Wednesday, November 1, 2017

व्यवस्था की ज़ागरूकता ही बचा पाएँगी नवांकुरों को!


वर्तमान दौर अनेक   अव्यवस्थाओं और विसंगतियों से गुजरता दौर है। कहीं राशन के धान के इंतजार में कोई भूख से दम तोड़ता है तो कहीं दवा और समुचित चिकित्सा के अभाव में कोई मौत की नींद सो जाता है। किसी भी राष्ट्र की खुशहाली का अनुमान उसके बच्चों और माताओं को देख कर सहज ही लगाया जा सकता है पर स्तब्ध कर देने वाली बात है कि यहाँ नन्हीं कौंपलें और मातृत्व पर अब भी स्याह आसमां कहर बरपा रहा है। लगातार घटता नन्हीं मौतों का यह तांडव सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे अभियान, मुद्दे और वैचारिकी आखिर किस दिशा में हैं। उदास शरद तथा छींटाकाशी और जुमलेबाजी की घटत-बढ़त के बीच  दुखद है कि गुजरात के एक सिविल अस्पताल  में नौ नवजात एक ही दिन में मृत घोषित किए जाते हैं। चौंक और दुख यहीं विदा नहीं होते वरन् गहरी टीस देते हैं कि इसी अस्पताल में बीते तीन दिनों में मौत का यह आँकड़ा  अठारह तक पहुँच  चुका है। एशिया के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में  शुमार अहमदाबाद के असारवा स्थित सिविल अस्पताल से यह दुःखद प्रसंग घटना  खासा चौंकाता है। हालांकि , हर बार की तरह अस्पताल प्रशासन इन मौतों का कारण नवजातों का गंभीर बीमारी से ग्रसित होना बताता है, पर एकाएक घटित ये मौतें अस्पताल प्रशासन की गैर-जिम्मेदारी पर सवालिया निशान छोड़ती हैं।
 चुनावी माहौल और बनते बिगड़ते सियासी समीकरणों के बीच यह वाकया फ़िलवक्त राजनीतिक हलके के लिए भी अत्यंन्त संवेदनशील बन गया है पर वास्तविक चिंता की बात यह है कि सुरक्षा और चिकित्सा, देखरेख की ज़वाबदेही तय करने वाले अस्पताल आखिर किस दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं। दुखद यह भी है कि, कोई भी महीना हो, कभी अगस्त तो कभी अक्टूबर क्यों बार-बार इन घटनाओं का दंश ढोता है ? कभी ऑक्सीजन की कमी,  कभी सड़क पर प्रसव तो कभी ऑपरेशन थिरेटर में चिकित्सकों का असंवेदनशील रवैया नवजातों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि असारवा में घटी यह घटना किसी राज्य में पहली बार घट रही हो, उत्तरप्रदेश और राजस्थान भी हाल ही में ऐसी दुखद घटनाओं के ठिये बन चुके हैं पर विचारणीय यह है कि प्रशासन और जिम्मेदार तबका ऐसी घटनाओं के बाद भी प्रभावशाली कदम क्यों नहीं उठाता दिखता।
जिस समाज में हर वर्ष तीन लाख बच्चे एक दिन भी जिंदा नहीं रह पाते और तकरीबन सवा लाख माताएँ हर साल प्रसव के दौरान मर जाती हैं, उस समाज के विकास का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। जब देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कोई कमी नहीं है तब ऐसा होना शर्मनाक ही नहीं, कुत्सित अपराध बन जाता है। शिशु मृत्यु दर में आई गिरावट के बाद भी भारत ने अब तक 30 शिशु मृत्यु दर के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया है। 2015 में जिन राज्यों में उच्चतम शिशु मृत्यु दर पाई गई उनमें मध्यप्रदेश, आसाम, उत्तरप्रदेश औऱ आसाम हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाओं , टीकाकरण और संक्रमण से बचाव की पर्याप्त सुविधाओं के अभाव तथा जन्मजात शारीरिक दोषों के कारण भारत में हर साल 11.5 लाख बच्चे 5 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही काल के ग्रास बन जाते हैं। भारत में प्रतिदिन का यह आंकड़ा लगभग चार हजार छः सौ पचास का है।  संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ ) की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में भारत में शिशु मृत्यु दर 58 प्रतिशत से भी अधिक है। यूनिसेफ के अनुसार अगर विश्व के द्वारा बाल मृत्युदर को कम करने के लिए तेजी से प्रयास नहीं किए गए तो 2030 तक  लगभग 7 करोड़ बच्चो को अपनी 5 वर्ष की उम्र तक पहुँचने से पहले ही मौत का सामना करना पड़ेगा। गौरतलब है कि यह दर गरीबी और कुपोषण के वर्चस्व में अधिक पाई गयी है। यही कारण है कि सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि कुपोषण को चिकित्सकीय आपातकाल करार दिया जाए। वर्तमान में कुपोषण की समस्या हल करने के लिए नीति बनाने और उसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त बजट की आवश्यकता के संदर्भ में कदम उठाने की आवश्यकता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया से बहुत ज़्यादा है।  नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के  अनुसार भारत में अनुसूचित जनजाति (28 फीसदी), अनुसूचित जाति(21 फीसदी), अन्य पिछड़ा वर्ग(20 फीसदी) और ग्रामीण समुदायों में (21 फीसदी) कुपोषण के मामले पाये जाते हैं। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे की तीसरी रिपोर्ट में राजस्थान में अनुसूचित जनजाति के पांच साल से कम आयु के बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं। इन मौतों से बचने और नवज़ात जीवन को बचाने के बहुत से उपाय हैं, जिन पर अगर गौर किया जाय तो बहुत सी स्थितियों पर काबू पाया जा सकता है। यूनिसेफ का मानना है कि पांच साल से कम उम्र के 22 फीसदी बच्चो की मौत न्यूमोनिया और डायरिया से हो रही है, जबकि स्वास्थ्य विभाग के मद में केंद्र और राज्य सरकार करोड़ों खर्च कर रही है। नवजात शिशुओं के मौत के पीछे शिशुओं को गंभीर रोग होना, माँ का एनिमिक होना और गर्भावस्था या प्रसव के बाद पौष्टिक आहार नहीं लेना तथा कमजोरी के कारण स्तनपान नहीं कराना भी  महत्त्वपूर्ण कारण रहें हैं। इस रिपोर्ट पर किया गया अध्ययन बताता है कि गरीब समूहों के बीच जीवन बचाने में किए गए सुधार, संबंधित देशों में शिशु एवं बाल मृत्युदर को गैर गरीब समूहों की तुलना में तीन गुना कम कर सकते हैं। यूनिसेफ ने पाया कि स्वास्थ्य औऱ वंचित बच्चों और समुदाय में निवेश करने से यह रूपयों के लिए ज्यादा मूल्य प्रदान करता है। यह कम वंचित समूहों पर 10 लाख यूएसडी के बराबर किए गए निवेश के दोगुना लोगों की ज़िंदंगी बचाता है। इस अध्ययन के लिए छह महत्त्वपूर्ण व्यवधानों को भी चुना गया जिससे मातृत्व, नवजात और शिशु व्यवधानों के संकेतों का पता चल सके। इनमें  बिस्तर पर प्रयुक्त होने वाले कीटनाशकों से लड़ने में सक्षम जाल  , प्रसवपूर्व देखभाल, स्तनपान की समय पर शुरूआत, समुचित टीकाकरण और प्रसव के समय प्रशिक्षित सहयोगी की उपस्थिति शामिल हैं। ज़ाहिर है ये सभी बुनियादी आवश्यकताएँ हैं, जिन  पर केन्द्र और राज्य सरकारों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य राज्य का विषय है, पर कोई भी राजनीतिक दल शायद ही स्वास्थ्य समस्याओं को चुनावी मुद्दों के रूप में चुनता है। किसी भी शासन की, उसकी जनता को बुनियादी आवश्यकता मुहैया करवाना महत्त्वपूर्ण जवाबदेही है अगर इसमे वह कोताही बरतता है तो यह निःसंदेह उस व्यवस्था की असफलता ही माना जाएगा। इन आंकड़ों, समस्याओं और समाधानों  पर और चर्चा करने से पूर्व यह याद करना भी उपयुक्त होगा कि हाल में जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2017 के अनुसार भारत में भूख एक गंभीर समस्या है तथा 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 100 वें पायदान पर है।
मौत के ये खौफ़नाक मंजर गुजरते  रहते हैं, जाँच आयोग गठित होते हैं और कुछ दिनों बाद कब्रों पर पड़ी मिट्टी भी सूख कर रहस्य बन जाती है । कहते हैं नन्हें ताबूत सबसे अधिक भारी होते हैं पर इन मौतों से जुड़े दंश तो वे कोखें ही जान सकती हैं जिन्होंने नो महीने उन्हें अपने रक्त के कतरे-कतरे से पाला है।  अगर सरकारें निज़ी स्वार्थों और विरोधी दलों पर छींटाकशीं और तुलनात्मक अध्ययन करने से हटकर बुनियादी ज़रूरतों की  ओर अपना ध्यान लगा लें तो सूरते हाल कुछ और ही होगा। इससे इतर प्रशासन और व्यवस्था के वर्तमान सरोकारों के लिए तो दानिश बहुत पहले कह गए हैं- ‘शहर भर के आईनों पर खाक डाली जाएगी, आज फिर सच्चाई की सूरत छिपा ली जाएगी।'