Thursday, May 7, 2009

माँ...

माँ ......
अस्तित्व मेरा है पूर्ण तुझसे ,
तुने मुझे सृष्टी बनाया.
तेरी छुअन तेरी ममता ने ,
मुझे कड़ी धूप से बचाया.
माँ......
तेरी आँचल की छायाँ मैं ,
मैंने यह जीवन है पाया.
कोटि- कोटि नमन तेरे इस रूप को,
मैंने तुझमे ईश्वर है पाया .
माँ ....
क्यों है विकल तेरा मन ,
मेरी जरा सी यह उदासी देखकर .
तेरा प्यार और एहसास ही तो है ,
मेरे इस जीवन का संबल.
जीवन की इस कठिन डगर पर,
चलती हूँ हँसते-हँसते .
बस सहम जाती हूँ,
यह सोचकर की....
न आए कभी माँ ..... वो दिन ,
जिस दिन तेरा हाथ न हो मेरे सर पर...

2 comments:

Dr.vasudev chawala said...

माँ" इस शब्द में पूरी श्रृष्टि समाई है .... भगवान का पहला रूप अगर कोई है तो वो रूप माँ है ..... बहुत ही सुंदर कृति है

विमलेश शर्मा said...

:)