Saturday, December 31, 2016

दिल_की_बातें_दिल_ही_जाने

सलीका ,सहजता तो सदा से थी,
पर उसे लगता था कि वो ज़रा बेफ़िक्र हुआ नहीं कि ज़माना हावी हो जाएगा ...
बेफ़िक्र मिज़ाज वो कभी नहीं रहा और तल्ख अनुभवों ने ही सिखाया था कि सोच के घोड़ों को भी बांधना ज़रूरी होता है..
खुश था वो... आज पूरे चौदह बरस बाद वो फिर मिल रहे थे। उस शहर से गुज़रना था और उससे मिले बगैर... यह वह नहीं सोच सकता था...
वो आसमानी लिबास में अपने साथ इन्द्रधनुष ले आई थी। दोनों की आँखों से जाने कितनी देर सावन बरसता रहा यह तो उन्हें देखने वाले ही बता सकते हैं... 
उन आँसुओं की नमी ने बादलों को भी बुलावा दे दिया था। वो बरसने लगे और उन्हें होश आया कि कितनी आँखें उन्हें हैरत से निहार रही थी।
बात बदलने को उसने कहा कि इतनी सुबह बारिश होने वाली तो नहीं थी... वह हँस कर उसकी झुकती उठती पलकों को देखकर बोला... तुम आसमां ओढ़ो और वो बरसे ना कैसे मुमकिन है यह।
फिर जाने कितने प्यार वाले घूसे दोनों के कांधे पर पड़े और कितनी देर हंसी उन होठों पर थिरकी। उन आँखों की बदमाशियों को पकड़ते हुए वह बोली तुम अब उतना नहीं सोचते जितना पहले सोचा करते वरना यूँ बेफ़िक्र होकर यहां नहीं बैठते। तुम्हें नहीं लगता कि कोई देख लेगा..
कहकर और उसकी उतनी ही रूमानी आंखें देखकर वो हँसी और हँसते हँसते उसकी नज़र जैसे ही प्लेटफार्म पर लगी घड़ी की ओर गयी, वो रूआंसा हो गयी...
वो चुप से उसके चेहरे के गुलाबी शेड्स को देख रहा था और वो बीतते समय को...
दोनों एक ही बात सोच रहे थे कि कैसे इन भागती सुइयों को रोक लिया जाय...
ट्रेन आ गयी थी। वो वहीं छूट रही थी और वो लौट रहा था। उसने चूमकर कहा बेफिक्री ज़रूरी है कुछ गम गलत करने के लिए... फिर मिलूँगा... अपना ख्याल रखना! गुजरती हुई ट्रेन से उसने कहा था इस बार सारे बाल सफेद होने के पहले मिलूँगा वादा। कोई डर नहीं बस तुम यहीं रहना यूँही...
यूँ दो कदम बढ़ गए दो कदमों को थाम कर....फिर-फिर मिलने के लिए...
-विमलेश शर्मा.