Friday, February 25, 2022

ममत्व की मेहँदी का अमिट रंग है वो एक ख़ास मुलाकात...!

यूँ मैं नियति और अंकों के खेल में अधिक विश्वास नहीं रखती पर फिर भी ये अंक मुझे गाहे-बगाहे अपने जादू से चौंकाते ज़रूर रहे हैं। नौ अंक यूँहीं कई ख़ुश अठखेलियाँ मेरे साथ करता रहा है, जिसमें शुमार 27 अक्टूबर 2015 का दिन भी रहा। ममत्व और स्नेह से लबरेज़, आधुनिक और सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का मणिकांचन संयोग देखकर , अपने रूबरू पाकर मैं हतप्रभ और आश्चर्यचकित अधिक थी। मौका था अजमेर में हो रहे अखिल भारतीय महिला साहित्यकार सम्मेलन में भागीदारी का, जिसमें कई प्रेरणादायक चेहरे , माथे पर आशीष धरते हाथ, अनवरत मिल रहे थे। यहाँ जिस व्यक्तित्व की बात कर रही हूँ, वे हैं, वरिष्ठ साहित्यकार और गोआ की महिमामहिम मृदुला सिन्हा, जिन्हें आप उनके स्नेहसिक्त व्यक्तित्व से आसानी से, स्वतः ही स्नेहा दी कह उठेंगे। निर्मल आभा और चेहरे पर स्मित लिए, अपने व्यवहार से माँ सी ही नज़र आती हैं,वें।

अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में तीन दिनों तक स्त्री के पौराणिक से लेकर आधुनिक होते व्यक्तित्व के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर विचारोत्तेजक परिचर्चा प्रस्तुत की गई परन्तु मृदुला जी का अध्यक्षीय उद्बोधन इस संस्मरण और मेरे अनुभवों को समृद्ध करने में मील का पत्थर रहा। आधुनिका अगर संस्कृति से जुड़ाव रखते हुए, अपने जीवन मूल्यों को सहेजते हुए, अपनी अस्मिता का विकास करे तो अनेक सामाजिक समस्याएँ सुलझ सकती है। वैसे ये विचार उनके साहित्य में हर कदम परमिलते रहे हैं, पर प्रत्यक्ष सुनने का सुख अनिर्वचनीय होता है, यह उनके वक्तव्य से समझ पाई। मेरे व्यक्तिगत अनुभवों में उन्हें दूर से और पास से देखने और समझने के, दोनों ही अनुभवों को लिखने के लिए शब्दों के भाव शायद कम पड़ जाएँगें। मंच पर कार्यक्रम में रिपोर्ट पढ़ने के समय मेरा मन किस दुविधा में था , यह बयां नहीं कर सकती पर उस स्नेहिल दीठ को जिसे में अपनी कनख़ियों से पकड़ रही थी, उसकी छुअन का अहसास अभी भी ताजा है। लेखक अपने संघर्ष से उपजे अनुभवों से ही बड़ा बनता है। और उस बड़े बनने में उसकी सहजता का अतिरिक्त योगदान होता है। उनकी सहजता उनके महामहिम व्यक्तित्व पर हावी थी, और यही सहजता मेंहदी की खुशबू और रंग की ही भाँति मुझे आकर्षित कर रही थी।

उन्हें बहुत अधिक नहीं पढ़ रखा था। पर उनकी कहानियों, कहावतों और दो उपन्यायों को जिनके नाम ज्यों मेहँदी को रंग और घरवास’ हैं को मैंपढ़ चुकी थी। यह बात पता थी कि पंचकन्याओं पर उन्होंने काफी लिखा है। पर इन सबमें उनकी जिस कृति ने मुझे अधिक प्रभावित किया वह ज्यों मेंहँदी का रंग है। बी.ए. एडिशनल करने के दौरान उनका ज्यों मेंहदी का रंग उपन्यास पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआयह सच है. उपन्यास खत्म करने के बाद मन विचलित रहा देरतलक। इतना अधिक कि मैं उसे पुनः उठाने से घबराने लगी। मानसिक और भावनात्मक स्तर पर यह जैसे कोई ज्वार उत्पन्न करने वाला विषय था। मैं दिनों चुप रही थी,इसे पढ़ने के बाद भी। कोई प्रतिक्रिया नहीं बस एक चुप लग गई थी मुझे। जब भी कोई दिव्यांग दिखता मेरे वो जख़्म और हरे हो जाते, जिन्हें उस उपन्या को पढ़ते हुए महसूस किए थे। यह अतिरेक नहीं पर सच शालिनी और दद्दा के चरित्र इस मन पर अब भी अमिट हैं। शालिनी की पाजेब तो अब भी जब तब अंतस में खनकती हुई दर्द और ख़ुशी की मिश्रित तरंगे पैदा करती है। विकलांगों की समस्या पर केन्द्रित यह पहला उपन्यास था, जो  मैंने विद्यार्थी जीवन में पढ़ा। बेहतरीन कथानक और सादा शैली में लिपटा यह उपन्यास विकलांगों की मानसिकता में परिवर्तन, उनके प्रति सामाजिक नज़रिए और उनके जीवन की समस्याओं पर करीबी दृष्टि डालता है। उनकी स्वानुभूति हर पाठकीय मन पर गहरा प्रभाव डालती हुई सिखलाती है कि शारीरिक अपंगता से सांवेगिक या नैतिक अपंगता अधिक बुरी है।  इस उपन्यास का रंग ठीक रहीम के दोहे की ही तरह मेरे मन पर है...

यों रहीम सुख ऊपजै उपकारी के संग।

बाँटन वारे को लगै ज्यौं मेहँदी को रंग। 

उपन्यास पढ़ते हुए लेखिका की जो छवि मानसपटल पर अंकित हुई, सामने पाने पर उससे कुछ अधिक ही उन्हें पाया। सोच लिया था ,ममतामयी और नेह से लबरेज़ व्यक्तित्व ही इस कृति का रचनाकार हो सकता था, पाया भी हूबहू वैसा। हमारी संस्कृति धैर्य और सुकून से जीना सिखाती है। यह व्यक्तित्व भी अपने आस-पास और इतिहास को किताबों से हटाकर मानवीय नज़र से देखना सिखलाता है। सम्मेलन में अपने उद्बोधन में वे कहती हैं कि व्यक्ति और समाज के घर्षण से ही साहित्य जन्म लेता है। जीवन अलग, उनकी समस्याएँ अलग-अलग तो साहित्य भी विविधतापूर्ण हुआ ना। वैवाहिक रिश्ते की बात करें तो कितने तरह के पति और कितनी विविध भूमिकाओं में पत्नियाँ , यूँहीं तो यह चित्रण ही अलग-अलग हुआ ना। कितनी संजीदगी से उन्होंने साहित्य के रंग और भूमिका से अवगत करा दिया, जैसे कि कोई शिक्षक सरल उदाहरणों से अपनी बात समझा रहा हो। अपने उद्बोधन में उन्होंने महत्त्वाकांक्षा के सकारात्मक रूप और इदं न मम् को भी समझाया। स्त्री की बात करते हुए उन्होंने कहा कि स्त्री धरा होती है। क्षमा भाव उसमें जन्मजात है, उसे अतिरिक्त कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है। आज हम विमर्श की आड़ में उसे उसके स्वरूप से अलग कर रहे हैं। उसके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए परन्तु उसकी भूमिका को कमतर कर हम एक विखण्डित समाज को ही तो जन्म दे देंगे। स्त्री औऱ पुरुष की जन्मजात प्रवृत्तियों में वैषम्य है। अगर कोई इस बात को नकारता है तो फिर थर्ड जेन्डर जैसी अवधारणाएँ ही  कहाँ जन्मती। हाँ शारिरीक , लैंगिक विभिन्नता के आधार पर कोई यदि उसे उसके अधिकारों से वंचित करता है तो प्रतिरोध ज़रूरी है। वे कहती हैं कि हर बात में प्रतिरोध का बिगुल बजाने वाले को में हेय मानती हूँ। अपनी बात को बेहद संजीदगी से, अपनी ही धज में रखते हुए उन्होंने जो कहा वह मन पर अंकित होने जैसा था। इसी प्रसंग में वे कहती हैं कि बेटी को तो सब बेटा-बेटा कहते हुए पुकारते हैं, क्या आज तक किसी ने बेटे को बेटी कहकर पुकारा है। दोनों फल एक ही पेड़ के हैं, उनके स्वाद हमने अलग-अलग कर दिए। पर बच्चियों में वह हुनर है कि एक चाय की प्याली से वे सारी चिंताएँ दूर कर सकती है। मैं सोच रही थी ठीक ही तो है संस्कारों में अगर आधुनिकताबोध का समावेश हो जाए तो सारी समस्याओं पर ही पूर्णविराम लग सकता है।  यह बात कोई स्त्री मन ही कह सकता था। मन आश्वस्त था। साहित्यिक हस्तियों के बारे में अब तक मेरी राय कुछ अधिक अच्छी नहीं थी, इसका कारण उनका दोहरे व्यक्तित्व को जीना रहा है।

उनकी बातों की लड़ियों को जब अपनी स्मृति के गलियारे में एक-एक कर खोलती हूँ तो उनके द्वारा कही गई लोकोक्तियाँ और मुहावरे याद आते हैं। लोकोक्तियाँ और मुहावरे के ये प्रयोग निःसंदेह उनके रचाव को भी विशिष्ट बनाते  है। एक बात उस उद्बोधन की याद आती है, जिसमें वे कहती हैं, घोड़े के पीछे-पीछ और अपने से बड़े अधिकारी के आगे चलना किसी अनाड़ी का ही नाम है। इसे उन्होंने कुछ इस तरह उद्धृत किया कि-घोड़ा के पिछाड़ी, हाकिम के अगाड़ी, जाए वह अनाड़ी।इस कहावत की सीख यह थी कि बड़ेरों के अनुभवों के अनुसार ही चलने, उठने और बैठने में फायदा है। पर यह सीख कितने-कितने प्रसंगों में सटीक बैठता है, मैं अनुभवों को टटोलती हुई सोच रही थी। ऐसी ही एक संक्षिप्त सी कहावत या उसका हिस्सा भर याद है कि , “राह चलने के पूर्व बटोहि, बाट की पहचान कर लो। अर्थात् कर्म करने से पूर्व ही उसके करणीय और अकरणीय या कुकरणीय पक्ष पर विचार कर लिया जाए, तो जाने कितनी अनहोनियों से बचा जा सकता है। ये अनुभव ऐसे हैं जैसे,मेरे सामने कोई तपस्विनी अपने अनुभवों के जखीरे से मोती बाँट रही हो, सबसे खरे और अनुभव की आँच में तपे सच्चे मोती। 

 

एक उद्बोधन और सीखें सौ बरस की, उस मुलाकात का कुछ ऐसा ही असरमन पर था। कुछ यूँ जैसे मैं नानी की नेहिल गोद में दुबकी हूँ , जैसे की माँ की गोद में बैठ उनकी सीख सुन रही हूँ, जैसे कोई पिता अपनी बेटी को विदा के वक्त संस्कारों की पोटली सौंपता है, उस बेटी सी ही स्थिति मेरी थी मैं सब कुछ सहेज रही थी। आँखों का पानी भीतर उतर गया था और मन मानों बचपन की बारिश में भीग रहा था। मैं पीली फ्रॉक पहने हुए नन्हीं थी और माँ मानों दूधिया साड़ी पहने मेरे सामने खड़ी थी। शब्दों में बाँधूँ तो यही अनुभूति थी, वैसे शब्दों की भी सीमा हुआ करती है , यह मैं यह संस्मरण लिखते हुए समझ पा रही हूँ। अभिवादन की महिमा, कर्म की महिमा जीवन को समृद्ध करती हैं। ये बातें उस मुलाकात से ही मैंने जानी।ये स्मृतियाँ जिन्हें मैं मृदुला जी को याद करते हुए लिख रही हूँ, वे आज भी उतनी ही जीवंत है। श्रेष्ठ व्यक्तित्व अपने को बाँध कर नहीं रखता वरन् वट वृक्ष सा होता है, विशाल ह्रदय वाला और सभी को अपने नेह की छाँव में रखने वाला। यह बात रपट पढ़ने पर उनकी की गई प्रतिक्रिया से सिद्ध हुआ। उनका कहन मेरे लिए माथे पर स्नेह का हाथ धरने जैसा था। ये अनुभव, ये बयानगी, यह लिखा, मैं शर्तिया कह सकती हूँ , वहाँ उपस्थित हर श्रोता के मन में उस वक्त वहाँ रहा होगा। जो उन्हें देख रहा था,सभी की दृष्टियों में एक ही भाव नज़र आ रहा था। व्यक्तित्व का आकर्षण इतना प्रभावी और कामणकारी होता है, यह मैं उन्हीं पलों में जान पाई थी।

मृदुला जी जैसा साहित्यकार हमारे बीच रहकर सृजनकर्म कर रहा है, नई पीढ़ी को संस्कारों और अनुभवों की खाद दे रहा है,यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है। धरती पर सूरज सा उगने और फूलों सा महकने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिलता है, मृदुला जी इस बात में धनी हैं। स्मृतियों की बगिया में उस एक मुलाकात की इतनी समृद्धियाँ हैं कि क्या कहूँ, यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे मेरी स्मृतियों को इस मेहँदी से रंगने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस ममतामयी और कर्म में विश्वास रखने वाली शख़्शियत को जब-जब पढ़ती हूँ उनके लिए अल्लमा इक़बाल की यहीं पंक्तियाँ ज़ेहन में उभरती हैं-

बहुत उसने देखें हैं पस्त ओ बुलंद,

सफ़र उसको मंजिल से बढ़कर है पसंद।।

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