Sunday, April 3, 2016

फ़साना­बन गई है मेरी बात टलते-टलते

साहेब बीबी और गुलाम ,परिणीता औऱ पाकीज़ा छुटपन में देखा सिनेमा था पर ज़ेहन में  उसकी पकी हुई सी  छाप कई बरसों तक रही । जब भी समय मिलता रंगमंच का वो जादू फ़िर खिंच लेता अपनी तरफ़ और मन चल देता उन पगडंडियों पर जहाँ तन्हाई आबाद हुआ करती थी। वो महजबीं..लरजती आवाज और ठहराव से अपने शब्दों को तोल कर यूँ तराशती थी कि सीधे मन पर छाप छोड़ती थी और यही कारण था कि उसकी आँखों की मस्ती के अनगिनत दीवानों में कई मस्तानियाँ भी थी।

 खिंची हुई सी मुस्कान उस संगमरमरी चेहरे पर खिलती हुई सी लगती थी पर दर्द था कि उस अधूरी हँसी में भी  कुहासों को हटाता हुआ साफ़ नज़र आता ।

कहते हैं भावनाओं की तरल सीपियों में शब्दों के सबसे कोमल मोती जन्मते हैं ..यही वज़ह रही होगी कि उनका दर्द कागज़ पर उतर आय़ा था। यूँ कम ही होता है कि, कोई कहे चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो और हम किसी चेहरे की हँसी को पकड़कर उसका हाथ थामे चल पड़ते हैं यह कहते हुए कि हम है तैयार चलो । कहा गया है कि जिन अनुभवों को शिद्दत के साथ जिया जाता है वे जिंदगी में पानी की मानिंद उतर आते हैं।  यहाँ  इसका वैपरित्य था कि जिंदगी को पाकीज़ा अदायगी  से पर्दे पर उतारा गया ।  
 कैफ़ी आज़मी के हर्फ..  फ़साना बन गई है, मेरी बात टलते-टलते इस ज़िंदगी पर मुक्कमल बैठती थी। हर जीवन एक ट्रेजेडी है शायद कोई फ़लसफ़ा उस जीवन का भी रहा होगा।
प्रेम संवेदनाओं की सुनामी लेकर आता है। प्रेम एक परीक्षा है , रीतने और भरने के बीच पनप रहे महीन अवसाद का नाम है..और अक्सर भर कर भी खाली रह जाने का नाम है.. शायद यही प्रेम, दीवानगी की चरम पर पहुँचकर मीरां , अमृता या मीना बन जाया करता है  और यूँही अक्सर कभी कोई ज़हर ज़ाम तो कोई ज़ाम ज़हर बन जाया करता है।  यहाँ यह कहना लाज़मी है  कि हर जीवन की अपनी निज़ता है  और  उस  निज़ता की पाकीज़गी को सलाम।
# मीना कुमारी
#फ़साना­बन गई है मेरी बात टलते-टलते...