Thursday, June 15, 2017

सेना पर गलत आरोप उचित नहीं!











कश्मीर हमारा ताज़ ..कितना खूबसूरत लगता है ना यह कहना, पर वहाँ के हालात  दर्द और खौफ़ की अज़ीब दास्तां को बयां करते हैं। कभी सेना पर पथराव तो कभी पैलेटगन का विरोध जैसे अनेक वाकये हमें गाहे-बगाहे सुनने को मिलते हैं। सुना है, वहाँ की वादियाँ जोरदार धमाकों और फायरिंग से गूँजती है और ऐसे मौकों पर लोग वहाँ बत्तियाँ गुल करके एक दूसरे की घड़कन सुना करते हैं। आसरा होता है तो बस सेना का कि वह सब कुछ सहेज लेगी। सेना की नीतियाँ स्वयं सेना तय करती है और निःसंदेह वे जनहित में ही होती हैं। अगर ऐसे में कोई मामला वैपरीत्य में  प्रचारित होता हुआ नज़र भी आता है तो उसे लेकर सम्पूर्ण सेना, उसकी कार्रवाई और नीतियों पर ही प्रश्नचिन्ह  लगा देना बेमानी प्रतीत होता है कश्मीर में सेना के साथ बदतमीजी को लेकर तो कभी उनकी भूमिका को लेकर आए दिन कुछ ना कुछ सुनने को मिल जाता है।  अगर वहाँ किसी पत्थरबाज को पकड़ लिया जाता है और सीख के लिए सैनिकों के द्वारा आत्मरक्षक कदम  जनहित में उठाया जाता है, तो वह मानवाधिकार के घेरे में आ जाता है। हालांकि अन्य दृष्टि से यह भी मानवाधिकार के विपरीत है पर क्या ये स्थितियाँ औऱ इनमें सेना के द्वारा उठाए जाने वाले कदम इतने आसान हैं जितने की हमें सोशल मीडिया पर पोस्ट या टीप करते, पढ़ते हुए,लिखते, देखते या सुनते हैं, शायद नहीं।

एक वीडियो सोशल मीडिया पर फिर वायरल हो रहा है। इस वीडियों के सच या झूठ होने पर अभी कोई तय सूचना भी नहीं है, पर यह झूठ सा दिखने वाला सच आहत करता है । वीडियों में बुरका पहनी हुई एक महिला सेना पर आरोप लगाती हुई नज़र आ रही है कि सेना हमारे घरों में जबरन घुसकर  हमें परेशान करती है, तोड़-फोड़ करती है। उनका कहना है कि सेना के जवान हमारे साथ मार-पीट करते हैं, नाना प्रकार की माँग करते हैं, फिर हम इनका साथ क्यों दें। जैसा कि अमूमन होता है,वीडियों के जारी होते ही इसे बड़ी संख्या में लोगों द्वारा शेयर भी किया जा चुका है। अनेक लोगों ने वीडियों पर प्रतिक्रिया भी दी है। कई लोगों ने सेना के खिलाफ टिप्पणियाँ भी लिखी हैं, लेकिन जो बात चौंकाने वाली है वह यह कि वीडियों पर कमेंट करने वाले यूजर एक ही सम्प्रदाय विशेष के हैं। यूँ इन खबरों , वीडियों से मुत्तसिर नहीं हुआ जा सकता पर फिर भी ये घटनाएं कोमल जनमानस और सेना के विश्वास पर व्यापक प्रभाव तो छोड़ती ही हैं।
खबरों का रसायन कितना मारक होता है , यह हम सभी जानते हैं। इसलिए पत्रकारिता में भी शब्दों को बहुत तोल-मोल कर प्रयोग करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। फिर ऐसे में सोशल मीडिया पर सेना को लेकर क्षेत्र विशेष का ऐसा संवेदनशील  वीडियों या खबर आना जनमानस में एक सनसनी पैदा करता है। माना क्षेत्र विशेष में स्थितियाँ जटिल हैं पर अधिकतर ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाले लोग पूर्वाग्रहों  औऱ अतिवाद से ग्रसित होते हैं। पूर्वाग्रह  औऱ अतिवाद दोनो ओर हैं, दाएँ भी हैं और बाएँ भी , तमाम विचारधाराओं में पर क्या वे राष्ट्र या मानवता से ऊपर उठकर हैं हम इन अतिवादी ध्रूवों से बचकर मध्यम मार्ग की तलाश कर हालातों का सामना जनतांत्रिक तरीकों से भी तो कर  सकते हैं।
दरअसल ऐसी खबरों और दोषारोपण से उस सेना का मनोबल टूटता है जो सब कुछ छोड़कर भले ही किसी की नज़र में अपनी आजीविका के लिए ही सही, पर अपनी जान हथेली पर लिए सरहद पर खड़ी है। सेना को प्रश्निल निगाहों से देखना, या उस पर बेवजह आरोप लगाना उसकी निष्ठा, उसकी प्रतिबद्धता को ठेस पहुँचाना है। राजनीतिक उठापठक और बहसें सदा से होती रही हैं, अनेक मामलों को पक्ष-प्रतिपक्ष अपनी सहूलियत से उठाता रहा है परन्तु किसी भी राष्ट्र की सेना को लेकर लगातार दुष्प्रचार किया जाना, गलत खबरों का खंडन नहीं किया जाना , सेना में भी रोष पैदा करता है। युद्ध, दंगों औऱ अप्रिय हालातों का पैरोकार कोई नहीं होता, सरहद पर खड़ा सैनिक भी अमन चाहता है पर जब बात देश के आत्मसम्मान की आती है तो उन्हें फैसले लेने की अनुमति होनी चाहिए। सरकार, मीडिया तंत्र या किसी भी बाहरी संस्था का हस्तक्षेप उसकी कार्यप्रणाली में सीधा-सीधा दखल पैदा करता है। यह बात हम सैम मानेक शॉ के समय में भी देख सकते हैं जब वे सेना में बगैर किसी राजनीति के दख़ल में काम करना पसंद करते थे, उसके नतीजे भी हमारे सामने हैं। इसका ज़िक्र बहराम पंताखी अपनी किताब सैम मानेक शॉ- द  मैन एंड हिज टाइम्स में भी करते हैं। सोचने की बात यह है कि अब अगर ऐसी स्थितियाँ आ जाएँ तो सेना के निर्णयों का हम कितना सम्मान कर पाएँगें। यह भी सही है कि सेना की कार्रवाई और ऐसी घटनाओं का राजनीतिक लाभ कमाने की नीति भी लोकतंत्र के लिए हानिकारक ही है। माओत्से तुंग का यह कथन ठीक है कि- हज़ारों फूलों को खिलने दो, हज़ारों विचारों को टकराने दो’, पर अगर कुतर्क हो, प्रसारित विचार द्वेषपूर्ण हों तो उन पर गहन चिंतन और तदनुरूप रोकथाम भी उतनी ही ज़रूरी है।


सूचना के बाजार के अपने खतरे हैं। यह अफीम की तरह काम करता है,धीरे पर देरतलक और प्रभावी।  यह धीरे-धीरे आपकी मानसिकता को सौंखता है, खराब कर दैता है। भावनाओं का कब किस तरह व्यक्ति के विरोध में और व्यक्ति सापेक्ष प्रयोग करना है, यह बाज़ार बखूबी जानता है। क्या ऐसे वीडियों, ऐसी खबरें, तकनीक के संसार में एक हिंसक समाज को नहीं पैदा कर रही हैं? इनमें से ही वे लोग जन्मते हैं जो ट्रोल करते हैं, फब्तियाँ कसते हैं, असहमति का विरोध करते हैं। यह सभी स्थितियाँ खतरनाक हैं, अतः इनका विरोध होना चाहिए। हरिशंकर परसाई कहते हैं, सत्य को भी प्रचार चाहिए, अन्यथा वह, मिथ्या मान लिया जाता है। अतः सेना को लेकर भी जो भ्रांतियाँ जनमानस में हैं या जिनका दुष्प्रचार किया जा रहा है, उनका खंडन आवश्यक है। क्योंकि बात सेना के आत्मसम्मान से भी जुड़ी है , फिर यह भी कहा गया है कि किसी भी देश की सेना कितनी भी ताकतवर क्यों ना हो, अगर उस देश के लोग उसके साथ नहीं हैं तो वह कमजोर पड़ जाती है। वस्तुतः जनमानस ही सेना का सपोर्ट सिस्टम है। ऐसी खबरों को लेकर जो वाद-प्रतिवाद और नकारात्मक टीपें हैं उन्हें देख-सुनकर तो फिलवक्त परवीन शाकिर की पंक्तियों में  यही कहा जा सकता है कि- 

               “मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी, 
                  वो झूठ कहेगा औऱ लाजवाब कर देगा।

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