Wednesday, December 31, 2025

रानी दुर्गावती- एक सामान्य परिचय





रानी दुर्गावती: निर्भीक रानी और वीर योद्धा



इतिहास जादू , किंवदंतियों , रहस्यमयी कहानियों और साहस की काल्पनिक तथा  सच्ची घटनाओं पर आधृत है या इन सभी को अपने भीतर समेटे हुए है।

भारत के समृद्ध इतिहास में अनेक गौरव गाथाओं की बानगी है इनमें से शौर्य, घीरज और मति की त्रयी  में रानी दुर्गावती की प्रेरणादायक गाथा सटीक बसती  है। रानी दुर्गावती —एक ऐसी रानी, जिनका शौर्य और बलिदान आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करता है। प्रतिष्ठित चंदेल वंश में जन्मी रानी दुर्गावती का प्रारंभिक जीवन संघर्षों और कठिनाइयों से भरा रहा, जिसने उनके व्यक्तित्व को  सशक्त और साहसी नेता के रूप में गढ़ा। 


गोंडवाना की अजेय रानी, रानी दुर्गावती, अपने साहस, नेतृत्व और अदम्य आत्मबल के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हें भारतीय इतिहास में वीरता का प्रतीक माना जाता है। वीरता उस समय जब स्त्री को केवल सौंदर्यबोध और अधिकार के प्रतीक के रूप में पहचान मिली हो ।  राजपूत वंश में जन्मी रानी दुर्गावती ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में सिंहासन संभाला और बुद्धिमत्ता व साहस के साथ शासन किया। उनका शासनकाल (1550–1564) उनके राज्य के लिए समृद्धि और दृढ़ता का युग माना जाता है। मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध उनके जुझारू  प्रतिरोध के लिए जानी जाने वाली रानी दुर्गावती का जीवन उनके असाधारण साहस और प्रजा के प्रति अटूट समर्पण का प्रमाण है।।





प्रारंभिक जीवन और सिंहासनारोहण



चंदेल राजपूत राजघराने में जन्मी रानी दुर्गावती, महोबा के शासक कीरत राय की पुत्री थीं। बचपन से ही उन्हें युद्धकला, घुड़सवारी और धनुर्विद्या का प्रशिक्षण दिया गया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बने। 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह गोंडवाना के राजा दलपत शाह से हुआ। 1550 ईस्वी में पति के असामयिक निधन के बाद, रानी दुर्गावती ने अपने अल्पायु पुत्र वीर नारायण की संरक्षिका के रूप में राज्य की बागडोर संभाली।





शासन और प्रशासन



रानी दुर्गावती केवल एक वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल और न्यायप्रिय प्रशासक भी थीं। उनके शासनकाल में राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने जनकल्याण, कृषि विकास तथा जलाशयों और किलों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया। उनकी राजधानी चौरागढ़ (वर्तमान जबलपुर के निकट) समृद्धि और शक्ति का प्रतीक बन गई।





मुग़लों के साथ युद्ध



उनके शासनकाल की सबसे बड़ी चुनौती 1564 ईस्वी में सामने आई, जब मुग़ल सम्राट अकबर के सेनापति आसफ़ ख़ान ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। संसाधनों और सैन्य शक्ति में कम होने के बावजूद, रानी दुर्गावती ने अद्भुत साहस और रणनीतिक कुशलता का परिचय दिया।


जब उनके मंत्रियों ने भारी मुग़ल सेना के सामने पीछे हटने की सलाह दी, तब रानी दुर्गावती ने प्रसिद्ध शब्द कहे—

“अपमान का जीवन जीने से बेहतर है सम्मान की मृत्यु।” ये शब्द राजस्थान की लोकोक्ति इला न देणी आपणी से कितना साम्य रखती है। 

एक सच्ची योद्धा के रूप में उन्होंने स्वयं युद्धभूमि में उतरकर अपने राज्य की रक्षा की।





अंतिम संघर्ष



प्रारंभिक युद्धों में उनकी सेना ने वीरता और कौशल का प्रदर्शन किया, किंतु संख्या और हथियारों में मुग़ल सेना की बढ़त धीरे-धीरे भारी पड़ने लगी। 24 जून 1564 को हुए अंतिम युद्ध में रानी दुर्गावती ने अद्वितीय साहस के साथ युद्ध किया, परंतु एक मुग़ल सैनिक की गोली से वे गंभीर रूप से घायल हो गईं। पराजय निश्चित जानकर और शत्रु के हाथों बंदी बनने से इंकार करते हुए, उन्होंने अपने ही खंजर से प्राण त्याग दिए। यह राजपूती शौर्य और सम्मान की सर्वोच्च मिसाल थी।





विरासत और स्मारक



महान व्यक्तित्व कभी नहीं मरते—वे लोगों के हृदयों में सदैव जीवित रहते हैं। रानी दुर्गावती की विरासत साहस, बलिदान और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उनकी वीरता पूरे देश में सम्मान के साथ स्मरण की जाती है। अनेक विद्यालय, महाविद्यालय और सार्वजनिक संस्थान उनके नाम पर स्थापित हैं। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जबलपुर में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, और उनकी स्मृति में 24 जून को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।


इसके अतिरिक्त, उनकी स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियाँ और व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं, जो उनके असाधारण जीवन से लोगों को परिचित कराते हैं। उनकी प्रतिमाएँ सार्वजनिक स्थलों की शोभा बढ़ाती हैं और उनकी कहानी भारतीय शिक्षा पाठ्यक्रमों में भी सम्मिलित है, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ उनके शौर्य और प्रशासनिक क्षमता से प्रेरणा ले सकें।




रानी दुर्गावती साहस, नेतृत्व और अपनी प्रजा के प्रति अटूट निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उनका जीवन उन महिला शासकों की शक्ति और दृढ़ता का प्रमाण है, जिन्होंने इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने आत्मसमर्पण के स्थान पर वीरता और बलिदान का मार्ग चुना और भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।


24 जून 1564 को उनका बलिदान केवल एक दुखद अंत नहीं, बल्कि दृढ़ प्रतिरोध और अद्भुत साहस की प्रेरक गाथा है। उनकी शासन व्यवस्था और जनकल्याण नीतियाँ प्रभावी प्रशासन की मिसाल हैं, जबकि उनकी युद्धनीतियाँ आज भी अपने साहस और सूझबूझ के लिए जानी जाती हैं।


रानी दुर्गावती की विरासत आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है और हमें यह स्मरण कराती है कि सच्चा नेतृत्व साहस, करुणा और न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से जन्म लेता है। उनका नाम भारतीय इतिहास में सदा एक निर्भीक, वीर और प्रेरणादायी रानी के रूप में अंकित रहेगा।


रानी दुर्गावती- एक  सामान्य परिचयक 



Tuesday, January 21, 2025

काव्य हेतु

 

काव्यहेतु


काव्य हेतु किसी कवि की वह शक्ति है जिससे वह काव्य रचना में समर्थ होता है। इसके अंतर्गत काव्य-सृजन की विविध प्रक्रियाओं का विवेचन किया जाता है। काव्य हेतु में 'हेतु' का अर्थ 'कारण' होता है, अतः इसे काव्य रचना का कारण भी कह सकते हैं। काव्य हेतु को 'काव्य कारण' कहने की भी परंपरा रही है। आचार्य वामन ने काव्य हेतु की जगह 'काव्यांग' शब्द का प्रयोग किया है। मुख्यतः काव्य के तीन हेतु माने गए हैं - प्रतिभा, व्युत्पत्ति (निपुणता) और अभ्यास। भट्टतौत कवि की नवोन्मेषशालिनी बुद्धि (innovative mind) को प्रतिभा कहते हैं — 'प्रज्ञा नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता'। अभिनवगुप्त के अनुसार अपूर्व वस्तु के निर्माण में सक्षम बुद्धि ही प्रतिभा है — 'प्रतिभा अपूर्व वस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा'। इसके कारण कवि नवीन अर्थ से युक्त प्रसन्न पदावली की रचना करता है। व्युत्पत्ति बहुज्ञता अथवा निपुणता को कहते हैं। शास्त्र तथा काव्य के साथ लोकव्यवहार का गहन पर्यालोचन करने के पश्चात कवि में यह गुण समाहित होता है। काव्य रचना की बारंबार आवृत्ति ही अभ्यास है। इसके कारण कवि की रचना परिपक्व और ऊर्जस्वित होती जाती है।
                मनुष्य प्रायः जो भी कार्य करता है, उसके पीछे कोई न कोई हेतु छिपा होता है। हेतु का तात्पर्य यहां कारण से है। काव्य सृजन के पीछे भी कोई न कोई हेतु होता है। प्रयोजन और हेतु में अंतर होता है। हेतु बीज स्वरूप में होते है और प्रयोजन फल स्वरूप में । अर्थात काव्य निर्मिती के पीछे हेतु को ही प्रमुख तत्व के रूप में देखा जा सकता है। वे कौन से हेतु अथवा कारण हैं कि जिनकी प्रेरणा से कवि या लेखक नई सृष्टि की रचना करता है ? भारतीय एवं पाश्चात्य आचार्यों ने काव्यहेतु पर समग्र रूप से विवेचन किया है। जिसे हम निम्न अनुसार देख सकते है।

संस्कृत आचार्यों के मत -
              संस्कृत में काव्य रचना अत्यंत प्राचीन काल से होने लगी थी। पर काव्य हेतु के विश्लेषण का सर्वप्रथम प्रयास आचार्य भामह का माना जाता है।
               आचार्य भामह ने प्रतिभा को प्रमुख काव्य हेतु मानते हुए कहा है, कि कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति ही काव्य रचना कर पाता है। काव्य सृजन के लिए प्रतिभा आवश्यक है। प्रतिभा एक शक्ति स्वरूप है, जो कवि में बीज स्वरूप में विद्यमान होती है। भामह के अनुसार काव्य और शास्त्र के अनवरत अध्ययन से व्युत्पन्न शक्ति भी काव्य हेतु है। अर्थात भामह व्युत्पत्ति और अभ्यास को महत्वपूर्ण मानते है। व्युत्पत्ति का तात्पर्य लोक शास्त्र तथा काव्य का निरीक्षण से है; जिससे ज्ञान प्राप्त होता है; अनुभव, योग्यता प्राप्त होती है। गुरू का सान्निध्य प्राप्त कर काव्यरचना का अभ्यास होता है। गुरु के मार्गदर्शन और संशोधन से काव्यरचना में निखार आता है।

 काव्य रचना का मूल कारण या हेतु बताते हुए आचार्य भामह कहते हैं-

"गुरूपदेशादध्येतुं शास्त्रं जडधियोऽप्यलम्।
काव्यं तु जायते जातुं कस्यचित् प्रतिभावतः॥" (काव्यालंकार-१-१४)

अर्थात् गुरू के उपदेश से जड़ बुद्धि वाले के लिए भी शास्त्र अध्ययन करने के लिए सुलभ हो जाता है या उतना ही पर्याप्त होता है। लेकिन काव्य सृजन तो किसी प्रतिभावान की प्रतिभा से ही उत्पन्न होता है। बिना प्रतिभा के कोई भी काव्य रचना में समर्थ नहीं हो सकता है। आगे भामह ने प्रतिभा के परिष्कार और पोषण के लिए काव्य रचना के पहले कवि को यह निर्देश दिया है कि विधिवत् शब्द और अर्थ का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इसके लिए उसे शास्त्र ज्ञान, कोशगत अर्थ की जानकारी, छंदशास्त्र, व्याकरण और अपने से पहले के श्रेष्ठ कवियों की रचनाओं का भली भाँति अनुशीलन करना चाहिए, जिससे उसके द्वारा रचित काव्य न केवल सरसता व निर्दोषता से युक्त हो बल्कि उसकी रचना में नवीनता और अपूर्वता के गुण भी समाहित होते हैं।

               आचार्य दंडी ने केवल प्रतिभा को ही काव्य हेतु के रूप में स्वीकार नहीं किया,बल्कि व्युत्पत्ति और अभ्यास को भी अनिवार्य माना है। दंडी प्रतिभा को जन्मजात और आवश्यक गुणों से युक्त मानते है। पर दंडी के अनुसार प्रतिभा के अभाव में व्युत्पत्ति एवं अभ्यास द्वारा काव्य सृजन हो सकता है। सरस्वती उपासना एवं अनवरत प्रयत्नों द्वारा काव्य सृजन संभव है।

दंडी के अनुसार काव्यहेतु -

"नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहुनिर्मलम्।
अमन्दश्चाभियोगोऽस्याः कारणं काव्यसंपदः॥"(काव्यादर्श-१/१०३)

अर्थात् यहाँ पर दण्डी काव्य के प्रमुख हेतुओं पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि काव्य सम्पदा के कारणों में नैसर्गिक प्रतिभा, बहुत सारे शास्त्रों को सुनने से प्राप्त निर्मल बुद्धि और निरन्तर तीव्र अभ्यास आते हैं। काव्य रचना के लिए केवल प्रतिभा से कार्य नहीं होता बल्कि उसके साथ साथ अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं व शास्त्रों के सुनने-पढ़ने से उत्पन्न निर्मल बुद्धि की भी जरूरत होती है। काव्य सृजन के विविध प्रकारों और पद्धतियों की जानकारी के बिना उचित रूप में अभ्यास करने में कवि की प्रतिभा सफल नहीं हो सकती है। प्रतिभा के साथ निर्मल बुद्धि की आवश्यकता पर बल देने का कारण यह है कि यदि कवि की बुद्धि शुद्ध नहीं है तो वह अपनी प्रतिभा का दुरूपयोग भी कर सकता है या उसके भटकाव की भी संभावना हो सकती है। प्रतिभा का सही ढंग से उपयोग निर्मल बुद्धि ही कर सकती है। उदात्त और श्रेष्ठ कवि का अन्तःकरण अत्यधिक मात्रा में सत्व सम्पन्न या शुद्ध होता है। जिसके कारण वह अभ्यास में तीव्रगामी होता है और शीघ्र ही उत्तम कोटि के काव्य सृजन का सामर्थ्य हासिल कर लेता है

               आचार्य वामन ने दंडी और भामह के मतों को सामने रखकर ही अपना मत निर्धारित किया है। अध्ययन, मनन, प्रयत्न, अभ्यास, काव्य कला के मर्मज्ञों से ज्ञान प्राप्त करना, अपनी ही रचनाओं की आलोचना, समीक्षा करना आदि को काव्य हेतु के रूप में स्वीकारा है। वामन काव्य हेतु को काव्यांग कहते है और क्रमशः लोक, विधा, प्रकीर्ण को काव्यांग मानते है। प्रकीर्ण के अंतर्गत वे छः तत्वों को स्वीकारते है। 

वामन ने अपने ग्रन्थ 'काव्यालंकारसूत्रवृति' में काव्य-हेतु के लिए 'काव्यांग' शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार लोक, विद्या तथा प्रकीर्ण — ये तीन काव्य निर्माण की क्षमता प्राप्त करने के अंग हैं। 

"लोको विद्या प्रकीर्णंच काव्यांगानि।" — काव्यालंकारसूत्रवृत्ति, १/३/१

प्रतिभा को जन्मजात गुण मानते हुए इसे प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया गया है — "कवित्त बीजम् प्रतिभानम्" प्रतिभा के अतिरिक्त वे लोकव्यवहार, शास्त्रज्ञान, शब्दकोश आदि की जानकारी को भी काव्य हेतुओं में स्थान देते हैं। ध्यातव्य है कि काव्यांग में वामन ने लोक तथा विद्या के पश्चात ही प्रतिभा को महत्व दिया है।

               आचार्य रुद्रट ने भी उपरोक्त काव्य हेतुओं को ही माना है। उनके अनुसार प्रतिभा के बल पर कवि में शब्द एवं उनके अर्थ के अवलोकन ही क्षमता आती है। व्युत्पत्ति के बल पर दोषपरिहार और काव्य तत्वों की उपादान शक्ति प्राप्त होती है, तो अभ्यास से काव्य सृजन में निखार आता है। रुद्रट प्रतिभा को ही शक्ति कहते है। आचार्य रुद्रट प्रतिभा के दो भेद मानते है - 1. सहजा 2. उत्पाद्या। जन्मजात प्रतिभा सहजा है, तो अध्ययन-अभ्यास से प्राप्त प्रतिभा उत्पाद्या है। 
               आचार्य आनंदवर्धन के  विवेचन में काव्य हेतुओं की छाया देखी जा सकती है। इन्होंने दो काव्य हेतु स्वीकार किए है- 1. प्रतिभा 2. व्युत्पत्ति। इनका स्पष्ट मत है कि प्रतिभा कवि के कर्म-काव्य की व्युत्पत्ति आदि के अभावजन्य दोषों को भी छिपा लेती है। 
                आचार्य राजशेखर प्रतिभा और शक्ति को एक ही स्वीकार न कर शक्ति को एक अलग तत्व के रूप में महत्व देते है। बुद्धि के भी वे स्मृति, मति और प्रज्ञा यह तीन भेद मानते है।  इनके अनुसार कवियों में प्रतिभा एक तो जन्मजात होती है और दूसरी आहार्या। कवियों के भी दो प्रकार उन्होंने किए है। एक सहज बुद्धिवालें और दूसरे आचार्य बुद्धिवाले। राजशेखर प्रतिभा के दो भेद मानते है। 
                       1. कारयित्री प्रतिभा - कवि इस प्रतिभा से काव्य सर्जन करते है। अर्थात यह प्रतिभा कवि में होती है।
                    2. भावयित्री प्रतिभा - यह सहृदय में होती है। जिसके द्वारा सहृदय काव्य में छिपे भावार्थ को ग्रहण करते है।
               आचार्य मम्मट ने शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास को काव्य हेतु माना है। काव्य रचना की शक्ति में लोक शास्त्र आदि का सम्य्क ज्ञान, काव्य मर्मज्ञों से प्राप्त शिक्षा, उसका अनवरत अभ्यास आदि को मूल कारण माना है। इनके अनुसार संस्कारगत शक्ति ही काव्यत्व का मूल बीज रूप है। जिसके अभाव में काव्य निम्न कोटि का बन सकता है। अध्ययन-मनन से प्राप्त ज्ञान व्युत्पत्ति है और निरंतर उत्कृष्ट काव्य रचना के लिए प्रयत्नशील रहना अभ्यास है।
                  परवर्ती आचार्यों में केशव मिश्र, हेमचंद्र, पंडितराज जगन्नाथ भी आचार्य भामह की तरह ही प्रतिभा को प्रमुख काव्य हेतु माना है। हेमचंद्र प्रतिभा के सहजा और औपाधिकी यह भेद मानते है। सहजा जन्मजात होती है, तो औपाधिकी कई प्रयत्नों से सिद्ध या प्राप्त होती है। आचार्य वाग्भट्ट भी प्रतिभा को काव्य का मूल हेतु तथा शेष को सहायक-संस्कारक हेतु मानते है। आचार्य जयदेव प्रतिभा को काव्य रचना का मुख्य हेतु और व्युत्पत्ति, अभ्यास को उसका सहायक हेतु मानते है। 
                 इस विवेचन से तो स्पष्ट है कि काव्य सृजन के लिए संस्कृत के इन आचार्यों ने प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास इन तीनों के स्वरूप का विवेचन किया है। जिसे हम निम्नानुसार देख सकते है।

प्रतिभा -
              काव्य हेतुओं में प्रतिभा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। कुछ लोग प्रतिभा को सहज मानते है। मम्मट ने इसे शक्ति, बीज स्वरूप माना है। अभिनव गुप्त ने अपूर्व वस्तुओं के निर्माण की क्षमता रखनेवाली शक्ति को प्रतिभा कहा है। इस प्रतिभा को नवोन्मेषशलिनी भी कहा गया है। अर्थात वह नवीनता की आग्रही होती है। नयी भावनाओं की उद्भावना इसी के द्वारा होती है। वाग्भट्ट और हेमचंद्र इस नवनवोन्मेषशाली प्रज्ञा को प्रतिभा कहते है। तो आचार्य अभिनवगुप्त अपूर्व वस्तुनिर्माणक्षम प्रज्ञा को प्रतिभा कहते है।

व्युत्पत्ति
                मम्मट व्युत्पत्ति को निपुणता कहते है। 'लोकशास्त्र काव्याद्यााविक्षणाव्' अर्थात यह संसार के निरीक्षण से, नया काव्य और शास्त्रों के अध्ययन से प्राप्त होती है। कुछ आचार्योंंने व्युत्पत्ति का अर्थ बहुलता से लिया है। बहुलता का तात्पर्य व्यापक ज्ञान से है। इनमें शास्त्रों का निरीक्षण, व्याकरण का अध्ययन, संसार का सम्यक ज्ञान अपेक्षित है। दंडी व्युत्पत्ति को श्रुत कहते है। लोक निरीक्षण सेे तात्पर्य चलाचल सृष्टि के उपादानों तथा क्रियाकलापों से है। शास्त्रों के अंतर्गत सामाजिक, धार्मिक तथा कला विषयक शास्त्रों का अध्ययन तथा काव्यादि के अंतर्गत काव्य तथा अन्य कलाओं का अध्ययन आता हे।

अभ्यास
               काव्य रचना का पुनः पुनः प्रयास अभ्यास कहलाता है। निरंतर अभ्यास काव्य  रचना के  शिल्पगत सौष्ठव में वृद्धि  करता है। अभ्यास  काव्य के बाह्यागों  को सुघड़, आकर्षक  तथा निर्दोष बनाने में सहायक होता है।
             अर्थात कह सकते हैं कि प्रतिभा, व्युत्पत्ति और निपुणता का मणिकांचन संयोग काव्य हेतु में सहायक होता है।

आधुनिक भारतीय विद्वानों के मत 
                  हिंदी के आचार्यों ने काव्यहेतुओं के वर्णन में कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। वे प्राय: संस्कृत और पाश्चात्य आचार्यों के मतों के घेरे में ही सीमित रहे हैं। रीति काल के आचार्यों ने संस्कृत काव्यशास्त्र को आधार बनाकर अपनी मान्यताएं दी है। आचार्य भिखारीदास के अनुसार प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास ही काव्य हेतु है। इन तीनों का सहयोग काव्य को 'मन रोचक' बना देता है।
                आधुनिक हिंदी के विद्वानों में सर्वप्रथम मत डॉ. भगीरथ मिश्र का लिया जा सकता है। काव्य हेतु के पीछे वे दो कारणों को स्वीकार करते हैं - निमित्त कारण और उपादान कारण। इन्हीं को प्रेरक कारण भी कहा गया है। वे कहते है - "कवि की सामाजिक, पारिवारिक या वैयक्तिक परिस्थितियां तो उसकी प्रकृति है। जिससे उसे काव्यरचना की प्रेरणा प्राप्त होती है। जिसके अभाव में या तो काव्यरचना बिल्कुल नहीं होती अथवा होती भी है तो किसी अन्य रूप में।"
                उपादान कारण के स्वरूप पर वे कहते है - "लोकशास्त्र का व्यापक ज्ञान सत्संग, श्रवण, मनन और अभ्यास के रूप में होता है। "
               डॉ.गोविन्द त्रिगुणायत मनुष्य की मननशीलता को प्रमुख काव्य हेतु मानते है।  उनके अनुसार - "मननशील मानव मन जब सांसारिक वस्तुओं के संपर्क में आता है, तब व्यक्तिगत प्रकृति के अनुसार कुछ वस्तुओं को देखकर उसमें तन्मय हो जाता है।  कुछ वस्तुओं के प्रति उसके हृदय में जिज्ञासा उत्पन होती हैं और कुछ के प्रति वह भयभीत होता है।  तन्मयप्रधान मननशीलता ही साहित्य की जननी है। "
                   डॉ.नगेंद्र भी प्रतिभा, व्युत्पति और अभ्यास के साथ आत्माभिव्यक्ति को काव्य हेतु के रूप में स्वीकारते है। 

पाश्यात्य विद्वानों के मत - 
                 पाश्यात्य साहित्य एवं काव्यशास्त्र में कहावत प्रसिद्ध है - " Poets are born and not made." अर्थात कवि उत्पन्न होते है, बनाये नहीं जाते। पाश्यात्य विद्वानों ने भी किसी न किसी रूप में प्रतिभा, व्युत्पति और अभ्यास को ही साहित्य हेतु स्वीकार किया है।
                  इस संबंध में सुकरांत ने अपने मत रखते हुए स्पष्ट किया है - "कविगण कविता इसलिए नहीं रचते कि वे बुद्धिमान हुआ करते है।  वे इस कारण कविता रचते है कि उनमें एक विशेष प्रकृति अथवा प्रतिभा रहा करती है।  जिससे उन्हें उत्साह मिला करता है। 
                   प्लेटो कवि हृदय का होते हुए भी उसे काव्य और कला के प्रति कोई विशेष सम्मान नहीं था।  इसी कारण उसने काव्य की उत्पत्ति मानसिक विक्षिप्तता की स्थिति में स्वीकार की है।
               अरस्तु प्लेटो के दैवी प्रेरणा वाले सिद्धांतों को अस्वीकार कर काव्य प्रवृत्ति को मानव स्वभाव के साथ बद्ध करते है। अनुकरण की प्रवृत्ति को वह काव्य का मुख्य हेतु मानते हैं और संगीत, लय आदि को इसके उपक्रम।
                  नाट्यशास्त्र वादी जॉन ड्राइडन तथा जॉन्सन ने प्रतिभा को अधिक महत्व दिया है। स्वच्छंदतावादी विद्वानों ने कल्पना तथा भाव को अधिक महत्व दिया है।
               लोकमंगल वादी विद्वानों ने ज्ञान और विवेक पर बल दिया है। कलावादी रचनाकार प्रतिभा को निरंकुश काव्य हेतु स्वीकार करते है।
                मार्क्सवादी मान्यता के अनुसार शोषण से मुक्ति की कामना साहित्य की वृत्ति है। मनोविज्ञानवादी फ्रायड कला को काम से प्रेरित मानते है। उनके अनुसार काव्य सृजन से कामवासना तृप्त होती है। क्रोचे आत्माभिव्यक्ति को काव्य सृजन की प्रेरणा मानते है। कॉलरिज कवि के लिए प्रतिभा को अनिवार्य मानते है।
              इस तरह भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों द्वारा बताए गए काव्य हेतुओं को देखा जा सकता है।