Tuesday, June 2, 2015

मानवता के आदि कवि- कबीर

                          मानवता के आदि कवि- कबीर
 
कबीरा खड़ा बाज़ार में, लिए लुकाठी हाथ.. कबीर के इसी बेलाग दर्शन की वजह से जो उनके आचरण और सहजता की परतों में छिपा था वे आज भी प्रासंगिक हैं। कागद, कलम को नहीं छूने वाले कबीर ने वाचिक परम्परा में अपने संदेश लोक के बीच रखे वो भी ठेठ देशज अंदाज में। साखी ,सबद ,रमैनी हो या फिर उलटबासियाँ ,वे अपने कहन में सभी कुछ समेटते हैं। प्रेम, अध्यात्म, अहंकार, बाह्याडम्बर, वर्णव्यवस्था सभी बिन्दुओं को बेबाक तरीके से प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करने वाले कबीर अकेले संत थे। आज जब अभिव्यक्तियाँ नाना दबावों को झेल रही है कबीर एक आदर्श की तरह सामने आते हैं।  अपनी बात सही तरीके से रखने के लिए भाषा  का अलंकृत होना ज़रूरी नहीं है वरन् सच्चाई की ज़रूरत है यही कारण है कि कबीर ने भाषा से वो सब कहलवाया जो वो कहलवाना चाहते थे.. बना तो सीधे सीधे नहीं तो दरेरा देकर। लोक को अनुभव करने के लिए वो सदा लोक के बीच रहे, जन समस्याओ से रूबरू होने के लिए उन्होंने देशाटन किया, इसी का नतीजा है कि उनका काव्य आँखन की देखी बन पाया। उनका काव्य जीवन और जगत के सत्य पक्ष को उजागर करने वाला काव्य है। वहाँ केवल भाव शबलता और अतिवायवी कल्पनाएँ नहीं है वरन् वह विवेक की ढृढ आधारशिला की छाँव में रचा गया है।  धर्म का विकृत रूप जो आज सामने रहा है उसके समानांतर  अगर हम कबीर के साहित्य का अनुशीलन करें तो पाते हैं कि कबीर का सम्पूर्ण जीवन धर्म के असत् और विकृत रूप का खंडन करने में बीता। उनका लक्ष्य विविधता में एकता और जटिलता में सरलता की स्थापना करना था।  साधना के क्षेत्र में कबीर व्यष्टिवादी हैं। वे एकेश्वरवादी हैं परन्तु उनका ईश्वर वैयक्तिक नहीं है वरन् वह सामूहिकता में आश्रय पाता है और वह संसार का रक्षक और नियंता है। किसी समय के शिष्ट और शिक्षित समाज पर कबीर का प्रभाव पड़ा हो या ना पड़ा हो इस पर विरोधी राय हो सकती हैं परन्तु यह तय है कि आज कबीर युवा वर्ग की अग्रगामी सोच के आदर्श हैं। कबीर अपने कहे से सार्थक संवाद करते हैं, काव्यत्व से युक्त साहित्य रचते हैं और अपनी वक्तृत्व कला के माध्यम से उसमें आकर्षण पैदा भी करते हैं । इस वक्तृत्व को वे प्रश्नों से नहीं बल्कि मौन से बुनते हैं यही कबीर के काव्य की विशेषता है।  कबीर के विचारों में सारे विमर्श स्थान पाते हैं।  वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, वर्णों को नकारकर ऐसे समाज की स्थापना का प्रयास किया जिसमें  विभेदीकरण ना हो।  आश्चर्य यह है कि कबीर उस समय यह बात करते हैं जब समूचा समाज प्रतिगामी सोच में जी रहा था उस विपरितता में वे अपना घर जलाने का सामर्थ्य रखते हैं।  पीड़ित, शोषित, दमित जनता के जितने प्रभावी सरोकार कबीर के साहित्य में मिलते है उतने अन्य कहीं नहीं मिल सकते।  कबीर का गैर समझौतावादी व्यक्तित्व, क्रांतिकारी विचारधारा सम्पूर्ण साहित्य में अलग से चमकती है और यही प्रखरता और ओज आज की युवा पीढ़ी को आकर्षित करते हैं। कबीर मानवता के आदिकवि हैं  और अपनी विशिष्ट सार्वजनीनता के  कारण ही  वे आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।




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