Thursday, January 28, 2016

तय करनी होगी सामाजिक जिम्मेदारी


भारतीय समाज सदा प्रगतिशील है। यहाँ विगत को नमन करते हुए आगत के स्वागत की परंपरा है। हर व्यक्ति यहाँ आकर अपनी चेतना को प्रगतिशील बनाता है। अनेक प्रतिभाएं यहाँ  आकर निखरती हैं परन्तु कला के क्षेत्र में जब बाजारवाद हावी हो जाता है तो वहाँ व्यक्तित्व और संस्कृति का स्खलन प्रारंभ हो जाता है।  यहाँ यह बात दीगर है कि अगर व्यक्तित्व में ऊर्जा है तो वह स्वयं दैदीप्यमान होगा ही।  हर व्यक्ति अपना जीवन पूरे सम्मान के साथ जीने का अधिकार रखता है औऱ इस हेतु वह अनेक कार्य करता है। गौरतलब है कि सनी लिओन रूपहले पर्दे पर आ रही हैं, वे अपने अतीत को भूलाकर एक सम्मान जनक जीवन जीना चाहती है और कहीं ना कहीं यह भी अपेक्षा रखती है कि समाज भी उन्हें सम्मान दे। हाल ही में  एक टीवी इंटरव्यू के दौरान अपने करियर को लेकर  उन्हें कई कड़े प्रश्नों का सामना करना पड़ा है।  साक्षात्कार में  उनके अतीत से लेकर भावी जीवन की योजनाओं पर सवाल किए गए ।उनसे यह सवाल भी किया गया कि क्या  सिनेजगत  के  शीर्ष अभिनेता भी उनके साथ  काम करना चाहेंगे? सवाल ज़रूर बचकाना है पर  सवाल यहाँ आकांक्षा की है ,यहाँ बात एक आदाकारा के स्थापित होने की है, आकांक्षा औऱ महत्वाकांक्षा के बीच की है। अगर इन दो शब्दों पर गौर किया जाए तो बहुत महीन फर्क है ,महज  एक सीढ़ी का अंतर भर है। क्या वाकई वे अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाने की , या एक इमेज जो अब तक बनी हुई है  उसे सुधारने के लिए  प्रयासरत हैं?  इस मुद्दे पर अनेक   तर्क दिए जा रहे हैं कि यह एक प्रगतिशील कदम है , अगर नज़र दौड़ाएँ तो  इस संदर्भ में चौंकाने वाले तथ्य सामने आएँगें।

 जिस शख्सियत  की बात यहाँ  की जा रही हैं , उसकी जो छवि इलेक्ट्रानिक मीडिया में परोसी जा रही है उस पर ज़रा गौर कीजिए। क्या कहीं भी अब तक प्रसारित सिने जगत के बड़े व छोटे पर्दे पर उसे किसी प्रभावशाली या सशक्त किरदार की तरह उकेरा गया है? अगर हम विज्ञापनों या बिग बॉस जैसे कार्यक्रमों पर ही गौर करें तो बात में  सहज ही समझ में आ जाती है कि ये सभी उन्हें कहीं ना कहीं देह के उसी दायरे में धकेलने की कोशिश है जो उनका अतीत रहा है और यही कारण है कि वे  अभी तक  अपनी उसी प़ार्न इमेज से जकड़ी हुई है। अगर सिनेजगत सनी को इस इमेज से मुक्त करने का प्रयास करता तो यह कदम समाज और युवा पीढ़ी के लिए एक आदर्श स्थापित हो सकता था  परन्तु  देह का नीला रंग परोसकर वो अपना बस अपना बाजार ही बढ़ा  रहा है।
मेरा सीधा प्रश्न तमाम अगुवाई करने वालों से यह है कि क्या वे निज़ी तौर पर हिमायती हैं कि किसी स्त्री को देह के बंधनों से भी इतर देख पाने का वे सामर्थ्य रख पाते हैं अगर जवाब हाँ में है तो ये स्थापित करने के सरोकार उचित है अन्यथा सभी पर गहन मंथन करने की आवश्यकता है।  यहाँ तर्क दिए जाते हैं कि किसी का अतीत उसके भविष्य के लिए बाधक नहीं होना चाहिए। परन्तु क्या सिने जगत स्वयं ये बाधाएँ पार कर पाया है।  अगर किसी व्यक्तिव को वो सहजता प्रदान करतै हैं तो ठीक ,वे  उसे उसके दर्दनाक अतीत से मुक्त करने का प्रयास करता है तो ठीक नहीं तो उसे और  किसी  गैर सामाजिक पेशे को एक आदर्श की तरह स्थापित करने  का कोई हक नहीं है।
 सिनेमा और  समाज का अन्योन्याश्रित संबंध है। सिनेमा सबसे प्रभावशाली माध्यम है जो आमजन के दिलोदिमाग से सीधा जुड़ता है। ऐसे में अगर वहाँ किसी व्यक्ति को उसके उस काम की शय पर ही ख्याति मिलती है तो किसी अधपके मन में यह धारणा भी प्रबल हो जाती है कि ये सभी कृत्य सही हैं। अगर समाज को एक दिशा दिखानी है तो ऐसे कदमों को उठाने से पहले सौ बार चिंतन करना होगा। सही गलत के बीच एक सीमा रेखा खींचनी होगी क्योंकि मूल्यों से समझौता करना हानिकारक हो सकता है।

अभी हाल ही में  कंगना रणौत ने एक साक्षात्कर के दौरान इस रूपहले पर्दे के अनेक स्याह पक्षों को उजागर किया है। वे बताती है कि किसी स्त्री को एक मुकाम हासिल करने के लिए इस समाज में बहुत जद्दौजहद करनी पड़ती है।  वे कहती है कि “मैं एक बैंग में दो कपड़े और कुछ रुपये लेकर मुंबई आई और संघर्ष की हर सीढ़ी पार कर आज यहाँ तक पहुँच गई |" ऐसे वक्तव्य  कामयाबी के शिखर पर पहुँचने वाली अनेक  अभिनेत्रियाँ पूर्व में भी देती आ रही हैं । लेकिन कंगना रनौत ने संघर्ष के दिनों में हुए अपने शारीरिक-भावनात्मक शोषण के कटु सच के बारे में बेबाक बात की है । कंगना का यह सच दूसरों को गुमराह होने से बचाने के लिए एक जरूरी कदम है। सफलता के शिखर पर बैठी एक अदाकारा का यूँ खुलकर सच बोलना गांवों, कस्बों और छोटे-छोटे शहरों की कितनी ही लड़कियों को रौशनी के पीछे छुपे यहाँ के मर्मांतक अंधेरों से रुबरु करवाता है। फ़िल्मी दुनिया में प्रसिद्धि और सम्पन्नता के आकाश पर झिलमिलाने वाले चमकते चहरों के रास्ते की अपनी हकीकत है औऱ त्रासदी भी जो कि समाज को जागरूक बनाने के लिए सामने आना ज़रूरी है । ऐसे प्रसंग इस जादुई दुनिया में बिना किसी पृष्ठभूमि के अपनों को छोड़, यहाँ बिना सोचे समझे क्षणिक आवेश में चली आने वालीं अनेक लड़कियों को व्यावहारिक धरातल पर सोचने को विवश करते हैं । सोच समझकर कदम उठाने की सीख देते हैं । गौरतलब है कि कंगना ने अनेक फिल्मों में सशक्त किरदार निभाए है। परन्तु सनी लिओन का अब तक के सफर पर गौर किया जाए तो यह इस प्रसंग के बिल्कुल उलट है ।
यहाँ हर मन  सहमत है कि ज़रूरी नहीं कि हर अतीत सुनहरा हो परन्तु वर्तमान को सशक्त बनाकर समाज के समक्ष अगर आदर्श प्रस्तुत करें तो वह सम्मानजनक होगा  अन्यथा वह समाज को रूग्ण करने में ही सहायक होगा। नयीं कोंपलें नाजुक हैं वे दुनिया की विद्रुपताओं को नहीं समझ पा रही हैं।  यह नवयुवा पीढ़ी बहुत कम समय में सब कुछ हासिल कर लेना चाहती है। ऐसे में इस इस्पात को सनी लिओन जैसे प्रकरण महत्वाकांक्षा की अंधी दौड़ की तरफ धकेल सकते हैं।  ऐसे में किसी शख्सियत को एक आदर्श जामा पहनाने से पहले समाज को और उसके पहरूओं को अनेक बार सोचना होगा कि आखिरकार वह समाज को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है।