Thursday, April 28, 2016

फैन- समीक्षा


                  आरोपित व्यक्तित्व की प्रतिच्छाया - फैन
मानव मनोविज्ञान बड़ा अज़ीब होता है। किस मन के भीतर कितने तुफान छिपे है और कब कौनसे लम्हें किसी के ज़ज्बातों को इतना आहत कर बैठते है कि उसके मन में सालों का प्यार प्रतिशोध का सबब और एक जिद बन जाया करता है इसी विज्ञान को बयां करती है फैन फिल्म। प्यार औऱ  अपने प्रिय का  अपनी ओर ध्यान हर मन की एक ज़रूरी ख़ुराक होती है औऱ जब इसी बुनियादी खुराक का खारिज होना कोई बीमार मन झेलता है तो वह बन जाता है गौरव चांदना । इसी ताने बाने को लेकर बुनी गयी है यशराज बैनर की  सितारा जीवन पर केन्द्रित फ़िल्म फैन। हबीब फैजल अपने स्क्रीन प्ले और डायलोग्स से यहाँ खासा ध्यान खिंचते हैं वहीं मनीष शर्मा इस फ़िल्म को निर्देशित कर रहे हैं औऱ काफी हद तक इसे कहानी के अनुसार सही निर्देशन प्रदान करने में सफल भी  कहे जा सकते हैं। फिल्म एक कनैक्शन के इर्द- गिर्द बुनी गई है जिसे फैन के मुताबिक वाई- फाई और ब्लूटूथ से भी स्ट्रांग माना गया है।   फ़िल्म कई जगह कुछ कमज़ोर नजर आती है जहाँ फैन गौरव चांदना अतिमानवीय नज़र आता है परन्तु ठीक तभी शाहरूख एक अरसे बाद दमदार और नैसर्गिक किंग खान की भूमिका में लौटते नज़र आते हैं और उस किरदार में जान फूँक देते हैं।
सितारा कलाकारों औऱ उनके प्रशंसकों की अनेक कहाँनियाँ है जहाँ पर यह नज़र आता है कि किस तरह एक दूसरे के आरोपित व्यक्तित्व को इस कदर अपना लेता है कि उसका अपना तिरोहित हो जाता है। उस तिरोहित होने की प्रक्रिया में उस आरोपित व्यक्तित्व का प्रेम भी शामिल होता है। एक सनक व्यक्ति को अपराधी बना देती है और वही सनक एक सितारा व्यक्ति को अपने ही प्रशंसकों से एक खौफ़ पैदा कर देती है। यह फ़िल्म वस्तुतः दो ज़िदों की टकराहट है। एक तरफ़ मध्यवर्गीय मानसिकता है जो सितारा चकाचौंध से इस कदर ज़ुड़ जाती है कि उसके जीवन पर अपना अधिकार समझने लगती है। वहीं दूसरी तरफ़ स्टारडम व्यक्ति को मानवीय सरोकारों से कुछ दूर कर देती है परन्तु यहाँ यह रिक्तता नहीं कही जा सकती । क्योंकि स्टारडम पर एक सनक हावी है। फैन दोहरे व्यक्तित्व को जीता हुआ इस हद तक पहुँच जाता है कि सितार आर्यन खन्ना को नीचा दिखाने की ठान लेता है। हर खास और आम दर्शक कहानी को अपने नजरिए से देखता है, अनेक प्रसंग और कई दृश्यों की छाप ऐसी भी होती है जो उसके जीवन से जुड़ी होती है , संभवतः यह फिल्म भी अनेक ऐसे दृश्यों को परोसती हुई एक सिहरन भी पैदा करती है। फैन के रूप में गौरव चांदना एक प्रशंसक से  खलनायक की भूमिका  में तब्दील होता हुआ नज़र आता है वहीं उसके बीमार मन की कशमकश, असाहयता और झीनी उदासियाँ उसके प्रति अन्त तक एक सहानुभूति भरी पीड़ा दर्शक के मन में पैदा करती है । अंतिम दृश्य तक दर्शक एक सकारात्मकता की उम्मीद करता है परन्तु पीछे छूट जाती है , दो मनों की अपनी- अपनी जिद । इस जिद के कितने खौफ़नाक परिणाम हो सकते हैं शायद यही निर्देशक दिखाना चाहता है तभी अपने खौफ और सनक की में यह फिल्म अनेक स्थानों पर डर, बाजीगर और मनोज वाजपेयी द्वारा अभिनित रोड़   की याद दिला जाती है। इन्हीं की क्रमिकता को ज़ारी रखता हुआ फिल्म का आत्मघाती अंत एक निराशा को परोसता है। असल ज़िंदगी में ऐसे किरदार होते हैं जिनसे सामना करना उतना ही मुश्किल होता है जितना कि कोमल मन का पर्दे पर। कहानी औसत होते हुए भी यह तय है कि फिल्म शाहरूख के फैन्स को कतई निराश नहीं करेगी।

फ़िल्म कई संदेश देती हुई नज़र आती है। स्टारडम एक दीवार है जिसके भीतर सितारा जीवन के अपने कष्ट हैं। इन किरदारों की निजी जिन्दगी खुली किताब है। जिनके सच सभी को पता होते हैं और दर्द और क़टु अनुभव नितांत निजी। यह ऐसा जीवन है  जहाँ अनेक किस्से अनचाहे ही अश्वत्थामा के अर्धसत्य की तरह ही जुड़ जाते हैं। शाहरूख इस किरदार को शिद्दत से जीते हैं और पूरी नैसर्गिकता और सच्चाई के साथ। फिल्म के माध्यम से दिया गया यह संदेश कि मैं आपका स्टार हूँ औऱ आपका स्टार कोई गलत हरकत नहीं कर सकता , वास्तव में उस विश्वास को कायम रख जाता है जो कहीं ना कहीं सिनेमा हाल में बैठा या रंगमंच का भोक्ता साधारणीकरण की प्रक्रिया के तहत रसास्वादन कर अनुभूत करता है। सही मायने में कही जाए तो यह सिर्फ और सिर्फ शाहरूख की फिल्म है जिसे वे एक बार फिर अपने अभिनय की छाप मुक्कमल तरीके से छोड़ते हैं।