Saturday, November 13, 2010

क्षणिका

नहीं चाह दीर्घ जीवन की ,
पर कुछ लालसा है इस मन की.
रहे सादगी यह बचपन सी ,
फिर उम्र हो चाहे पचपन की.

2 comments:

Ms Bhati said...
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Ms Bhati said...

आप बचपन जैसी सादगी की बात करते हैं,
तो फिर यूँ कम उम्र या उदासी की बातें मत लिखा कीजिए।
इंसान किसी भी उम्र में बचपन जैसा रह सकता है,
बस उसके भीतर सच्चा बचपना होना चाहिए।
उम्र तो केवल संख्या है,
खुदा करे आपको सौ साल से भी लंबी उम्र मिले और आप हमेशा यूँ ही मुस्कुराते रहें।