Tuesday, March 15, 2016

ज़रूरी है संस्कृति की रक्षा



भारत की सांस्कृतिक परम्परा का अपना वैशिष्ट्य है।  आध्यात्मिक जगत में गहन समाधि की अवस्था तक पहुँचे हमारे देश की समृद्ध और चैतन्य परम्पराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का दायित्व हर व्यक्ति और समाज का है। आज देश में हालात यह है कि अगर संस्कृति की पक्षधरता की बात की जाती है तो उसे किसी खेमें, विचारधारा या दल विशेष से जोड़ दिया जाता है और ऐसे में बात विचार तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है। हर देश एक विशेष संस्कृति  को लेकर चलता है जो उसकी प्राणवायु है।  वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी व्यापक अवधारणाएँ हमारे ही राष्ट्र की उपज़ है।  आज अनेक  देश अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने को लेकर सजगता दिखाते हैं। गौरतलब है कि चीन सरकार ने हाल ही में देश की संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठाए हैं।  वहाँ ज़ारी नए निर्देशों में साफ कहा गया है कि कोई भी चैनल ऐसे दृश्य नहीं दिखा सकेगा जिससे समाज पर गलत असर पड़ता हो। सरकारों और देश के नेतृत्व द्वारा ऐसे कदम समय समय पर उठाए जाने चाहिए जिससे नव पीढ़ी को सही मार्गदर्शन मिलता रहे।   रूस औऱ अमेरिका जैसे विकसित देश भी इस दिशा में समय –समय पर अपनी चिंताओं को जाहिर करते रहते हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति में मानवीय जीवन मूल्यों आधारित  अनेक ऐसे आधारभूत तत्व रहे हैं जिनसे आज भी हर मन जुड़ा हुआ महसूस करता है। संस्कृति व्यक्ति को मानवीय दृष्टिकोँण का पहला पाठ पढ़ाती है। गीता, वेद और उपनिषद् सदियों से हमारी प्रेरणा के स्रोत रहे हैं । गीता का कर्मयोग सदैव अपनी प्रासंगिकता को लेकर हमारे बीच उपस्थित है। इस संस्कृति के सहिष्णु तत्वों ने ही उसे दीर्घता और स्थायित्व प्रदान किया है। भारतीय संस्कृति में लचीलापन है इसीलिए यहाँ अनेक धर्म और सम्प्रदाय  अपने अनूठे सौन्दर्य को साथ लिए चलते हैं । यहाँ बुद्ध और महावीर के उपदेश पलते हैं, कबीर और गुरूनानक की चेतावनी गूँजती है तो बाबा साहेब अम्बेडकर और ज्योतिबाफूले की समन्वय वादी विचारधाराएँ हमारी धरोहर को वैचारिकता प्रदान करती हैं। साहित्य , संगीत , नाना कलाएँ तथा लोक स्वर इसे वैशिष्ट्य प्रदान करते हैं। ऐसे में यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि भौतिकतावाद एवं आध्यात्मिकता में समन्वय स्थापित करने के लिए इस संस्कृति को बचपन से ही बाल मन में स्थापित करने के प्रयास किए जाएं। एक श्रेष्ठ और ज़िम्मेदार नागरिक वही हो सकता है जिसे अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी दायित्वों का भी बोध हो। राष्ट्र और समाज के लिए उसके मन में समान आदर हो। अगर हम संस्कृति को नयी पीढ़ी को सौंपने में सफ़ल रहे तो अराजकता, अवसाद औऱ असहिष्णुता जैसी अनेक रूग्णताओं से  समाज को बचाने में सफ़ल हो सकते हैं।