई और ललित कलाओं में ध्यान देने जैसी चंद-सी दिखने वाली बातों के पीछे संकुचित और एकांगी मानसिकता की गहरी खाइयाँ हैं ; जो समय के गुज़रने के बाद भी यथावत् है को मणिकार्णिका में गाहे-बगाहे अनेक प्रसंगों से उकेरा गया है ।

बिठूर के पेशवा की परेशानियाँ , नाना साहेब के उत्तराधिकार के प्रश्न , पेशवा होने के अधिकार से वंचित मातहत, ब्रिटिश कम्पनी की स्वार्थ-द्वेषपूर्ण नीतियाँ  और मातृभूमि से नि:स्वार्थ प्रेम मणिकार्णिका के कथानक का आधार है।

झाँसी की जिस धरती पर पचास वर्षों से सहज स्वतंत्रता का सूरज विकसित नहीं हु्आ मणि वहाँ ताज़े हवा के झोंके की तरह आती है
।अमिताभ बच्चन के वॉइस ओवर के साथ इस ऐतिहासिक  चरित्र गाथा की कहानी का प्रारंभ होता है और बमुश्किल फ़िल्म के तीसरे -चौथे दृश्य में ही दर्शक मणि से मिल लेता है।

यहाँ यह महत्त्वपूर्ण है कि कंगना इस फ़िल्म में अभिनय तो कर ही रही है पर इस फ़िल्म को निर्देशित भी कर रही हैं  पर मेरा मन कंगना में मनु को खोजता रहा और इस खोज में वह उस झाँसी की रानी तक पहुँच जाता है  जिसे ह्यू रोज अपनी आत्मकथा में 1857 के  स्वतंत्रता संग्राम में मर्दानी रानी कहकर पुकारता है।

रजवाड़ों के सबसे धनी राज्य झाँसी की गद्दी पर लक्ष्मी का बैठना अंग्रेज़ों के आँखों की किरकिरी है और फ़िल्म का हर दृश्य ऐसे सभी घटनाक्रमों को सिलसिलेवार दृश्य-दर-दृश्य दर्ज़ करता चलता है।
मनु से रानी और रानी ले मनु तक का सफ़र फ़िल्म सहजता से पूर्ण कर लेती है।लक्ष्मी और झलकारी जैसी वीरांगनाओं की अलमस्ती और स्वतंत्रता के सिंदूर की चाहना से तिलकित उनका ओजस्नी भाल मूल किरदारों का ही ओज है जो फ़िल्म को दर्शक के हृदय तक पहुँचाने का माद्दा रखता है।

पात्रों और अभिनय की दृष्टि से यह फ़िल्म सशक्त है पर और बेहतर हो सकती थी, यह भी सच है। फ़िल्म में तथ्यों की कमी खलती है,ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और शोध की आँख से इसे देखने पर भी यह फ़िल्म कमतर लगती है पर सिनेमा के निर्माता स्वयं इन पक्षों पर ये  कहकर पल्ला झाड़ते हैं कि कोरा इतिहास परोसना सिनेमा का ध्येय नहीं है। प्रसून जोशी के संवाद लिखने में भी कुछ कसर दिखी है  तो वहीं कुछ दृश्यों के फ़िल्मांकन में भी कहीं-कहीं कुछ कमी सी दिखाई देती है जो संभवत: भव्यता के अतिशय तक नहीं पहुँचने के कारण ही है । भंसाली के दृश्यों की तरह यहाँ वह अतिरेक नहीं है पर इतिहास इसी अतिरेक में कभी-कभी जगमगाता भी है। इसका एक अन्य कारण इस पटकथा और एपिक में प्रेम प्रधान घटनाक्रमों का अभाव रहना भी है।

मस्तानी जैसा जादू रचने में मणि असफल रही है ; हाँ !यह कहने में कोई गुरेज़ भी नहीं।

#मणिकर्णिका
एक वचन एक बाण

सरसरी_नज़र